home page

पश्चिम मेदिनीपुर : जहां जन्मीं बंगाल की चेतना और क्रांति की अमर गाथाएं

 | 
पश्चिम मेदिनीपुर : जहां जन्मीं बंगाल की चेतना और क्रांति की अमर गाथाएं


-अभिमन्यु गुप्ता

मेदिनीपुर, 01 जून (हि.स.)। पश्चिम बंगाल का पश्चिम मेदिनीपुर जिला केवल एक प्रशासनिक इकाई नहीं, बल्कि बंगाल के सामाजिक पुनर्जागरण, सशस्त्र स्वतंत्रता संग्राम और समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का जीवंत दस्तावेज है। वर्ष 2002 में अविभाजित मेदिनीपुर जिले के विभाजन के बाद अस्तित्व में आए इस जिले ने आधुनिकता की दौड़ में भी अपनी ऐतिहासिक पहचान, शौर्य और गौरव को पूरी तरह अक्षुण्ण बनाए रखा है।

पश्चिम मेदिनीपुर की माटी ने राष्ट्र को ऐसी दो महान विभूतियां दीं, जिनके बिना आधुनिक भारत का इतिहास अधूरा है। घाटाल महकमे के वीरसिंह गांव में 26 सितंबर 1820 को जन्मे महान शिक्षाविद, समाज सुधारक और बंगाल पुनर्जागरण के अग्रदूत पंडित ईश्वरचंद्र विद्यासागर ने स्त्री शिक्षा, विधवा पुनर्विवाह और बांग्ला वर्णमाला (वर्ण परिचय) के पुनर्गठन से समाज को नई दिशा दी। उनका पैतृक घर आज एक संरक्षित स्मारक और ज्ञान का केंद्र है।

वहीं, मेदिनीपुर के मौबनी (केशपुर) गांव में तीन दिसंबर 1889 को जन्मे अमर शहीद खुदीराम बोस ने किशोरावस्था में ही ब्रिटिश हुकूमत की चूलें हिला दी थीं। मुजफ्फरपुर बम कांड के बाद मात्र 18 वर्ष की आयु में 11 अगस्त 1908 को हाथ में गीता लेकर हंसते-हंसते फांसी के फंदे को चूमने वाले खुदीराम का बलिदान आज भी देश के युवाओं में राष्ट्रभक्ति का संचार करता है।

मेदिनीपुर का इतिहास केवल इन दो महानायकों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ब्रिटिश शासन के खिलाफ संगठित प्रतिरोध का गढ़ रहा है।

चुआर विद्रोह 18वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी की शोषक भूमि और कर नीतियों के खिलाफ इस क्षेत्र के भूमिज, वनवासियों और स्थानीय पायकों (सैनिकों) ने ऐतिहासिक 'चुआर विद्रोह' का बिगुल फूंका था, जिसने अंग्रेजी हुकूमत को हिला कर रख दिया था। कर्णगढ़ की रानी शिरोमणि ने इस विद्रोह का नेतृत्व कर 'मेदिनीपुर की लक्ष्मीबाई' के रूप में अपनी पहचान बनाई।

गुप्त क्रांतिकारी संगठन 'अनुशीलन समिति', बीसवीं सदी की शुरुआत में मेदिनीपुर गुप्त क्रांतिकारी गतिविधियों का मुख्य केंद्र था। ज्ञानेंद्रनाथ बसु और सत्येंद्रनाथ बसु जैसे क्रांतिकारियों ने यहां युवाओं को सशस्त्र क्रांति के लिए संगठित किया था।

मोगलमारी का प्राचीन बौद्ध विहार, दांतन के समीप मोगलमारी में की गई खुदाई से छठी से बारहवीं शताब्दी के एक विशाल बौद्ध मठ (विहार) के अवशेष मिले हैं। यहां प्राप्त टेराकोटा की कलाकृतियां और चूने के गारे से बनी मूर्तियां इस बात का प्रमाण हैं कि यह क्षेत्र कभी अंतरराष्ट्रीय बौद्ध सांस्कृतिक नेटवर्क का हिस्सा था।

कुरुमबेड़ा दुर्ग (गगनेश्वर), नारायणगढ़ ब्लॉक के पास स्थित यह मध्यकालीन कुरुमबेड़ा दुर्ग इतिहास प्रेमियों के लिए कौतूहल का विषय है। उड़िया स्थापत्य शैली और पत्थरों को जोड़कर बनाई गई इसकी रहस्यमयी चारदीवारी और प्राचीन मस्जिद व मंदिर के अवशेष इसके बहु-सांस्कृतिक इतिहास को दर्शाते हैं।

गनगनी (बंगाल का ग्रैंड कैन्यन), गड़बेता के निकट शिलबती नदी के तट पर स्थित गनगनी अपनी अद्भुत लाल मिट्टी के खड्डों और प्राकृतिक कटाव के कारण 'बंगाल का ग्रैंड कैन्यन' कहलाता है। महाभारत काल से जुड़ी लोककथाओं के अनुसार, इसी स्थान पर भीम ने बकासुर का वध किया था।

जिले का 'पिंगला' ब्लॉक अपनी पारंपरिक पटचित्र कला के लिए वैश्विक मानचित्र पर अंकित है। यहां के 'नया' गांव के चित्रकार (पटुआ) न केवल प्राकृतिक रंगों से स्क्रॉल पेंटिंग बनाते हैं, बल्कि गीतों के माध्यम से पौराणिक और समसामयिक कहानियों को बयां करते हैं। इसके अलावा, जिले के विभिन्न अंचलों में स्थित प्राचीन टेराकोटा मंदिर यहां की सनातनी शिल्पकला की गवाही देते हैं।

मेदिनीपुर के वरिष्ठ शिक्षाविद और इतिहासकार शिक्षक वी के सिंह का मानना है कि पश्चिम मेदिनीपुर केवल एक पर्यटन स्थल या भौगोलिक भूभाग नहीं है, बल्कि यह बंगाल की आत्मा का वह जीवंत हिस्सा है जहां समाज सुधार की करुणा, क्रांति की धधकती ज्वाला, और कला की सूक्ष्मता एक साथ प्रवाहित होती हैं। विद्यासागर की ज्ञान ज्योति और खुदीराम की बलिदानी चेतना आज भी इस माटी के कण-कण को एक अद्वितीय गौरव प्रदान करती है।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / अभिमन्यु गुप्ता