बीएचयू ने शुरू किया उत्खनन में मिले राजघाट के प्राचीन मानव कंकाल का जेनेटिक अध्ययन
गंगा घाटी की प्राचीन आबादी की वंशावली, आहार और राखीगढ़ी से संभावित आनुवंशिक संबंधों की होगी वैज्ञानिक जांच
वाराणसी, 04 अगस्त (हि.स.)। उत्तर प्रदेश के वाराणसी जनपद में स्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) ने गंगा घाटी की प्राचीन आबादी के इतिहास, आनुवंशिक पहचान और जीवन-शैली से जुड़े रहस्यों को समझने की दिशा में मंगलवार से एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अध्ययन शुरू किया है। इस शोध के तहत राजघाट उत्खनन से प्राप्त एक प्राचीन मानव कंकाल का अत्याधुनिक आनुवंशिक और जैव-पुरातात्विक विश्लेषण किया जाएगा। अध्ययन के माध्यम से यह भी जांचा जाएगा कि इस व्यक्ति का सिंधु घाटी सभ्यता के प्रमुख पुरास्थल राखीगढ़ी से मिले मानव अवशेषों से कोई आनुवंशिक संबंध था या नहीं।
राजघाट उत्खनन से मिला था कंकाल
यह अध्ययन बीएचयू के कला संकाय के प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग में संरक्षित एक खंडित मानव कंकाल पर किया जा रहा है। यह कंकाल भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) और बीएचयू द्वारा मध्य गंगा घाटी के प्रमुख पुरातात्विक स्थल राजघाट में किए गए उत्खनन के दौरान प्राप्त हुआ था। गंगा और वरुणा नदियों के संगम के निकट स्थित राजघाट की पहचान वर्ष 1940 में काशी रेलवे स्टेशन के विस्तार कार्य के दौरान हुई थी। इसके बाद एएसआई और बीएचयू ने यहां व्यापक उत्खनन कराया। विशेष रूप से वर्ष 1957 से 1969 के बीच प्रो. ए.के. नारायण और टी.एन. राय के नेतृत्व में हुए उत्खनन में आवासीय संरचनाएं, टेराकोटा कलाकृतियां, मुहरें और अनेक महत्वपूर्ण पुरावशेष मिले थे। अध्ययन के लिए चयनित कंकाल भी इन्हीं उत्खननों से प्राप्त हुआ था।
पहली बार होगा वैज्ञानिक जैविक विश्लेषण
अब तक इस कंकाल का कोई वैज्ञानिक जैविक परीक्षण नहीं किया गया था और इसकी सटीक कालावधि भी निर्धारित नहीं हो सकी थी। मंगलवार को प्राचीन डीएनए विशेषज्ञ डॉ. प्रज्वल प्रताप सिंह ने निर्धारित वैज्ञानिक मानकों के अनुरूप अत्यंत सावधानी से कंकाल के नमूने एकत्र किए। इस दौरान प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग की प्रो. सुजाता गौतम, डॉ. सचिन तिवारी और डॉ. जोस टॉम राफेल भी उपस्थित रहे।
पुरातत्व और विज्ञान का होगा समन्वय
प्राचीन भारतीय इतिहास, संस्कृति एवं पुरातत्व विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो. एम.पी. अहिरवार ने बताया कि राजघाट काशी की प्राचीनता और उसकी सांस्कृतिक निरंतरता का एक महत्वपूर्ण साक्ष्य है। उन्होंने बताया कि विभाग ने वर्षों से इस कंकाल का संरक्षण किया है और अब आधुनिक वैज्ञानिक तकनीकों के माध्यम से गंगा घाटी के प्राचीन निवासियों की पहचान, उनकी जीवन-शैली और आनुवंशिक संरचना को समझने का प्रयास किया जाएगा।
उन्होंने कहा कि बीएचयू के जन्तु विज्ञान विभाग की ज्ञान प्रयोगशाला के साथ यह संयुक्त शोध पुरातत्व और आधुनिक विज्ञान के बीच समन्वय स्थापित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।
राखीगढ़ी से आनुवंशिक संबंधों की होगी तुलना
यह अध्ययन बीएचयू के जन्तु विज्ञान विभाग के प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे के सहयोग से किया जा रहा है। प्रो. चौबे ने बताया कि यह शोध गंगा घाटी की प्राचीन आबादी की आनुवंशिक विविधता को समझने का दुर्लभ अवसर प्रदान करेगा। उन्होंने कहा कि प्राचीन डीएनए विश्लेषण के जरिए व्यक्ति की वंशावली और जनसंख्या संबंधों का पता लगाया जाएगा, जबकि आइसोटोप विश्लेषण से उसके आहार, भोजन स्रोत और संभावित भौगोलिक गतिशीलता की जानकारी मिलेगी। विशेष रूप से यह अध्ययन इस बात पर प्रकाश डालेगा कि राजघाट का यह व्यक्ति हड़प्पा कालीन राखीगढ़ी से प्राप्त मानव कंकालों से आनुवंशिक रूप से कितना मेल खाता है या कितना भिन्न है। इससे सिंधु घाटी और गंगा घाटी की प्राचीन आबादियों के बीच संभावित डीएनए संबंधों को समझने में नई जानकारी मिल सकती है।
बीएचयू के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने इस अध्ययन की सराहना करते हुए कहा कि यह शोध पुरातत्व, इतिहास और जेनेटिक्स के बीच एक मजबूत वैज्ञानिक सेतु स्थापित करेगा। उन्होंने उम्मीद जताई कि इससे भारत की प्राचीन विरासत और सभ्यताओं के विकास को वैज्ञानिक दृष्टि से समझने में महत्वपूर्ण योगदान मिलेगा।
तीन स्तरों पर होगा वैज्ञानिक अध्ययन
इस बहुआयामी शोध में तीन प्रमुख वैज्ञानिक विश्लेषण किए जाएंगे। प्राचीन डीएनए (Ancient DNA) विश्लेषण: व्यक्ति की आनुवंशिक वंशावली, जनसंख्या संबंध और राखीगढ़ी सहित अन्य प्राचीन दक्षिण एशियाई नमूनों से तुलना। स्टेबल आइसोटोप विश्लेषण: व्यक्ति के आहार, भोजन स्रोत तथा संभावित भौगोलिक गतिशीलता का अध्ययन। जैव-पुरातात्त्विक एवं काल निर्धारण अध्ययन: कंकाल की आयु, स्वास्थ्य स्थिति तथा रेडियोकार्बन डेटिंग के माध्यम से उसकी सटीक समयावधि का निर्धारण।
गंगा घाटी के इतिहास पर पड़ सकता है बड़ा प्रभाव
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अध्ययन सफल रहा तो इससे गंगा घाटी की प्राचीन आबादी की उत्पत्ति, प्रवास, जीवन-शैली और सिंधु घाटी सभ्यता से संभावित संबंधों पर नई वैज्ञानिक जानकारी सामने आएगी। यह शोध भारतीय पुरातत्व, मानव इतिहास और आनुवंशिकी के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि साबित हो सकता है।-------------
हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी

