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नंदा की विदाई के बीच हिमालय में खिला ‘संजीवनी’ का संसार

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नंदा की विदाई के बीच हिमालय में खिला ‘संजीवनी’ का संसार


-चेनाप फूलों की घाटी में बड़ी संख्या में खिला दुर्लभ पुष्प,हिमालयी जैव विविधता को लेकर प्रकृति प्रेमियों में उत्साह

गोपेश्वर, 07 सितंबर (हि.स.)। मां नंदा की कैलाश विदाई के बीच चमोली के उच्च हिमालय से प्रकृति प्रेमियों के लिए सुखद खबर सामने आई है। जिले के ऊंचाई वाले बुग्यालों और पहाड़ी क्षेत्रों में इस वर्ष दुर्लभ हिमालयी पुष्प फेन कमल बड़ी संख्या में खिला है। लंबे समय बाद इसकी इतनी अधिक मौजूदगी देखे जाने से प्रकृति प्रेमियों के साथ वन विभाग के अधिकारियों में भी उत्साह है। इसे हिमालयी जैव विविधता के लिहाज से सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है।

फिलहाल मां नंदा की कैलाश विदाई के बीच चमोली की ऊंची चोटियों पर खिला सफेद फेन कमल हिमालय की प्राकृतिक संपदा और उसकी नाजुक पारिस्थितिकी की याद दिला रहा है। दुर्लभ पुष्पों का यह संसार केवल प्रकृति के सौंदर्य का प्रतीक नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए इसे सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी का भी संदेश दे रहा है।

चेनाप फूलों की घाटी की ट्रैकिंग से लौटे प्रख्यात पर्यावरणविद् चंदन नयाल ने बताया कि इस बार घाटी के उच्च हिमालयी क्षेत्र में फेन कमल बड़ी संख्या में दिखाई दिया। उन्होंने कहा कि कई वर्षों बाद इस दुर्लभ पुष्प की इतनी अधिक मौजूदगी देखने को मिली है, जो प्रकृति और हिमालयी पर्यावरण के लिए सुखद संकेत है।

चमोली का उच्च हिमालय अपनी समृद्ध जैव विविधता के लिए विशेष पहचान रखता है। फूलों की घाटी, रूपकुंड, सप्तकुंड, नंदीकुंड, हेमकुंड, द्रोणागिरी और चेनाप जैसे क्षेत्रों में दुर्लभ पुष्पों और औषधीय महत्व वाली वनस्पतियों की कई प्रजातियां पाई जाती हैं। इनमें ब्रह्म कमल के साथ फेन कमल भी अपनी विशिष्ट पहचान रखता है।

फेन कमल ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में पाया जाने वाला आकर्षक सफेद पुष्प है। ऊंचे और पथरीले इलाकों में खिलने वाला यह फूल दूर से देखने पर चट्टानों के बीच जमे सफेद झाग जैसा दिखाई देता है। इसकी यही विशिष्ट बनावट इसे अन्य हिमालयी पुष्पों से अलग पहचान देती है। सामान्यतः इसका पुष्पन वर्षा ऋतु के बाद गर्मियों के अंतिम दौर से शरद ऋतु तक देखने को मिलता है।

फेन कमल को लेकर हिमालयी समाज में धार्मिक और पारंपरिक मान्यताएं भी जुड़ी हुई हैं। लोकमान्यता में इसे भगवान शिव के अघोर और औघड़ स्वरूप की आराधना से जोड़ा जाता है। इसके औषधीय महत्व के कारण पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में भी इसकी चर्चा मिलती है। इसे संजीवनी बूटी से जोड़े जाने की मान्यता भी प्रचलित है। रामायण की पौराणिक कथा में लक्ष्मण के मूर्छित होने पर हनुमान के द्रोणागिरी पर्वत से संजीवनी बूटी लाने का प्रसंग प्रसिद्ध है। हालांकि फेन कमल को संजीवनी बूटी के रूप में पहचानने का दावा वैज्ञानिक रूप से स्थापित तथ्य नहीं है और इसे लोकमान्यता के तौर पर ही देखा जाता है।

हिमालयी क्षेत्र में औषधीय और दुर्लभ वनस्पतियों के अनियंत्रित दोहन को लेकर समय-समय पर चिंता जताई जाती रही है। ऐसे में उच्च हिमालय में फेन कमल की अच्छी मौजूदगी प्रकृति प्रेमियों के लिए उम्मीद जगाने वाली है। हालांकि किसी एक प्रजाति के अधिक संख्या में खिलने को पूरे पारिस्थितिकी तंत्र की बेहतर सेहत का निर्णायक प्रमाण नहीं माना जा सकता। इसके लिए लंबे समय के वैज्ञानिक आंकड़ों और व्यवस्थित अध्ययन की आवश्यकता होती है।

फेन कमल हिमालय में करीब 4500 से 6000 मीटर की ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पाया जाता है। यह सामान्यतः जुलाई मध्य से अक्टूबर मध्य तक खिलता है। खास बात यह है कि यह उन ऊंची पहाड़ियों में भी दिखाई देता है, जहां चट्टानी क्षेत्र अधिक होते हैं। सफेद रंग का यह पुष्प दूर से देखने पर पत्तियों के बीच जमे साबुन के झाग जैसा दिखाई देता है। यही विशिष्ट बनावट इसे दूसरे हिमालयी पुष्पों से अलग पहचान देती है। ब्रह्म कमल की तरह इसमें विशेष सुगंध नहीं होती, लेकिन औषधीय महत्व के कारण इसे बेहद महत्वपूर्ण हिमालयी वनस्पतियों में गिना जाता है।

हिन्दुस्थान समाचार / जगदीश पोखरियाल