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नीट परीक्षा पर उठते सवाल-सपनों, संघर्ष और मानसिक दबाव के बीच जूझता युवा भारत (लेखिका-पूनम झा)

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नीट परीक्षा पर उठते सवाल-सपनों, संघर्ष और मानसिक दबाव के बीच जूझता युवा भारत (लेखिका-पूनम झा)


कठुआ, 30 मई (हि.स.)। भारत की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट आज केवल एक प्रतियोगी परीक्षा भर नहीं रह गई है बल्कि यह लाखों युवाओं के सपनों, संघर्ष और भविष्य का प्रतीक बन चुकी है। हर वर्ष देशभर से लाखों छात्र-छात्राएँ डॉक्टर बनने की आकांक्षा के साथ इस परीक्षा में शामिल होते हैं। यह परीक्षा उनके वर्षों की मेहनत, त्याग और समर्पण का परिणाम होती है।

सरकार द्वारा इतनी विशाल परीक्षा के आयोजन के लिए व्यापक स्तर पर तैयारियाँ की जाती हैं लेकिन कुछ असामाजिक तत्वों द्वारा अपने निजी लाभ के लिए की गई गड़बड़ियाँ पूरी व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगा देती हैं। नीट की तैयारी कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं है। विद्यार्थी वर्षों तक कठिन परिश्रम करते हैं, अपनी दिनचर्या को अनुशासित रखते हैं और सामाजिक जीवन से लगभग दूरी बना लेते हैं। वे अपने लक्ष्य को पाने के लिए त्योहारों और पारिवारिक अवसरों तक का त्याग कर देते हैं। ऐसे में जब परीक्षा के बाद पेपर लीक या अन्य गड़बड़ियों की खबर सामने आती है तो यह उनके मनोबल पर गहरा आघात करती है। हालांकि पूर्व की तुलना में वर्तमान समय में इस प्रकार की घटनाओं पर नियंत्रण के लिए ठोस कदम उठाए जा रहे हैं फिर भी अनिश्चितता की स्थिति पूरी तरह समाप्त नहीं हो पाई है।

सबसे अधिक चुनौतीपूर्ण स्थिति तब उत्पन्न होती है जब छात्र परीक्षा देकर परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे होते हैं।

इसी दौरान यदि पुनः परीक्षा या किसी गड़बड़ी की खबर आती है तो उन्हें दोबारा उसी तनावपूर्ण चक्र में लौटना पड़ता है। इस स्थिति में उनका आत्मविश्वास प्रभावित होता है और मानसिक संतुलन डगमगाने लगता है। कुछ कोचिंग संस्थानों द्वारा केवल चुनिंदा छात्रों पर ध्यान केंद्रित करना, विशेषकर उन छात्रों को नजरअंदाज करना जो सीमा रेखा पर होते हैं, उनके मनोवैज्ञानिक दबाव को और बढ़ा देता है। इस तरह की परिस्थितियों का सीधा असर छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। तनाव, चिंता, अनिद्रा, आत्मविश्वास की कमी जैसी समस्याएँ आम हो जाती हैं। यह आवश्यक है कि परिवार, शिक्षक और शिक्षण संस्थान मिलकर छात्रों को भावनात्मक सहयोग प्रदान करें। मानसिक स्वास्थ्य को नजरअंदाज करना स्थिति को और गंभीर बना सकता है। विद्यार्थियों को यह समझाना जरूरी है कि एक परीक्षा ही जीवन का अंतिम सत्य नहीं है।

हालांकि संबंधित एजेंसियाँ लगातार सुधार के प्रयास कर रही हैं और सरकार भी इस विषय पर गंभीर है लेकिन जमीनी स्तर पर पारदर्शिता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए और ठोस कदम उठाने की आवश्यकता है। ऐसी प्रणाली विकसित करनी होगी जिसमें छात्रों का विश्वास पूरी तरह कायम रह सके और उनकी मेहनत सुरक्षित महसूस हो। यह समझना आवश्यक है कि गलत तरीकों से प्राप्त सफलता केवल अल्पकालिक होती है। चिकित्सा जैसे जिम्मेदार पेशे में स्थायी सफलता के लिए गहन ज्ञान, कौशल और ईमानदार मेहनत ही सबसे बड़ा आधार है।

नीट की तैयारी कर रहे छात्रों को चाहिए कि वे अफवाहों और नकारात्मक विचारों से दूर रहें। नियमित अभ्यास, मॉक टेस्ट, समय प्रबंधन और आत्मविश्वास सफलता की कुंजी हैं। हर छात्र को अपने अध्ययन के तरीके को समझना चाहिए। कुछ के लिए सुबह का समय बेहतर होता है तो कुछ के लिए रात का। महत्वपूर्ण यह है कि जब मन और दिमाग ताजा हो तभी पढ़ाई करें। यदि किसी भी छात्र के मन में नकारात्मक विचार उत्पन्न हों तो उसे तुरंत परिवार, मित्र या काउंसलर से बात करनी चाहिए। सहायता मांगना कमजोरी नहीं बल्कि समझदारी का संकेत है। नीट केवल एक परीक्षा नहीं बल्कि भारतीय युवा की आकांक्षाओं और संघर्षों का दर्पण है। आवश्यकता है कि परीक्षा प्रणाली को अधिक पारदर्शी, सुरक्षित और भरोसेमंद बनाया जाए। अंततः हर विद्यार्थी के लिए यही संदेश है कि “खुद पर विश्वास रखें, क्योंकि सच्ची मेहनत कभी व्यर्थ नहीं जाती।”

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हिन्दुस्थान समाचार / सचिन खजूरिया