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(संशाेधित) मप्र में दिव्यांग संस्थाओं के भुगतान का विकेंद्रीकरण, अब जिलों से जारी होगी राशि

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(संशाेधित) मप्र में दिव्यांग संस्थाओं के भुगतान का विकेंद्रीकरण, अब जिलों से जारी होगी राशि


(संशाेधित) मप्र में दिव्यांग संस्थाओं के भुगतान का विकेंद्रीकरण, अब जिलों से जारी होगी राशि


- 55 संस्थाओं, 3,410 विद्यार्थियों और हजारों लाभार्थियों से जुड़ी व्यवस्था में बड़ा बदलाव

- उपलब्ध निधि के समयबद्ध उपयोग और भुगतान में देरी रोकने पर जोर

भोपाल, 21 सितंबर (हि.स.)। मध्य प्रदेश में दिव्यांग बच्चों की शिक्षा, प्रशिक्षण और पुनर्वास से जुड़ी संस्थाओं के भुगतान की व्यवस्था अब राजधानी भोपाल-केंद्रित प्रक्रिया से जिला स्तर की ओर बढ़ेगी। सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग ने गत दिनों जारी आदेश में उपलब्ध निधि के उपयोग और भुगतान की प्रक्रिया को स्पष्ट करते हुए कलेक्टरों और विभागीय अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की है। नई व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य उपलब्ध राशि के बावजूद भुगतान को महीनों तक लंबित रहने से रोकना और जरूरत के मुताबिक समय पर भुगतान सुनिश्चित करना है।

दरअसल विभाग के आदेश में यह स्थिति सामने आई है कि कई मामलों में पर्याप्त ब्याज निधि उपलब्ध होने के बावजूद भुगतान लंबित रखा गया और बाद में कई महीनों की राशि एक साथ ई-पेमेंट के माध्यम से जारी की गई। इसलिए अब जिला स्तर पर उपलब्ध निधि के अनुसार निर्धारित मदों में भुगतान की कार्रवाई आगे बढ़ाने पर जोर है। यानी निधि उपलब्ध होने और वास्तविक भुगतान के बीच का अंतर कम करने की कोशिश की गई है।

20 शासकीय संस्थाओं में हैं 1500 से ज्यादा विद्यार्थी

प्रदेश में सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग के तहत 20 शासकीय संस्थाएं संचालित हैं। इनमें 18 विद्यालय, 01 प्रशिक्षण केंद्र और 01 छात्रावास शामिल हैं। इन संस्थाओं में कुल 1,574 विद्यार्थी हैं, जिनमें 944 आवासीय और 630 गैर-आवासीय हैं। इन संस्थाओं का नियमित खर्च शिक्षा तक सीमित नहीं है। कर्मचारियों का वेतन, छात्रावास संचालन, भोजन, बिजली-पानी, रखरखाव और शिक्षण सामग्री जैसी जरूरतों के लिए लगातार भुगतान जरूरी होता है। विभागीय बजट प्रावधान के अनुसार इन संस्थाओं के लिए सालाना करीब 24 से 25 करोड़ रुपए का बजट रहता है।

35 अनुदान प्राप्त संस्थाएं भी दायरे में

प्रदेश में 35 राज्य अनुदान प्राप्त गैर-सरकारी संस्थाएं भी दिव्यांगजनों से जुड़ी सेवाएं दे रही हैं। इनमें 23 शैक्षणिक, आठ गैर-शैक्षणिक और चार कुष्ठ क्षेत्र से संबंधित संस्थाएं हैं। 23 शैक्षणिक संस्थाओं में 1,110 आवासीय और 726 गैर-आवासीय विद्यार्थी हैं। यानी इन संस्थाओं में 1,836 विद्यार्थी अध्ययनरत हैं। इस तरह 20 शासकीय और 23 शैक्षणिक अशासकीय संस्थाओं को मिलाकर 3,410 विद्यार्थी सीधे इस व्यवस्था से जुड़े हैं। गैर-सरकारी संस्थाओं के लिए करीब 24 करोड़ रुपए के बजट प्रावधान की जानकारी है, जबकि उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार करीब 16 से 17 करोड़ रुपए का व्यय होता है।

