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दार्जिलिंग के ‘सिसने पाहा’ मेंढक की आनुवंशिक विविधता बेहद कम, वैज्ञानिकों ने जताई चिंता

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दार्जिलिंग के ‘सिसने पाहा’ मेंढक की आनुवंशिक विविधता बेहद कम, वैज्ञानिकों ने जताई चिंता


-बीएचयू और कलकत्ता विवि का संयुक्त अध्ययन, 57 स्थानों से लिए गए नमूनों का विश्लेषण

वाराणसी, 02 अक्टूबर (हि.स.)। हिमालय जैव विविधता हॉटस्पॉट के दार्जिलिंग और कलिम्पोंग क्षेत्र में पाया जाने वाला मार्बल्ड कैस्केड फ्रॉग (अमोलॉप्स मारमोरेटस), जिसे स्थानीय लोग ‘सिसने पाहा’ या ‘सिसने पा’ के नाम से जानते हैं, आनुवंशिक रूप से कमजोर स्थिति में है। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (बीएचयू) और कलकत्ता विश्वविद्यालय के संयुक्त शोध में सामने आया है कि इस मेंढक की दार्जिलिंग क्षेत्र की आबादी में आनुवंशिक विविधता एशिया के अन्य क्षेत्रों की आबादी की तुलना में बेहद कम है। वैज्ञानिकों ने इसे संरक्षण की दृष्टि से गंभीर संकेत माना है।

देश के पांच संस्थानों के 12 वैज्ञानिकों की टीम ने दार्जिलिंग हिल रीजन में 57 स्थानों पर सर्वेक्षण किया। 200 मीटर से लेकर 2400 मीटर तक की ऊंचाई वाले पहाड़ी झरनों, तेज धाराओं और चट्टानी नालों में मेंढकों की तलाश की गई। सर्वेक्षण के दौरान कुल 60 मेंढक देखे गए, जिनमें से 35 के डीएनए का विश्लेषण किया गया। नमूनों की प्रजातिगत पहचान की पुष्टि प्राणी सर्वेक्षण भारत (जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया), कोलकाता से कराई गई। यह अध्ययन अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका बीएमसी जेनेटिक्स में प्रकाशित हुआ है।

बीएचयू के ज्ञान लैब के जीन विज्ञानी प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे के अनुसार, शोधकर्ताओं ने दो मानक जीन 16एस आरआरएनए और सीओआई का विस्तृत अध्ययन किया। दार्जिलिंग से प्राप्त डीएनए अनुक्रमों की दुनिया के विभिन्न हिस्सों से उपलब्ध अनुक्रमों से तुलना की गई। विश्लेषण में पाया गया कि दार्जिलिंग की आबादी में आनुवंशिक विविधता सबसे कम है, जबकि म्यांमार, दक्षिण-पूर्व एशिया और चीन की आबादियों में विविधता अपेक्षाकृत अधिक है। दार्जिलिंग और चीन की आबादियों के बीच आनुवंशिक दूरी सबसे अधिक मिली, जबकि म्यांमार और दक्षिण-पूर्व एशिया की आबादियों के बीच यह दूरी अपेक्षाकृत कम रही। वैज्ञानिकों के अनुसार, इससे संकेत मिलता है कि दार्जिलिंग की आबादी लंबे समय से अन्य क्षेत्रों की आबादी से आनुवंशिक रूप से अलग-थलग रही है।

शोध के प्रथम लेखक कुमरेश मंडल के मुताबिक, दार्जिलिंग की आबादी संभवतः ऐतिहासिक रूप से एक छोटे समूह से शुरू हुई। इसे ‘फाउंडर इफेक्ट’ कहा जाता है। इसके बाद आबादी का तेजी से विस्तार हुआ। आनुवंशिक वंशवृक्ष के विश्लेषण में दार्जिलिंग के नमूने एक अलग शाखा में पाए गए। इनकी शाखाएं भी अपेक्षाकृत छोटी थीं, जो सीमित आनुवंशिक विविधता की ओर संकेत करती हैं।

करीब 1.74 करोड़ वर्ष पुराना साझा पूर्वज

शोध में डीएनए आंकड़ों के आधार पर इस प्रजाति के विकासक्रम का समय भी अनुमानित किया गया। समय-आधारित विश्लेषण के अनुसार, एशिया में इस प्रजाति का साझा पूर्वज करीब 1.74 करोड़ वर्ष पहले मौजूद था। शोधकर्ताओं के अनुमान के मुताबिक दक्षिण एशियाई यानी दार्जिलिंग शाखा करीब 1.12 करोड़ वर्ष पहले अलग हुई, जबकि वर्तमान दार्जिलिंग वंश में तेजी से विस्तार करीब 9.4 लाख वर्ष पहले हुआ।

भौगोलिक अलगाव और सीमित जीन प्रवाह बड़ी वजह

वैज्ञानिकों के अनुसार, दार्जिलिंग की आबादी में कम आनुवंशिक विविधता के पीछे कई ऐतिहासिक और भौगोलिक कारण हैं। इनमें भौगोलिक अलगाव, सीमित जीन प्रवाह और अतीत में हुई जनसंख्या संबंधी घटनाएं प्रमुख हैं। कम आनुवंशिक विविधता वाली आबादी भविष्य में पर्यावरणीय बदलावों के प्रति अधिक संवेदनशील हो सकती है। शोधकर्ताओं ने जलवायु परिवर्तन और बीमारियों के दबाव के साथ अंतःप्रजनन के संभावित जोखिमों को भी संरक्षण के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना है।

पारंपरिक शिकार से बढ़ रहा अतिरिक्त दबाव

वैज्ञानिकों ने स्थानीय स्तर पर मेंढकों के शिकार को भी इस आबादी के लिए अतिरिक्त दबाव बताया है। क्षेत्र में मेंढकों को लंबे समय से भोजन और पारंपरिक उपचार के लिए पकड़े जाने की परंपरा रही है। बरसात के मौसम में रात के समय चट्टानों और झाड़ियों पर बैठे मेंढकों को पकड़ना कई इलाकों में आम है। क्षेत्र में मुख्य रूप से अमोलॉप्स मारमोरेटस और नानोराना लीबिगाई जैसी प्रजातियों का उपयोग भोजन के लिए किया जाता है। शोधकर्ताओं के मुताबिक, ‘सिसने पाहा’ अपेक्षाकृत व्यापक रूप से पाया जाता है इसलिए इसके शिकार का दबाव भी अधिक हो सकता है।

संरक्षण नीति में स्थानीय आबादी को मिले प्राथमिकता

कलकत्ता विश्वविद्यालय के प्राणि विज्ञान विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. राकेश तामांग के नेतृत्व में हुए इस अध्ययन को दार्जिलिंग क्षेत्र में इस प्रजाति का पहला संयुक्त आकारिकी और आनुवंशिक अध्ययन बताया गया है। डॉ. तामांग के अनुसार, दार्जिलिंग की आबादी अलग-थलग और कम आनुवंशिक विविधता वाली है। इसलिए क्षेत्र की संरक्षण नीति तैयार करते समय इस आबादी की विशिष्ट आनुवंशिक स्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है।

प्रो. ज्ञानेश्वर चौबे ने कहा कि हिमालयी मेंढकों की आनुवंशिक विविधता पर अभी सीमित शोध हुआ है। पश्चिमी घाट की तुलना में पूर्वी हिमालय इस क्षेत्र में पीछे है। उन्होंने कहा कि संरक्षण केवल आवास बचाने तक सीमित नहीं होना चाहिए। स्थानीय समुदायों को जागरूक करना और उनके सहयोग से संरक्षण कार्यक्रम चलाना भी जरूरी है।

भविष्य में बारकोडिंग और ई-डीएनए निगरानी में मददगार होगा डेटा

शोध में पहली बार दार्जिलिंग क्षेत्र के अमोलॉप्स मारमोरेटस और नानोराना लीबिगाई नमूनों से सीओआई जीन के डीएनए अनुक्रम तैयार किए गए हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार, ये अनुक्रम भविष्य में प्रजाति की पहचान के लिए डीएनए बारकोडिंग और पर्यावरणीय डीएनए आधारित निगरानी में उपयोगी हो सकते हैं।

शोधकर्ताओं ने अनियमित शिकार पर नियंत्रण, स्थानीय समुदायों में जागरूकता बढ़ाने और मेंढकों के प्राकृतिक आवासों की सुरक्षा की सिफारिश की है। खास तौर पर निचली और मध्यम ऊंचाई वाली पहाड़ी धाराओं, झरनों और चट्टानी जलधाराओं के संरक्षण पर जोर दिया गया है।

वैज्ञानिकों के मुताबिक, मेंढक केवल जैव विविधता का हिस्सा नहीं हैं बल्कि जल गुणवत्ता और पारिस्थितिकी तंत्र की स्थिति के महत्वपूर्ण संकेतक भी माने जाते हैं। ऐसे में ‘सिसने पाहा’ की आबादी का संरक्षण दार्जिलिंग के पहाड़ी पारिस्थितिकी तंत्र की निगरानी के लिए भी महत्वपूर्ण हो सकता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / श्रीधर त्रिपाठी