नैनीताल जिले में मिली दुर्लभ जैली फंगस ‘ग्यूपिनोप्सिस अल्पाइना’
अब तक ईरान व उत्तरी अमेरिका के कुछ क्षेत्रों में ही हाेती थी अल्पाइन जेलीकोन महाद्वीपों के पार इतनी दूर से इसके बीज यहाँ पहुंचने पर वैज्ञानिक भी हैरान
नैनीताल, 14 मई (हि.स.)। कुमाऊं विश्वविद्यालय के वनस्पति विज्ञान विभाग के शोधकर्ताओं ने नैनीताल के समीप पंगोट क्षेत्र में भारत में पहली बार दुर्लभ जैली फंगस ग्यूपिनोप्सिस अल्पाइना की खोज कर महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि हासिल की है। इस फंगस को सामान्यतः अल्पाइन जेलीकोन के नाम से जाना जाता है। यह दुर्लभ कवक यहां सड़ती हुई लकड़ी पर उगता हुआ पाया गया।
अब तक यह प्रजाति केवल ईरान और उत्तरी अमेरिका के कुछ क्षेत्रों में ही दर्ज की गई थी। हिमालयी क्षेत्र में इसकी मौजूदगी को वैज्ञानिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इस खोज के बाद पंगोट क्षेत्र में दुर्लभ कवकों की अन्य प्रजातियों के मिलने की संभावना भी बढ़ गई है। साथ ही यह प्रश्न भी उठ रहा है कि महाद्वीपों के पार इतनी दूर से इसके बीज यहाँ कैसे पहुंचे होंगे।
जानकारी के अनुसार डीएसबी परिसर के वनस्पति विज्ञान विभाग के एमएससी छात्रों का एक दल अगस्त 2024 में डॉ. प्रभा पंत के नेतृत्व में पंगोट क्षेत्र के शैक्षणिक भ्रमण पर गया था। इसी दौरान छात्रों ने इस विशेष फंगस को देखा। बाद में विभाग के डॉ. कपिल खुल्बे के नेतृत्व में इसका परीक्षण किया गया। एफआरआई के सेवानिवृत्त प्रोफेसर डॉ. एनके हर्ष ने इसकी पुष्टि की कि यह भारत में पहली बार खोजी गई प्रजाति है। इसके बाद शोधकर्ताओं ने प्रयोगशाला में विस्तृत अध्ययन कर शोध पत्र तैयार किया, जिसे प्रतिष्ठित करंट साइंस पत्रिका में प्रकाशित किया गया। फंगस की तस्वीर पत्रिका के मुखपृष्ठ पर भी छप चुकी है।
प्रवासी पक्षियों से जुड़े वैज्ञानिक संकेत
शोधकर्ताओं के अनुसार यह सवाल बेहद रोचक है कि इतने सूक्ष्म फंगस के बीजाणु महाद्वीपों के पार कैसे पहुंचे। डॉ. कपिल खुल्बे का मानना है कि प्रवासी पक्षी संभवतः इन बीजाणुओं को लंबी दूरी तक फैलाने में भूमिका निभाते हैं। शोध में लंबी दूरी के प्रसार की परिकल्पना भी प्रस्तुत की गई है, जिसमें माना गया है कि प्रवासी पक्षियों के साथ इसके बीज यहाँ पहुंचे होंगे।
हिमालयी जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण खोज
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह खोज हिमालयी क्षेत्र की सूक्ष्म जैव विविधता, पारिस्थितिक संतुलन और पर्यावरणीय परिवर्तनों को समझने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगी। इस प्रकार के अध्ययन भविष्य में जैव विविधता संरक्षण और पर्वतीय पारिस्थितिकी से जुड़े अनुसंधानों को नई दिशा देंगे।
कुलपति प्रो. डीएस रावत ने इस उपलब्धि को हिमालयी जैव विविधता अनुसंधान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कदम बताया। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के अनुसंधान एवं नवाचार फाउंडेशन के सहयोग से इस प्रकार के शोध कार्यों को प्रोत्साहन दिया जा रहा है।
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. नवीन चन्द्र जोशी

