नौकरी छोड़ी, सिलबट्टा थामा और पहाड़ी स्वाद को दिलाई पहचान
नैनीताल, 11 सितंबर (हि.स.)। रामगढ़ विकासखंड के नथुवाखान निवासी युवा हरीश बिष्ट ने नौकरी छोड़कर गांव लौटने के बाद पारंपरिक पहाड़ी उत्पादों को स्वरोजगार का माध्यम बनाया है। सिलबट्टे पर तैयार मसालों युक्त पहाड़ी नमक से शुरू हुआ उनका यह प्रयास आज लगभग 11 लाख रुपये के वार्षिक कारोबार तक पहुंच गया है और लगभग 35 महिलाओं सहित कई लोगों को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से आय का अवसर मिल रहा है।
हरीश बिष्ट के पहाड़ी नमक में जीरा, हींग, लहसुन, अजवाइन, भांग दाना, जाखिया, भंगीरा, पुदीना, राई और सेंधा नमक जैसे पारंपरिक मसालों का इस्तेमाल होता है। सिलबट्टे पर पीसने की पारंपरिक विधि इसे विशिष्ट स्वाद और पहाड़ी पहचान देती है। स्थानीय लोगों के साथ पर्यटकों के बीच भी इसकी मांग है।
हरीश के अनुसार विभिन्न संस्थाओं में काम के दौरान उन्होंने टिकाऊ खेती, पोषण वाटिका तथा हर्बल और जैविक उत्पादों के निर्माण व विपणन का अनुभव हासिल किया। वर्ष 2022 में उन्होंने पार्ट टाइम स्तर पर हर्बल और पहाड़ी उत्पादों का निर्माण एवं विपणन शुरू किया और 2023 से इसे पूर्णकालिक व्यवसाय बना लिया।
वर्तमान में वे पहाड़ी नमक के अलावा बुरांश चाय, हर्बल चाय, बुरांश जूस, चटनी, रोजमेरी, तुलसी, थाइम, नेटल, ऑर्गेनो, कैमोमाइल, लेमन ग्रास, भांग दाना, मड़वा आटा, मल्टीग्रेन आटा और पहाड़ी दाल सहित अनेक उत्पाद तैयार कर रहे हैं।
इन उत्पादों की बिक्री नैनीताल, कैंची धाम, भीमताल, खुरपाताल, नौकुचियाताल, रामनगर, कौसानी, अल्मोड़ा और मुक्तेश्वर सहित 250 से अधिक पर्यटन स्थलों पर की जा रही है। साथ ही ग्राहक घर से भी उत्पाद मंगवा रहे हैं और ऑनलाइन माध्यम से भी इनकी बिक्री हो रही है। वर्ष 2022 में जहां उनका कारोबार 10 हजार रुपये से भी कम था, वहीं लगातार प्रयास और बाजार से जुड़ाव के चलते वार्षिक कारोबार करीब 11 लाख रुपये तक पहुंच गया है।
इस सफर में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन से मिली 25 हजार रुपये की आर्थिक सहायता भी उपयोगी रही। इससे उन्होंने तौलने की मशीन, सीलिंग मशीन और अन्य आवश्यक उपकरण खरीदे। हरीश बिष्ट का मानना है कि पर्यटक स्थलों, रेलवे स्टेशनों, हवाई अड्डों, मॉल, संग्रहालयों और सरकारी अतिथि गृहों में स्थानीय उत्पादों के लिए बेहतर बाजार और स्टॉल उपलब्ध कराए जाएं तो पहाड़ के अनेक परिवारों को स्वरोजगार से जोड़ा जा सकता है। उनकी कहानी स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक ज्ञान को बाजार से जोड़कर गांव में ही आत्मनिर्भरता की संभावनाओं को सामने रखती है।
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. नवीन चन्द्र जोशी

