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बीएचयू ने विकसित की मूंग की उच्च-प्रोटीन और तापमान सहिष्णु प्रजाति एचयूएम 27, खेतों तक पहुंचाने की दिशा में बढ़ाया कदम

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बीएचयू ने विकसित की मूंग की उच्च-प्रोटीन और तापमान सहिष्णु प्रजाति एचयूएम 27, खेतों तक पहुंचाने की दिशा में बढ़ाया कदम


—मूंग की नई प्रजाति का विकास, किसानों के लिए नई उम्मीद

वाराणसी, 03 सितंबर (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी जनपद स्थित काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) के कृषि विज्ञान संस्थान ने मूंग की एक नई उच्च-प्रोटीन और गर्मी प्रतिरोधी प्रजाति, एचयूएम 27 (मालवीय जनक्रांति), का विकास किया है। यह प्रजाति अधिक गर्म तापमान में भी बेहतर प्रदर्शन करने में सक्षम है, जो किसानों के लिए ग्रीष्मकालीन खेती को नई दिशा दे सकती है। इस प्रजाति का उपयोग अब बड़े पैमाने पर बीज उत्पादन और व्यावसायिक बाजार में उपलब्धता के लिए उद्योगों के साथ साझेदारी के जरिए सुनिश्चित किया जाएगा।

—प्रौद्योगिकी हस्तांतरण के लिए समझौता, औद्योगिक भागीदारी का मार्ग

संस्थान ने इस प्रजाति की प्रौद्योगिकी को उद्योग के साथ साझा करने के उद्देश्य से गुरूवार को ओलम्पस क्रॉप केयर लिमिटेड के साथ एक समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं। इस साझेदारी से मूंग की इस नई प्रजाति का व्यापक उत्पादन और बाजार में व्यावसायिक प्रवेश सुनिश्चित किया जाएगा। समझौता पर विश्वविद्यालय के कुलसचिव राजन श्रीवास्तव और ओलम्पस क्रॉप के प्रतिनिधि लक्ष्मी नारायण दास गुप्ता ने हस्ताक्षर किए। इस दौरान कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी भी मौजूद थे।

—प्रजाति की विशेषताएं, किसानों के लिए फायदे का खजाना

एचयूएम 27 का विकास कृषि विज्ञान संस्थान के आनुवंशिकी एवं पादप प्रजनन विभाग ने किया है। यह प्रजाति प्रमुख फसल मौसमों के बीच उपलब्ध कम अवधि का उत्पादक उपयोग करने के उद्देश्य से विकसित किया गया है। इसकी तापक्रम सहनशीलता, कम अवधि, बड़े बीज और उच्च प्रोटीन सामग्री का संयोजन इसे कुशल और जलवायु-सहिष्णु फसल उत्पादन के लिए विशेष रूप से उपयोगी बनाता है। एचयूएम 27 की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक इसकी अत्यधिक गर्मी सहन करने की क्षमता है। यह प्रजाति 45°C तक के तापक्रम को सहन करने में सक्षम है। इस कारण यह रबी और खरीफ फसलों के बीच उपलब्ध ग्रीष्मकालीन अवधि के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है। इससे सिंचाई की सुनिश्चित सुविधा वाले किसान गेहूँ या सरसों जैसी फसलों की कटाई के बाद सामान्यतः खाली रहने वाले खेतों में भी मूंग की खेती कर सकते हैं। इसके लिए आदर्श बुवाई अवधि 10 से 25 मार्च है। यह प्रजाति 62 से 76 दिनों में तैयार हो जाती है। इसकी औसत उत्पादकता 9 क्विंटल प्रति हेक्टेयर, जबकि दर्ज की गई अधिकतम उत्पादकता 18 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है। लगभग 44 सेंटीमीटर की इसकी कॉम्पैक्ट पौध संरचना लॉजिंग (पौधों के गिरना व झुकना) की समस्या को कम करने में मदद करती है। इसके बड़े, चमकीले हरे बीजों का वजन लगभग 5 ग्राम प्रति 100 बीज है, जिससे अनाज तथा प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों (नमकीन आदि) के बाजार में इसकी अच्छी संभावनाएँ बनती हैं। पोषण की दृष्टि से भी यह प्रजाति महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें 28.9 प्रतिशत प्रोटीन की उपलब्धता है।

—प्रजाति की उपलब्धता और भविष्य की संभावनाएं

डॉ. अनिल सिंह ने बताया कि इस नई प्रजाति की गर्मी सहिष्णुता और कम अवधि इसकी खासियत हैं। यह फसल मुख्य रूप से रबी और खरीफ के बीच के मौसम में खेती के लिए उपयुक्त है। इसके बड़े, चमकीले हरे बीज बाजार में अनाज और प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों के लिए अच्छी संभावनाएँ प्रदान करते हैं। इससे किसानों को फसलों के खाली समय का लाभ उठाने का अवसर मिलेगा, और यह फसल जलवायु परिवर्तन के प्रभावों से भी लड़ने में मदद करेगी।

—कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने इस प्रगतिशील प्रयास की सराहना की और कहा कि विश्वविद्यालय अपने नवाचारों को प्रयोगशाला और अनुसंधान खेतों से बाहर निकालकर समाज के लाभ के लिए लाने का प्रयास कर रहा है। उन्होंने प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और लाइसेंसिंग की संभावनाओं पर बल देते हुए कहा कि इससे न केवल कृषि क्षेत्र में नवाचारों का प्रसार होगा, बल्कि किसानों को भी लाभ मिलेगा।

एचयूएम 27 के विकास में डॉ. अनिल सिंह, डॉ. एम. एन. सिंह, डॉ. रमेश चंद्र, डॉ. प्रेम शंकर सिंह और दिनेश कुमार का विशेष योगदान रहा है। समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर के समय संस्थान के निदेशक प्रो. वी. के. मिश्रा, विभागाध्यक्ष प्रो. एस. के. सिंह और बौद्धिक संपदा अधिकार प्रकोष्ठ की अध्यक्ष प्रो. गीता राय भी उपस्थित थीं।

हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी