पिंगला में फिर सजने लगी पौराणिक कथाओं की रंगीन दुनिया, कपड़ों से गहनों तक पहुंची पाटचित्र कला
मेदिनीपुर, 08 अगस्त (हि.स.)। पश्चिम मेदिनीपुर जिले के पिंगला के नयाग्राम की प्रसिद्ध पाटचित्र कला अब अपने पारंपरिक स्वरूप से आगे बढ़कर आधुनिक जीवन का हिस्सा बन रही है। कभी घर-घर घूमकर रामायण, महाभारत, मनसामंगल, चंडीमंगल और कृष्णलीला की कथाएं सुनाकर जीवन चलाने वाले पटुआ कलाकार अब साड़ी, सलवार, टी-शर्ट, जूते, बैग, गहने, तकिए और बिस्तर जैसी वस्तुओं पर पाटचित्र उकेर रहे हैं। पूजा पंडालों में भी इस लोककला की मांग बढ़ रही है।
‘पाट’ शब्द संस्कृत के ‘पट्ट’ से आया है, जिसका अर्थ वस्त्र है। सामान्य तौर पर कपड़े या कागज पर विशेष शैली में बनाए गए चित्रों को पाट कहा जाता है। कलाकार लंबे पाट को लाठी में लपेटकर गीत, पाठ और कथावाचन के माध्यम से उससे जुड़ी कथा सुनाते थे।
एक समय नयाग्राम के पटुआ कलाकार इसी परंपरा से अपना जीवन चलाते थे। माथे पर नमाज का काला निशान और चेहरे पर दाढ़ी लिए कलाकार गीत गाते हुए पाट खोलते थे। कभी बिहुला और मनसामंगल की कथा सुनाई जाती, तो कभी सीता के वनवास की। कई कलाकार रोजा रखते हुए भी हिंदू देवी-देवताओं की कथाएं गाते हुए घर-घर जाते थे। बदले में उन्हें चावल, दाल, आलू, कच्चे केले और कभी-कभी रुपये मिलते थे।
समय के साथ यह पेशा समाप्ति की ओर बढ़ा, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में नई सोच और प्रयोगों से पाटचित्र फिर उभरने लगा है। अब हाथ के पंखे से लेकर चाय के बर्तन तक पर पाटचित्र बनाया जा रहा है। विदेशी पर्यटकों की बढ़ती रुचि और कलाकारों के रूस, अमेरिका, स्कॉटलैंड, ऑस्ट्रेलिया तथा जापान तक पहुंचने से इस कला को नया बाजार मिला।
इस दिशा में विद्यासागर विश्वविद्यालय के नृविज्ञान विभाग ने भी महत्वपूर्ण पहल की। नई पीढ़ी के कलाकारों को प्रशिक्षण देकर उन्हें आधुनिक परिधान और उपयोगी वस्तुओं पर पाटचित्र बनाने की जानकारी दी गई।
रिसॉर्ट परिधान, नृत्य परिधान, किमोनो, जैकेट, स्कार्फ, कुशन कवर, लैपटॉप कवर, बैग, अंगूठी और गले के आभूषण तक पर पाटचित्र उकेरने का प्रशिक्षण दिया गया।
कलाकार प्रसन्न चित्रकर के अनुसार, विश्वविद्यालय की प्रशिक्षण कार्यशाला ने पाटचित्र की दुनिया में नया रास्ता खोला है। वहीं संजीव चित्रकर ने कहा कि कपड़े, जूते और बैग में पाटचित्र लोकप्रिय हो रहा है और विदेशों में भी इसे पसंद किया जा रहा है।
हालांकि बड़े स्तर पर विस्तार के लिए बड़ी संस्थाओं के साथ समन्वय जरूरी है।
नृविज्ञान विभाग के शोधकर्ता सुमहान बंद्योपाध्याय ने बताया कि पाटचित्र के आधुनिकीकरण और इसे लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से प्रशिक्षण दिया गया। इससे कलाकारों का विदेशों से संपर्क भी मजबूत हुआ है।
करीब 70 वर्षीय कलाकार शमशाद चित्रकर ने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि कभी एक पाटचित्र की कीमत 25 रुपये से अधिक नहीं मिलती थी।
कोलकाता जाकर पूरे दिन मेहनत करने के बाद भी मामूली आमदनी ही हो पाती थी। इसी कारण कई कलाकारों ने यह पेशा छोड़ दिया था। अब उन्हें लगता है कि वह कठिन दौर पीछे छूट गया है।
कलाकार रशीद चित्रकार ने बताया कि पहले पंडाल के कुछ हिस्सों में पाटचित्र बनाया जाता था, लेकिन अब पूरे पंडाल की जिम्मेदारी मिल रही है। इस वर्ष बड़े चित्रकार के साथ तीन पूजा समितियों की बातचीत चल रही है। कलाकार अब पाटचित्र के माध्यम से धार्मिक कथाओं के साथ सामाजिक संदेश भी देने की तैयारी कर रहे हैं।
पिंगला की यह पारंपरिक कला अब कपड़े और कागज तक सीमित नहीं रही। आधुनिक परिधान, घरेलू वस्तुएं, आभूषण और पूजा पंडालों में इसकी बढ़ती मांग ने कलाकारों के लिए रोजगार और आय के नए अवसर पैदा किए हैं।
हिन्दुस्थान समाचार / अभिमन्यु गुप्ता

