बीएचयू के वैज्ञानिकों की अहम खोज : लाभकारी बैक्टीरिया गेहूं को रोग और प्रतिस्पर्धात्मक तनाव से लड़ने में बनाते हैं सक्षम
—स्पॉट ब्लॉच रोग के खिलाफ बढ़ी गेहूं की प्रतिरोधक क्षमता, संयुक्त तनाव में भी बेहतर वृद्धि और उपज
वाराणसी, 03 सितंबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के वनस्पति विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों ने गेहूं की फसल को रोग और आपसी प्रतिस्पर्धा से उत्पन्न तनाव से बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण सफलता हासिल की है। वैज्ञानिकों के अध्ययन से सामने आया है कि मिट्टी में पाए जाने वाले लाभकारी बैक्टीरिया गेहूं के पौधों की वृद्धि बढ़ाने के साथ-साथ उन्हें रोग और प्रतिस्पर्धात्मक तनाव का सामना करने में अधिक सक्षम बना सकते हैं।
यह शोध डॉ. प्रशांत सिंह के नेतृत्व में किया गया। शोध दल में डॉ. प्रशांत सिंह के साथ बंडाना देवी, निधि यादव और नंदिता दुबे शामिल हैं। शोध को अंतरराष्ट्रीय स्तर की क्यू-1 वैज्ञानिक पत्रिका ‘फिजियोलॉजिकल एंड मॉलिक्यूलर प्लांट पैथोलॉजी’ में प्रकाशित किया गया है। पत्रिका का प्रकाशन एल्सेवियर द्वारा किया जाता है।
—लाभकारी बैक्टीरिया ने बढ़ाई पौधों की क्षमता
शोधकर्ताओं ने पौध वृद्धि को बढ़ावा देने वाले जड़-क्षेत्रीय लाभकारी बैक्टीरिया यानी पीजीपीआर (प्लांट ग्रोथ प्रमोटिंग राइजोस्फेरिक बैक्टीरिया) का प्रयोग किया। इसमें विशेष रूप से बैसिलस अमाइलोलिक्वेफेशियन्स बैक्टीरिया का इस्तेमाल किया गया।
प्रयोग के दौरान गेहूं के पौधों को बाइपोलैरिस सोरोकिनियाना नामक फफूंद से संक्रमित किया गया। यह फफूंद गेहूं में होने वाले स्पॉट ब्लॉच रोग का प्रमुख कारक है। इसके साथ ही पौधों को अलग-अलग घनत्व पर उगाकर उनमें अलग-अलग स्तर का प्रतिस्पर्धात्मक तनाव पैदा किया गया।
डॉ प्रशांत के अनुसार ,जब खेत में पौधे अधिक संख्या में और एक-दूसरे के करीब उगते हैं, तो उनके बीच प्रकाश, पानी, पोषक तत्वों और स्थान के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ जाती है। इसका सीधा असर पौधों की वृद्धि और उत्पादकता पर पड़ सकता है।
अध्ययन में पाया गया कि बढ़ते प्रतिस्पर्धात्मक तनाव के बावजूद लाभकारी बैक्टीरिया से उपचारित गेहूं के पौधों ने बिना उपचार वाले पौधों की तुलना में बेहतर वृद्धि दर्ज की। रोग का संक्रमण होने के बाद दोनों समूहों के बीच यह अंतर और अधिक स्पष्ट हो गया।
—रोग और प्रतिस्पर्धा के दोहरे तनाव में भी दिखा असर
डॉ. प्रशांत सिंह के अनुसार, लाभकारी बैक्टीरिया से पहले से तैयार किए गए गेहूं के पौधों ने विभिन्न पौध घनत्वों पर बाइपोलैरिस सोरोकिनियाना के प्रति अधिक प्रतिरोध प्रदर्शित किया। शोध की सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि यह रही कि बैक्टीरिया से उपचारित पौधे रोग और तीव्र प्रतिस्पर्धात्मक तनाव के संयुक्त प्रभाव के बावजूद बेहतर वृद्धि और उपज बनाए रखने में सफल रहे। इससे संकेत मिलता है कि लाभकारी सूक्ष्मजीव फसल को एक साथ आने वाले कई तनावों से निपटने में मदद कर सकते हैं।
—‘डिफेंस प्राइमिंग’ से पहले से तैयार होती है पौधे की रक्षा प्रणाली
अध्ययन में पौधों की ‘डिफेंस प्राइमिंग’ प्रक्रिया को समझने पर भी विशेष ध्यान दिया गया। वैज्ञानिकों के मुताबिक, लाभकारी बैक्टीरिया पौधे की रक्षा प्रणाली को लगातार सक्रिय नहीं रखते, बल्कि उसे संभावित रोगजनक हमले के लिए पहले से तैयार करते हैं। जब रोगजनक पौधे पर हमला करता है, तो प्राइम किए गए पौधे की रक्षा प्रणाली तेजी से और अधिक प्रभावी ढंग से सक्रिय हो जाती है। इससे पौधा वृद्धि और रक्षा के बीच बेहतर संतुलन बना पाता है और अनावश्यक रूप से ऊर्जा खर्च करने से बचता है।
—डीएनए स्तर पर भी मिले महत्वपूर्ण बदलाव
शोधकर्ताओं ने पौधों में आणविक स्तर पर होने वाले बदलावों का भी अध्ययन किया। इसमें पीआर-1 और पीआर-3 जैसे प्रमुख रक्षा जीनों के नियामक क्षेत्रों में डीएनए मिथाइलेशन में बदलाव पाया गया। वैज्ञानिकों के अनुसार, यह परिणाम इस ओर संकेत करता है कि लाभकारी बैक्टीरिया पौधे की रक्षा प्रणाली को एपिजेनेटिक स्तर पर पुनः व्यवस्थित कर सकते हैं। इसके परिणामस्वरूप रोगजनक के हमले के समय पौधा अधिक प्रभावी ढंग से अपनी रक्षा प्रतिक्रिया सक्रिय कर सकता है।
—टिकाऊ कृषि के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है अध्ययन
शोध का महत्व केवल गेहूं के स्पॉट ब्लॉच रोग तक सीमित नहीं है। वास्तविक कृषि परिस्थितियों में फसलों को एक साथ रोग, पौधों के बीच प्रतिस्पर्धा, पोषक तत्वों की कमी, तापमान में उतार-चढ़ाव और अन्य पर्यावरणीय दबावों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में पौधों की प्राकृतिक रक्षा क्षमता को मजबूत करने के लिए लाभकारी सूक्ष्मजीवों का इस्तेमाल टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल कृषि की दिशा में महत्वपूर्ण विकल्प बन सकता है। अध्ययन से यह भी स्पष्ट होता है कि पौधों और उनके आसपास मौजूद लाभकारी सूक्ष्मजीवों के बीच प्राकृतिक संबंध भविष्य की कृषि के लिए बेहद उपयोगी हो सकते हैं। जड़ों के आसपास रहने वाला एक सूक्ष्म लाभकारी बैक्टीरिया न केवल पौधे की वृद्धि को बढ़ावा दे सकता है, बल्कि रोग और अन्य प्रतिकूल परिस्थितियों में उसकी सहनशीलता भी बढ़ा सकता है।
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