विकेंद्रीकरण के साथ जवाबदेही भी

नई व्यवस्था का सबसे अहम पक्ष भुगतान प्रक्रिया का विकेंद्रीकरण है। जिला स्तर पर उपलब्ध निधि के अनुसार निर्धारित मदों में भुगतान की कार्रवाई आगे बढ़ाई जा सकेगी। डीडीआरसी के कर्मचारियों के निर्धारित मानदेय/वेतन, स्टेशनरी, पानी, टेलीफोन, इंटरनेट और बिजली जैसे आकस्मिक खर्चों के साथ मान्यता प्राप्त संस्थाओं और पात्र हितग्राहियों से जुड़े निर्धारित भुगतान भी प्रक्रिया में शामिल हैं।

ई-पेमेंट की राशि निर्धारित सीमा से अधिक होने पर उपलब्ध राशि और सक्षम स्वीकृति के अनुसार जिला स्तर पर भुगतान की कार्रवाई का प्रावधान है। निर्धारित परिस्थितियों में मूलधन के उपयोग की व्यवस्था भी रखी गई है।

इससे हर मामले में भोपाल स्तर पर पत्राचार और मंजूरी के लिए निर्भरता कम करने की कोशिश की गई है। हालांकि विकेंद्रीकरण के साथ जिला स्तर पर समयबद्ध भुगतान, रिकॉर्ड और निगरानी की जवाबदेही भी महत्वपूर्ण होगी।

बजट से ज्यादा अब भुगतान की गति पर नजर

सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण विभाग के अनुसार नई व्यवस्था का फोकस केवल बजट उपलब्ध कराने पर नहीं, बल्कि उपलब्ध निधि का समय पर उपयोग करने पर है। पहले यदि राशि उपलब्ध होने के बावजूद भुगतान लंबित रहता था तो कई महीनों की राशि एक साथ जारी करने की स्थिति बनती थी। नई प्रक्रिया में उपलब्ध निधि का जरूरत के अनुसार समय पर उपयोग करने पर जोर है।

इस बदलाव को प्रशासनिक नवाचार के रूप में भी देखा जा सकता है, क्योंकि निर्णय और भुगतान की प्रक्रिया को स्थानीय स्तर तक लाने से संस्थाओं की तत्काल जरूरतों पर तेजी से कार्रवाई की गुंजाइश बढ़ती है। 20 शासकीय और 23 शैक्षणिक अनुदान प्राप्त अशासकीय संस्थाओं में पढ़ने वाले 3,410 विद्यार्थियों के लिए भुगतान में देरी का असर संस्थाओं के संचालन तक पहुंच रहा था। कर्मचारियों का वेतन, भोजन, प्रशिक्षण, बिजली-पानी और शिक्षण सामग्री जैसी व्यवस्थाएं नियमित भुगतान पर निर्भर हैं। इसलिए अब इस बदलाव से व्यवस्था में सुधार की उम्मीद है। इसलिए नई व्यवस्था की असली परीक्षा यही होगी कि उपलब्ध निधि कितनी तेजी से संस्थाओं और पात्र हितग्राहियों तक पहुंचती है और लंबित भुगतान कितने कम होते हैं।

इनका कहना है :

नई व्यवस्था से जिला स्तर पर भुगतान की प्रक्रिया सरल होगी। उपलब्ध निधि का समय पर उपयोग हो सकेगा और दिव्यांग संस्थाओं को अनावश्यक पत्राचार व देरी से राहत मिलेगी।

- कृष्ण गोपाल तिवारी, आयुक्त

सामाजिक न्याय एवं दिव्यांगजन सशक्तिकरण मप्र

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हिन्दुस्थान समाचार / नेहा पांडे