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विशेष: बीएचयू के वैज्ञानिकों ने विकसित की ‘ग्रीन वैक्सीनेशन’ तकनीक, गेहूं को स्पॉट ब्लॉच रोग से मिलेगा संरक्षण

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विशेष: बीएचयू के वैज्ञानिकों ने विकसित की ‘ग्रीन वैक्सीनेशन’ तकनीक, गेहूं को स्पॉट ब्लॉच रोग से मिलेगा संरक्षण


—डॉ. प्रशांत सिंह तथा उनकी शोध टीम को मिली सफलता

वाराणसी, 10 जून (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी स्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के वनस्पति विज्ञान विभाग के वैज्ञानिकों ने टिकाऊ कृषि और फसल सुरक्षा के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। शोधकर्ताओं ने एक अभिनव ‘ग्रीन वैक्सीनेशन’ तकनीक विकसित की है, जिसके माध्यम से गेहूं की फसल को स्पॉट ब्लॉच जैसी विनाशकारी बीमारी से प्रभावी रूप से सुरक्षित किया जा सकता है।

यह शोध विभाग के वैज्ञानिक डॉ. प्रशांत सिंह और उनकी शोध टीम के सदस्य निधि, बंदना तथा थिरुनारायणा द्वारा किया गया है। अध्ययन के निष्कर्ष हाल ही में स्प्रिंगर नेचर, नीदरलैंड्स द्वारा प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शोध पत्रिका वर्ल्ड जर्नल ऑफ माइक्रोबायोलॉजी एंड बायोटेक्नोलॉजी में प्रकाशित हुए हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, स्पॉट ब्लॉच रोग बाइपोलारिस सोरोकिनियाना नामक फफूंद के कारण फैलता है और दक्षिण एशिया सहित गर्म एवं आर्द्र क्षेत्रों में गेहूं उत्पादन के लिए गंभीर चुनौती बना हुआ है। यह रोग फसल उत्पादन में 50 प्रतिशत तक की कमी ला सकता है, जिससे खाद्य सुरक्षा और किसानों की आय दोनों प्रभावित होती हैं।

टीकाकरण की अवधारणा से प्रेरित इस तकनीक में वैज्ञानिकों ने गेहूं के पौधों को रोगजनक की नियंत्रित और कम मात्रा के संपर्क में लाकर उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली को पहले से सक्रिय किया। परिणामस्वरूप, वास्तविक संक्रमण होने पर पौधों ने अधिक तीव्र और प्रभावी प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया दिखाई।

अध्ययन में पाया गया कि ‘प्राइम’ किए गए पौधों में रोग की तीव्रता उल्लेखनीय रूप से कम रही। साथ ही उनमें एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि, प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया, प्रकाश संश्लेषण क्षमता तथा उपज से जुड़े गुणों में भी महत्वपूर्ण सुधार दर्ज किया गया। यह तकनीक रासायनिक फफूंदनाशकों पर निर्भरता कम करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

शोध की सबसे उल्लेखनीय उपलब्धि यह रही कि विकसित प्रतिरोधक क्षमता अगली पीढ़ी में भी स्थानांतरित होती पाई गई। प्राइम किए गए पौधों से प्राप्त संतानों में भी स्पॉट ब्लॉच रोग के प्रति अधिक प्रतिरोध देखा गया। वैज्ञानिक भाषा में इस प्रक्रिया को इंटरजेनरेशनल इम्यून प्राइमिंग कहा जाता है, जिसमें माता-पिता के अनुभव संतानों की प्रतिरक्षा क्षमता को प्रभावित करते हैं।

इस विरासत में मिलने वाली प्रतिरोधकता के पीछे के जैविक तंत्र को समझने के लिए शोधकर्ताओं ने PR1 और PR3 जैसे महत्वपूर्ण प्रतिरक्षा जीनों में डीएनए मिथाइलेशन से जुड़े एपिजेनेटिक परिवर्तनों की पहचान की। ये परिवर्तन पौधों में प्रतिरक्षा संबंधी ‘स्मृति’ विकसित करते हैं, जो उन्हें भविष्य के रोग आक्रमणों के प्रति अधिक सक्षम बनाती है और यह सुरक्षा अगली पीढ़ियों तक भी पहुंच सकती है।

डॉ. प्रशांत सिंह ने बताया कि “यह शोध टिकाऊ रोग प्रबंधन के लिए नई दिशा प्रदान करता है। हमने रोगजनक को ही प्रतिरक्षा प्रशिक्षण के साधन में परिवर्तित किया है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह सुरक्षा एपिजेनेटिक स्मृति के माध्यम से अगली पीढ़ी तक भी पहुंच सकती है, जो भविष्य की कृषि के लिए अत्यंत आशाजनक है।”

जलवायु परिवर्तन, बढ़ते रोग दबाव और रासायनिक कीटनाशकों के पर्यावरणीय दुष्प्रभावों के बीच ‘ग्रीन वैक्सीनेशन’ की यह अवधारणा फसल सुरक्षा के लिए एक सुरक्षित, पर्यावरण-अनुकूल और टिकाऊ विकल्प के रूप में उभर रही है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह तकनीक भविष्य में रोग-प्रतिरोधी फसलों के विकास तथा सतत कृषि को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी