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'पक्षियों का गांव' कुलडीहा : वैज्ञानिकों की चेतावनी के बीच ग्रामीणों ने चमगादड़ों को माना अपना 'परम मित्र'

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'पक्षियों का गांव' कुलडीहा : वैज्ञानिकों की चेतावनी के बीच ग्रामीणों ने चमगादड़ों को माना अपना 'परम मित्र'


पश्चिम मेदिनीपुर, 19 जनवरी (हि. स.)। पश्चिम बंगाल सहित देश के विभिन्न हिस्सों में जहां निपाह वायरस को लेकर दहशत का माहौल है और लोग चमगादड़ों से दूरी बना रहे हैं, वहीं पश्चिम मेदिनीपुर जिले के शालबनी स्थित 'कुलडीहा' गांव एक अलग ही मिसाल पेश कर रहा है। जंगलमहल के इस गांव में ग्रामीण न केवल चमगादड़ों के साथ दशकों से रह रहे हैं, बल्कि उन्हें अपने परिवार के सदस्य की भांति सहेज कर भी रखा है।

'पक्षियों के गांव' के रूप में विख्यात कुलडीहा में ऊंचे और पुराने वृक्षों पर हजारों चमगादड़ों और पक्षियों का बसेरा है। चिकित्सा जगत में चमगादड़ों को निपाह वायरस का वाहक बताए जाने के बावजूद, इस गांव के लोगों में कोई भय नहीं है। ग्रामीणों का स्पष्ट कहना है कि ये जीव उनके परम मित्र हैं।

ग्रामीण बुद्धेश्वर महतो बताया कि मेरी उम्र 75 साल हो गई है और जन्म से ही मैं इन चमगादड़ों को देख रहा हूं। हमारे बाप-दादाओं के समय से ये यहां रह रहे हैं। हमें कभी इनसे कोई नुकसान नहीं हुआ। अब लोग बीमारी की बात कह रहे हैं, लेकिन हमें कोई डर नहीं है। जब तक हम जीवित हैं, इन पक्षियों और चमगादड़ों की रक्षा करेंगे।

स्थानीय निवासी प्रणब महतो ने भी इसी भाव को दोहराते हुए कहा कि टीवी पर बीमारी की खबरें सुनी हैं, लेकिन गांव में चमगादड़ों और इंसानों का साथ अटूट है।

निपाह वायरस के संक्रमण की आशंकाओं के बीच स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि चमगादड़ की लार, मूत्र या विष्ठा से वायरस फैलने का खतरा रहता है। हाल ही में राज्य में चिकित्सा कर्मियों के संक्रमित होने की खबरों के बाद स्वास्थ्य विभाग ने सतर्कता जारी की है। हालांकि, विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि अनावश्यक भय में आकर जीवों को मारना जैव-विविधता के लिए खतरनाक हो सकता है।

जिले के मुख्य स्वास्थ्य अधिकारी (सीएमओएच) सौम्यशंकर षड़ंगी ने कहा कि चमगादड़ों की उपस्थिति मात्र से आतंकित होने की आवश्यकता नहीं है। संक्रमण तभी फैलता है जब कोई जीव निपा से ग्रस्त हो। हम स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं के माध्यम से ग्रामीणों को जागरूक कर रहे हैं कि वे गिरे हुए या चमगादड़ द्वारा खाए गए फलों का सेवन न करें। स्वास्थ्य विभाग निपा से निपटने के लिए पूरी तरह तैयार है।

कुलडीहा के ग्रामीणों के लिए ये चमगादड़ केवल जीव नहीं, बल्कि उनकी पहचान हैं। ग्रामीणों का मानना है कि इन्हीं के कारण दूर-दूर से लोग उनके गांव को देखने आते हैं। आधुनिक वैज्ञानिक चेतावनियों और पुरानी मान्यताओं के बीच कुलडीहा गांव आज भी जीव-जंतुओं के प्रति प्रेम और सह-अस्तित्व की एक दुर्लभ तस्वीर पेश कर रहा है।

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हिन्दुस्थान समाचार / अभिमन्यु गुप्ता