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जब साधु बने सैनिक: नागाओं का ऐसा रौद्र रूप कि टिक न सकी अब्दाली की फौज

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जब साधु बने सैनिक: नागाओं का ऐसा रौद्र रूप कि टिक न सकी अब्दाली की फौज


हरिद्वार, 05 सितंबर (हि.स.)। सनातन धर्म की रक्षा और भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में नागा संन्यासियों की भूमिका सदियों से चर्चा का विषय रही है। इसी क्रम में श्रीमहंत गोपाल गिरी ने नागा संन्यासी अखाड़ों की स्थापना, उनके इतिहास और धर्म रक्षा के लिए किए गए संघर्षों से जुड़ी विस्तृत जानकारी हिन्दुस्थान समाचार से साझा की। उन्होंने विशेष रूप से वर्ष 1757 में श्रीकृष्ण जन्मभूमि मथुरा और गोकुल की रक्षा के लिए नागा संन्यासियों द्वारा अहमद शाह अब्दाली की सेना के विरुद्ध किए गए संघर्ष का उल्लेख किया।

आह्वान अखाड़े केश्रीमहंत गोपाल गिरी महाराज के अनुसार, वर्ष 1757 में आवाहन, अटल और महानिर्वाणी अखाड़े के करीब चार हजार नागा संन्यासियों ने अहमद शाह अब्दाली (दुर्रानी) की सेना का सामना किया था। उन्होंने बताया कि नागा संन्यासियों ने श्रीकृष्ण जन्मभूमि मथुरा और गोकुल की रक्षा के लिए मोर्चा संभाला और अब्दाली की सेना को कड़ी चुनौती दी।

धर्म रक्षा के लिए अखाड़ों की स्थापना की परंपरा का किया उल्लेख

श्रीमहंत गोपाल गिरी महाराज ने बताया कि नागा संन्यासी परंपरा में अखाड़ों का गठन धर्म की रक्षा और सनातन परंपराओं के संरक्षण के उद्देश्य से हुआ। उन्होंने सबसे पहले स्थापित हुए आवाहन अखाड़े की प्राचीन परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि इसके बाद अटल अखाड़ा तथा आगे चलकर निर्वाणी अखाड़े की स्थापना हुई। समय के साथ संन्यासी परंपरा में विभिन्न अखाड़ों का विस्तार हुआ और इनके माध्यम से साधु-संतों ने धार्मिक एवं आध्यात्मिक परंपराओं को आगे बढ़ाया।

आदि शंकराचार्य से जोड़ी नागा परंपरा की कड़ी

श्रीमहंत गोपाल गिरी महाराज ने नागा संन्यासी परंपरा को आदि शंकराचार्य से जोड़ते हुए बताया कि शंकराचार्य ने अद्वैत वेदांत के प्रचार-प्रसार के लिए देेेश भर की यात्रा की और सनातन धर्म को संगठित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने परंपरागत आख्यान का उल्लेख करते हुए कहा कि बौद्ध धर्म के प्रभाव के दौर में धर्म की रक्षा के लिए शंकराचार्य ने संन्यासी परंपरा से जुड़े साधुओं का सहयोग लिया। इसी क्रम में आवाहन, अटल और महानिर्वाणी अखाड़ों के साधुओं द्वारा उनके साथ खड़े होने और संघर्ष करने की कथा का उल्लेख मिलता है।

विभूति और नागा स्वरूप को बताया पहचान

श्रीमहंत गोपाल गिरी महाराज के अनुसार, मण्डन मिश्र से शास्त्रार्थ के दौरान बौद्ध सेना के दो भाग हुए एक पक्ष अपने गुरू के पक्ष में हो गया और दूसरा पक्ष शंकराचार्य जी से युद्ध करने के लिए खड़ा हो गया। तब शंकराचार्य जी तीनों अखाड़े आवाहन, अटल, महानिर्वाणी के पास आये और सहायता मांगी। तब आवाहन, अटल, महानिर्वाणी अखाड़े ने शंकराचार्य जी की सहायता की और बौद्धों से युद्ध किया। तभी तीनों अखाड़े के मुखियाओं ने रात्रि में बैठक की और यह निर्णय लिया की पता नहीं हम में से कौन जीतेगा और कौन मरेगा। हम अपना पिण्ड दान कर दें तो अच्छा होगा। बताया कि जब पिण्ड दान करने के लिए घाट पर गये और वस्त्र उतारे और कर्म करने लगे,तो घाट पर एक ने दूसरे को देखा और ध्यान दिया की हम निर्वस्त्र को अपनी पहचान बनायेंगे।

सुबह जब युद्ध हुआ तब तीनों अखाड़े के संन्यासी विभूति लगाकर मैदान में उतरे और बौद्धों को कुछ समय में पराजित कर दिया।

तभी से नागाओं की यह पहचान बन गई। मण्डन मिश्र को व उनकी पत्नी भारती सरस्वती को शंकराचार्य ने अपना शिष्य बना कर सनातन धर्म के कार्य में लगाया। इसी परंपरा से नागा संन्यासियों के विशिष्ट स्वरूप की पहचान विकसित हुई। उन्होंने यह भी बताया कि शंकराचार्य परंपरा में चार प्रमुख मठों, दक्षिण में श्रृंगेरी, पूर्व में गोवर्धन, उत्तर में ज्योतिर्मठ और पश्चिम में शारदा मठ की स्थापना हुई। इन मठों के माध्यम से वेदांत और सनातन दर्शन के प्रचार-प्रसार को आगे बढ़ाया गया।

श्रीमहंत ने बताया कि चारों मठों की परंपरा के साथ विभिन्न संन्यासी संप्रदाय और अखाड़े समय के साथ विकसित होते गए। उनके अनुसार, बाद के काल में आनंद अखाड़ा, निरंजनी अखाड़ा, अग्नि अखाड़ा और जूना अखाड़ा आदि अस्तित्व में आए। उन्होंने कहा कि अखाड़ों ने केवल आध्यात्मिक साधना तक अपनी भूमिका सीमित नहीं रखी, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर धर्म, संस्कृति और तीर्थों की रक्षा में भी योगदान दिया।

1757 की घटना को बताया नागाओं के शौर्य का उदाहरण

श्रीमहंत ने बताया कि मथुरा और गोकुल की रक्षा से जुड़ी 1757 की घटना नागा संन्यासियों की वीरता और धर्म के प्रति समर्पण का उदाहरण है। जिसमें अहमद शाह अब्दाली की फौज को पराजित होकर भागना पड़ा। श्रीमहंत कहते हैं कि नागा संन्यासियों का इतिहास केवल साधना की परंपरा नहीं, बल्कि त्याग, तपस्या और धर्म के प्रति समर्पण की गाथा भी है।

हिन्दुस्थान समाचार / डॉ.रजनीकांत शुक्ला