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बोतलबंद पानी कितना सही, जानिए विशेषज्ञों की राय

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बोतलबंद पानी कितना सही, जानिए विशेषज्ञों की राय


नैनीताल, 06 मार्च (हि.स.)। उत्तराखंड की सरोवर नगरी नैनीताल और अन्य पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले लोगों तथा यहां आने वाले पर्यटकों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या यहाँ नलों से आने वाला पानी सीधे पीने योग्य है या घरों में वॉटर फिल्टर अथवा आरओ लगाना आवश्यक है ।

पानी के टीडीएस, पथरी की समस्या और बोतलबंद पानी को लेकर भी लोगों में कई तरह की धारणाएं बनी हुई हैं। विशेषज्ञों और जल संस्थान के अधिकारियों का कहना है कि सामान्य परिस्थितियों में नैनीताल का पानी सुरक्षित और पीने योग्य है, लेकिन कुछ बुनियादी सावधानियां बरतना हमेशा बेहतर रहता है।

पेयजल कैसे पहुंचता है घरों तक

अक्सर यह समझा जाता है कि नैनीताल शहर को सीधे झील का पानी पीने के लिए दिया जाता है, जबकि वास्तविकता इससे अलग है। शहर की पेयजल आपूर्ति झील किनारे लगाए गए बोरवेल और “रीवर बेड पेनीट्रेशन” जैसी तकनीक से प्राप्त पानी से की जाती है। इस प्रक्रिया में झील का पानी प्राकृतिक रूप से मिट्टी और पत्थरों से छनकर झील के पास बने कुवों में आता है, जिससे उसमें मौजूद कई अशुद्धियां स्वतः कम हो जाती हैं। इसके बाद जल संस्थान के ट्रीटमेंट प्लांट में पानी का फिल्ट्रेशन, क्लोरीनेशन और नियमित लैब परीक्षण किया जाता है। गुणवत्ता जांच के बाद ही इसे शहर में आपूर्ति की जाती है।

टीडीएस और पीएच के मानक क्या कहते हैं

जल संस्थान के कैमिस्ट योगेंद्र पाल के अनुसार नैनीताल के पानी की गुणवत्ता सामान्यतः अच्छी पाई जाती है। यहां के पानी का टीडीएस सामान्यतः 500 से कम रहता है, जो सुरक्षित श्रेणी में माना जाता है। भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) के मानकों के अनुसार 500 से 2000 तक का टीडीएस स्वीकार्य है, हालांकि 500 से नीचे होना बेहतर माना जाता है।

इसी तरह पानी का पीएच स्तर लगभग 7.2 से 7.8 के बीच पाया गया है, जबकि सुरक्षित सीमा 6.5 से 8.5 के बीच मानी जाती है। इसका अर्थ है कि पानी न तो अधिक अम्लीय है और न ही अधिक क्षारीय।

पानी की कठोरता और पहाड़ों की चट्टानें

नैनीताल क्षेत्र में पानी की हार्डनेस यानी कठोरता लगभग 300 से 430 के बीच पाई जाती है, जबकि मानक सीमा 200 से 600 तक स्वीकार्य है। विशेषज्ञ बताते हैं कि यह कठोरता क्षेत्र की चूना पत्थर (लाइमस्टोन) और मिट्टी की चट्टानों के कारण होती है, जिनसे पानी में कैल्शियम और मैग्नीशियम कार्बोनेट व बाई कार्बोनेट घुल जाते हैं। हालांकि अच्छी बात यह है कि पानी को उबालने पर ये तत्व टूटकर ऊपर तैरने लगते हैं या नीचे बैठ जाते हैं। इसके बाद कपड़े या फिल्टर से छानकर पानी को आसानी से पीने योग्य बनाया जा सकता है।

क्या पथरी केवल पानी से होती है?

लोगों में यह धारणा भी बनी हुई है कि पहाड़ी क्षेत्रों के पानी से पथरी की समस्या अधिक होती है। विशेषज्ञ बताते हैं कि पथरी केवल पानी के कारण नहीं होती, बल्कि खानपान, जीवनशैली, पानी कम पीना और अन्य स्वास्थ्य कारण भी इसके लिए जिम्मेदार हो सकते हैं।

आरओ लगाने से पहले जांच जरूरी

विशेषज्ञों का कहना है कि हर घर में आरओ लगाना आवश्यक नहीं है। सबसे पहले घर के पानी की लैब में जांच करानी चाहिए। यदि जांच में कोलीफॉर्म बैक्टीरिया, आयरन, कैल्शियम, मैग्नीशियम या अन्य तत्व मानक से अधिक पाए जाते हैं और समस्या साधारण उबालने या छानने से दूर नहीं होती, तभी आरओ लगाने पर विचार करना चाहिए।

अनावश्यक रूप से आरओ लगाने से पानी में मौजूद जरूरी खनिज भी निकल जाते हैं। ऐसे में शरीर को आवश्यक खनिज नहीं मिल पाते और लंबे समय में स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। यदि आरओ लगाया भी जाए तो पानी का टीडीएस 200 से 300 के बीच रखना बेहतर माना जाता है। इससे कम होने पर पानी लगभग बारिश के डिस्टिल्ड वाटर जैसा हो जाता है, जिसमें जरूरी खनिज नहीं रहते।

आरओ बेचने के लिए फैलाए जाते हैं भ्रम

विशेषज्ञों के अनुसार कई कंपनियां पानी की जांच दिखाने के लिए घर के पानी में तांबा या लोहे के इलेक्ट्रोड डालकर बिजली प्रवाहित करती हैं, जिससे पानी काला या भूरा दिखाई देने लगता है। इससे लोगों को भ्रम होता है कि उनका पानी गंदा है। वास्तव में यह रंग इलेक्ट्रोड के घिसने या खनिजों के जलने के कारण भी हो सकता है। इसलिए ऐसे प्रदर्शनों के आधार पर निर्णय लेने के बजाय अधिकृत लैब में जांच कराना ही उचित है।

हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. नवीन चन्द्र जोशी