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विशेष : पितृ पक्ष में श्राद्ध-तर्पण से पितरों की तृप्ति, ‘पितृ ऋण’ चुकाने की मान्यता

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विशेष : पितृ पक्ष में श्राद्ध-तर्पण से पितरों की तृप्ति, ‘पितृ ऋण’ चुकाने की मान्यता


विशेष : पितृ पक्ष में श्राद्ध-तर्पण से पितरों की तृप्ति, ‘पितृ ऋण’ चुकाने की मान्यता


— मृत्यु के बाद आत्माएं एक वर्ष से लेकर सौ वर्ष तक मृत्यु और पुनर्जन्म की मध्य की स्थिति में रहती है

—श्राद्ध पक्ष का माहात्म्य उत्तर व उत्तर-पूर्व भारत में ज्यादा

वाराणसी, 28 सितंबर (हि.स.)। सनातन धर्म में पितृ पक्ष का विशेष धार्मिक महत्व है। मान्यता है कि इस अवधि में श्रद्धा और विधि-विधान से किए गए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान से पितर तृप्त होते हैं तथा पूर्वजों के प्रति मनुष्य का दायित्व पूरा होता है। पितरों के लिए श्रद्धा से किए जाने वाले कर्म को ‘श्राद्ध’ और तृप्ति के लिए जल अर्पित करने की क्रिया को ‘तर्पण’ कहा गया है। वेदों में इसे ‘पितृयज्ञ’ के रूप में वर्णित किया गया है।

शोध छात्र एवं कर्मकांडी आचार्य रविन्द्र तिवारी और उदय तिवारी ने 'हिन्दुस्थान समाचार' से बातचीत में बताया कि सत्य और श्रद्धा से किए गए कर्म श्राद्ध कहलाते हैं, जबकि माता-पिता और आचार्य को तृप्त करने वाला कर्म तर्पण है। उनके अनुसार श्राद्ध-तर्पण केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि पूर्वजों, माता-पिता और आचार्यों के प्रति सम्मान एवं कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा भी है। इस समय पितृ पक्ष चल रहा है।

पांच महायज्ञों में शामिल है पितृयज्ञ

वेदों में यज्ञों को पांच प्रमुख वर्गों में बताया गया है। इनमें ब्रह्म यज्ञ, देव यज्ञ, पितृ यज्ञ, वैश्वदेव यज्ञ और अतिथि यज्ञ शामिल हैं। पुराणों और अन्य धार्मिक ग्रंथों में इनका विस्तार से वर्णन मिलता है। इन्हीं में पितृयज्ञ को आगे चलकर श्राद्ध कर्म के रूप में व्यापक धार्मिक परंपरा मिली। आचार्यों के अनुसार संतानोत्पत्ति और संतान को उचित संस्कार एवं शिक्षा देना भी पितृयज्ञ का हिस्सा माना गया है। इसी भाव से ‘पितृ ऋण’ चुकाने की अवधारणा जुड़ी हुई है।

आश्विन कृष्ण पक्ष में किया जाता है श्राद्ध

पितृयज्ञ या श्राद्ध कर्म के लिए आश्विन माह के कृष्ण पक्ष को प्रमुख माना गया है। सूर्य के कन्या राशि में रहने के दौरान आने वाला आश्विन कृष्ण पक्ष ‘पितृ पक्ष’ कहलाता है। मान्यता के अनुसार इस अवधि में अथवा संबंधित पितर की मृत्यु तिथि पर श्राद्ध करने से पितरों की तृप्ति होती है।

धार्मिक मान्यताओं में कहा गया है कि यदि इस अवधि में श्राद्ध न किया जाए तो पितर कार्तिक मास तक श्राद्ध की प्रतीक्षा करते हैं। इसके बाद भी कर्म न होने पर उनके लौट जाने की मान्यता है।

श्राद्ध के कई प्रकार, तर्पण के छह भेद

धर्मग्रंथों में श्राद्ध के विभिन्न प्रकार बताए गए हैं। इनमें नित्य, नैमित्तिक, काम्य, वृद्धि, पार्वण, सपिंडन, गोष्ठ, शुद्धि, कर्मांग, दैविक, यात्रा और पुष्टि श्राद्ध प्रमुख हैं। इसी प्रकार तर्पण को भी छह भागों में विभाजित किया गया है। इनमें देव-तर्पण, ऋषि-तर्पण, दिव्य-मानव-तर्पण, दिव्य-पितृ-तर्पण, यम-तर्पण और मनुष्य-पितृ-तर्पण शामिल हैं।

श्राद्ध में सात्विक आचरण पर जोर

पितृ पक्ष के दौरान धार्मिक परंपरा में संयमित और सात्विक जीवनशैली अपनाने पर जोर दिया गया है। इस दौरान व्यसन और मांसाहार से परहेज करने तथा पवित्रता के साथ श्राद्ध कर्म करने की मान्यता है। रात में श्राद्ध नहीं किया जाता और दिन के समय, विशेषकर दोपहर के आसपास श्राद्ध करने को उपयुक्त माना जाता है। श्राद्ध में कौआ, कुत्ता और गाय के लिए भी अन्न का हिस्सा निकालने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं में इन जीवों का संबंध पितरों और यम से जोड़ा गया है।

