पितृपक्ष : पंचबली की परंपरा से जीवंत हुई आस्था, यह कर्मकांड नहीं स्मरण, सेवा और श्रद्धा का अवसर
हरिद्वार, 05 अक्टूबर (हि.स.)। पितृ पक्ष के 16 दिनों में धर्मनगरी हरिद्वार का वातावरण श्रद्धा, आस्था और धार्मिक अनुष्ठानों से सराबोर है। भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर सर्वपितृ अमावस्या तक चलने वाला यह पक्ष पूर्वजों के स्मरण और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का पर्व माना जाता है। इन दिनों देशभर से श्रद्धालु गंगा तट पर पहुंचकर दिवंगत परिजनों की आत्मा की शांति के लिए तर्पण, पिंडदान और श्राद्ध कर रहे हैं।
हरकी पैड़ी, कुशावर्त घाट, सतीघाट और नारायणी शिला पर सुबह से ही श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ रही है। मंत्रोच्चार के बीच पितृ कर्म के बाद एक दृश्य सबसे अधिक देखने को मिल रहा है - वह है गायों को रोटी खिलाना और कौवों के लिए छतों व घाट किनारे अन्न-पानी रखना। पितरों के निमित्त निकाले गए भोजन का पहला हिस्सा इन जीवों को अर्पित किया जा रहा है।
क्या है पंचबली की परंपरा
सनातन परंपरा में श्राद्ध के दौरान भोजन तैयार होने के बाद उसका एक हिस्सा पितरों के नाम पर अलग रखा जाता है। इसी को पंचबली कहा जाता है। नारायणी शिला मंदिर के मुख्य पुजारी पंडित मनोज त्रिपाठी बताते हैं कि पंचबली में पांच के लिए भोजन निकाला जाता है - गाय, कौवा, श्वान, चींटी और देवी-देवता। इसके बाद ब्राह्मण भोज और दान-पुण्य की परंपरा पूरी की जाती है।
उनके अनुसार सनातन में गाय को पूजनीय माना गया है। मान्यता है कि गाय को भोजन कराने से पितरों को शांति मिलती है और सद्गति की कामना पूरी होती है। यही कारण है कि श्राद्ध पूरा करने के बाद कई परिवार सबसे पहले गाय को रोटी खिलाते हैं। गाय को करुणा, सेवा और पालन-पोषण का प्रतीक भी माना जाता है।
कौवा बना पितरों के स्मरण का प्रतीक
पितृ पक्ष में कौवे को भी विशेष महत्व दिया गया है। धार्मिक मान्यता में कौवे को पितरों का प्रतीक माना जाता है। विश्वास है कि कौवा धरती और आकाश के बीच विचरण करने वाला पक्षी है और उसे अर्पित किया गया अन्न पितरों तक पहुंचने का प्रतीकात्मक माध्यम बनता है। इसलिए कई परिवारों में आज भी भोजन करने से पहले कौवे के लिए भोजन निकाला जाता है और उसके आने की प्रतीक्षा की जाती है।
हरिद्वार में इस समय घाटों के आसपास और घरों की छतों पर कौवों के लिए रोटी और अन्न रखने का दृश्य आम है। श्रद्धालु इसे शुभ मानते हैं।
धार्मिक आस्था से आगे गाय और कौवे की भूमिका
गाय का महत्व केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि ग्रामीण जीवन और कृषि व्यवस्था में भी रहा है। दूध, दही, घी, मक्खन, छाछ, पनीर जैसे खाद्य पदार्थ और गोबर से जैविक खाद व ईंधन की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है। पंचगव्य - दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर को धार्मिक अनुष्ठानों में भी विशेष महत्व दिया जाता है।
वहीं कौवे पर्यावरणीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। मृत जीवों और जैविक अवशेषों को खाने के कारण वे प्राकृतिक सफाई व्यवस्था का हिस्सा बनते हैं। पितृ पक्ष में उन्हें भोजन कराने की परंपरा लोगों को पक्षियों के प्रति संवेदनशील भी बनाती है।
दान-पुण्य के साथ सेवा का संदेश
पितृ पक्ष की गतिविधियां केवल गाय और कौवों तक सीमित नहीं हैं। गंगा तट पर ब्राह्मणों को भोजन कराने, वस्त्र-अन्न दान और जरूरतमंदों की सहायता की परंपरा भी जारी है। बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपने पूर्वजों के नाम पर दान कर रहे हैं।
कुल मिलाकर पितृ पक्ष केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि स्मरण, श्रद्धा और सेवा का अवसर है। गाय, कौवा, श्वान और चींटी जैसे जीवों के लिए भोजन निकालने की परंपरा यह संदेश देती है कि मनुष्य अपने पूर्वजों के साथ-साथ अपने आसपास के जीव-जंतुओं और प्रकृति के प्रति भी संवेदनशील रहे। जब शहरों में प्राकृतिक स्थान कम हो रहे हैं, ऐसे में यह परंपरा करुणा और प्रकृति से संतुलन का जीवंत उदाहरण बन रही है।
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ.रजनीकांत शुक्ला

