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बलरामपुर : राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ,25 हजार के छोटे ऋण ने बदली पूनम की तकदीर

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बलरामपुर : राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ,25 हजार के छोटे ऋण ने बदली पूनम की तकदीर


बलरामपुर, 01 जुलाई (हि.स.)। कई बार छोटी सी मदद किसी व्यक्ति के जीवन में बड़ा बदलाव लेकर आती है। बलरामपुर जिले के ग्राम लुरघुट्टा की रहने वाली पूनम कुशवाहा की कहानी भी इसी बदलाव की मिसाल है। कभी परिवार की आर्थिक तंगी से जूझने वाली पूनम आज बकरी पालन और सब्जी उत्पादन के माध्यम से न केवल अपने परिवार की आय बढ़ा रही हैं, बल्कि गांव की अन्य महिलाओं के लिए भी प्रेरणा बन चुकी हैं। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन (एनआरएलएम) के तहत स्व-सहायता समूह से मिले मात्र 25 हजार रुपये के ऋण ने उनके जीवन की दिशा बदल दी।

कलेक्टर चंदन संजय त्रिपाठी के मार्गदर्शन तथा जिला पंचायत की मुख्य कार्यपालन अधिकारी नयनतारा सिंह तोमर के नेतृत्व में जिले में राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से ग्रामीण महिलाओं को आर्थिक रूप से सशक्त बनाने के लिए लगातार प्रयास किए जा रहे हैं। इन प्रयासों का सकारात्मक परिणाम अब गांव-गांव में दिखाई देने लगा है। पूनम कुशवाहा इसकी एक सफल और प्रेरणादायक उदाहरण हैं।

कुछ वर्ष पहले तक पूनम के परिवार की स्थिति सामान्य ग्रामीण परिवारों की तरह संघर्षपूर्ण थी। उनके पति आनंद कुशवाहा की सीमित आय से घर का खर्च चलाना मुश्किल हो जाता था। बच्चों की पढ़ाई, घरेलू जरूरतें और भविष्य की चिंताएं हमेशा परिवार के सामने रहती थीं। पूनम भी परिवार की आर्थिक जिम्मेदारी में भागीदारी निभाना चाहती थीं, लेकिन पर्याप्त पूंजी नहीं होने के कारण वे कोई व्यवसाय शुरू नहीं कर पा रही थीं।

इसी दौरान उन्होंने राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के अंतर्गत संचालित पार्वती महिला स्व-सहायता समूह की सदस्यता ली। समूह से जुड़ने के बाद उन्होंने नियमित बचत की, बैठकों में भाग लिया और आजीविका से जुड़े विभिन्न प्रशिक्षण प्राप्त किए। समूह के माध्यम से उन्हें बैंक से जुड़ने का अवसर मिला और 25 हजार रुपये का ऋण उपलब्ध कराया गया। यही छोटी सी आर्थिक सहायता उनके लिए नई शुरुआत का आधार बन गई।

ऋण मिलने के बाद पूनम ने पूरी योजना के साथ बकरी पालन का कार्य शुरू किया। उन्होंने उन्नत नस्ल की बकरियां खरीदीं और पशुपालन विभाग द्वारा बताए गए वैज्ञानिक तरीकों को अपनाते हुए उनका पालन-पोषण किया। उचित देखभाल, समय पर टीकाकरण और संतुलित आहार के कारण उनकी बकरियों की संख्या और गुणवत्ता दोनों में लगातार सुधार होता गया। समय-समय पर बकरियों की बिक्री से उन्हें अच्छी आय मिलने लगी।

बकरी पालन के साथ-साथ पूनम ने उपलब्ध संसाधनों का बेहतर उपयोग करने का निर्णय लिया। बकरियों से मिलने वाली जैविक खाद का उपयोग उन्होंने अपनी घरेलू बाड़ी में किया। इसके बाद उन्होंने टमाटर, मिर्च, बैंगन सहित कई मौसमी सब्जियों की खेती शुरू की। जैविक खाद के उपयोग से फसल की गुणवत्ता अच्छी रही और उत्पादन भी बढ़ा। गांव तथा आसपास के स्थानीय बाजारों में इन सब्जियों की अच्छी मांग मिलने लगी, जिससे उनकी आमदनी का एक और स्थायी स्रोत तैयार हो गया।

आज पूनम की मेहनत का परिणाम पूरे परिवार को मिल रहा है। पहले जहां घर का खर्च चलाना चुनौती था, वहीं अब परिवार की आर्थिक स्थिति पहले की तुलना में काफी मजबूत हो गई है। बच्चों की पढ़ाई बेहतर तरीके से हो रही है, घरेलू जरूरतें समय पर पूरी हो रही हैं और भविष्य के लिए भी बचत होने लगी है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्होंने स्व-सहायता समूह से लिया गया ऋण समय पर चुकाना भी शुरू कर दिया है, जिससे उनकी आर्थिक विश्वसनीयता भी बढ़ी है।

पूनम का कहना है कि स्व-सहायता समूह से जुड़ना उनके जीवन का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय साबित हुआ। उनके अनुसार, पहले लगता था कि बिना बड़ी पूंजी के कुछ नहीं किया जा सकता, लेकिन समूह से मिले 25 हजार रुपये के ऋण ने मेरी सोच बदल दी। आज मैं आत्मविश्वास के साथ अपने परिवार की आय बढ़ा रही हूं और गांव की अन्य महिलाओं को भी स्वरोजगार अपनाने के लिए प्रेरित कर रही हूं।

राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के माध्यम से जिले में अनेक महिलाओं को स्वरोजगार से जोड़ने का अभियान लगातार जारी है। स्व-सहायता समूहों के जरिए महिलाओं को बचत, बैंकिंग, प्रशिक्षण और ऋण जैसी सुविधाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं, जिससे वे अपने छोटे-छोटे व्यवसाय शुरू कर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं। पूनम कुशवाहा की सफलता इस बात का प्रमाण है कि यदि सही समय पर मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और थोड़ी आर्थिक सहायता मिल जाए तो ग्रामीण महिलाएं न केवल अपने परिवार की आर्थिक स्थिति बदल सकती हैं, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा भी बन सकती हैं।

हिन्दुस्थान समाचार / विष्णु पांडेय