श्राद्ध पक्ष का महत्व उत्तर और उत्तर-पूर्व भारत में अधिक

पितृ पक्ष की परंपरा पूरे देश में अलग-अलग रूपों में प्रचलित है। उत्तर और उत्तर-पूर्व भारत में इसका धार्मिक माहात्म्य विशेष रूप से देखा जाता है। दक्षिण भारत में भी पूर्वजों की स्मृति और तर्पण की परंपराएं अलग-अलग नामों से प्रचलित हैं। तमिलनाडु में इसे ‘आदि अमावसाई’, केरल में ‘करिकडा वावुबली’ और महाराष्ट्र में ‘पितृ पंधरवडा’ के नाम से जाना जाता है।

श्राद्ध से जुड़ी हैं संतान, आयु और समृद्धि की मान्यताएं

धार्मिक ग्रंथों में श्रद्धा से किए गए श्राद्ध को संतान, आयु, आरोग्य, यश, बल, धन-धान्य और समृद्धि से जोड़ा गया है। पुराणों में मान्यता है कि श्राद्ध कर्म से केवल पितर ही नहीं, बल्कि देवता, ऋषि, मनुष्य तथा अन्य जीव भी तृप्त होते हैं।

मान्यता के अनुसार तृप्त पितर अपने वंशजों को आयु, पुत्र, यश, पुष्टि, बल, वैभव, सुख और समृद्धि का आशीर्वाद देते हैं।

मृत्यु और पुनर्जन्म के बीच पितृलोक की अवधारणा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार मृत्यु के बाद जीव की यात्रा तत्काल पुनर्जन्म तक सीमित नहीं मानी गई है। कुछ परंपराओं में मृत्यु और पुनर्जन्म के बीच पितृलोक की अवधारणा बताई गई है। आचार्यों के अनुसार कुछ आत्माओं के शीघ्र पितृलोक पहुंचने की मान्यता है, जबकि कुछ के लिए यह अवधि अधिक मानी गई है। इसी क्रम में मृत्यु के बाद 13वें दिन होने वाले कर्म को त्रयोदशाकर्म तथा आगे की विभिन्न तिथियों पर किए जाने वाले कर्मों को भी महत्वपूर्ण माना गया है। एक वर्ष बाद तर्पण और श्राद्ध करने की परंपरा भी इसी धार्मिक मान्यता से जुड़ी है।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृलोक के बाद जीव को उसके कर्मों के अनुरूप पुनर्जन्म प्राप्त होता है अथवा साधना और मोक्ष के मार्ग पर आगे बढ़ने की स्थिति बनती है।

गया में पिंडदान को विशेष महत्व

आचार्यों के अनुसार जिन पूर्वजों के लिए विशेष तर्पण और मुक्ति कर्म की आवश्यकता मानी जाती है, उनके लिए गया में पिंडदान और तर्पण की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित है। गया को पितृकर्म के प्रमुख तीर्थ के रूप में माना जाता है और यहां पिंडदान करने की परंपरा देशभर में प्रसिद्ध है। धर्मशास्त्रों में पितरों के निवास के लिए पितृलोक की अवधारणा मिलती है। कुछ ग्रंथों में इसे चंद्रमा के ऊर्ध्वभाग से संबंधित बताया गया है। धार्मिक मान्यताओं में दिव्य पितर और मनुष्य पितर की दो श्रेणियों का भी उल्लेख मिलता है। दिव्य पितरों के संदर्भ में यमराज का विशेष स्थान माना गया है। अर्यमा को भी पितरों में श्रेष्ठ और पितरों का देवता बताया गया है। पुराणों में अर्यमा को महर्षि कश्यप और अदिति का पुत्र तथा देवताओं का भाई बताया गया है। उत्तरा-फाल्गुनी नक्षत्र को उनका निवास लोक माना गया है।

अमावस्या को विशेष महत्व

पितृ पक्ष की अमावस्या को पितरों की तृप्ति के लिए विशेष महत्वपूर्ण माना जाता है। धार्मिक ग्रंथों में अमावस्या के अलावा कुछ विशेष तिथियों, संक्रांति, व्यतीपात, ग्रहण आदि अवसरों पर भी पितृ तर्पण और श्राद्ध किए जाने का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि पितृ पक्ष के दौरान पितरों का पृथ्वी लोक से विशेष संबंध रहता है और इसी कारण इस अवधि में तर्पण, श्राद्ध तथा पिंडदान का महत्व बढ़ जाता है।

पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता का पर्व है पितृ पक्ष

पितृ पक्ष मूल रूप से पूर्वजों के प्रति स्मरण, श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करने की परंपरा है। श्राद्ध और तर्पण के माध्यम से व्यक्ति अपने माता-पिता, पूर्वजों और आचार्यों के प्रति दायित्व और सम्मान का भाव प्रकट करता है। --------

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी