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भागलपुर का कदवा दियारा बना संकटग्रस्त 'गरुड़' का सुरक्षित आशियाना, किसान और पक्षी मिलकर लिख रहे पर्यावरण संरक्षण की अनूठी इबारत

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भागलपुर का कदवा दियारा बना संकटग्रस्त 'गरुड़' का सुरक्षित आशियाना, किसान और पक्षी मिलकर लिख रहे पर्यावरण संरक्षण की अनूठी इबारत


भागलपुर का कदवा दियारा बना संकटग्रस्त 'गरुड़' का सुरक्षित आशियाना, किसान और पक्षी मिलकर लिख रहे पर्यावरण संरक्षण की अनूठी इबारत


भागलपुर, 20 सितंबर (हि.स.)। अपनी सिल्क (रेशम) और उपजाऊ मिट्टी के लिए दुनिया भर में मशहूर भागलपुर अब एक और वैश्विक गौरव का केंद्र बन चुका है। संकटग्रस्त प्रजाति के ग्रेटर एडजुटेंट स्टॉर्क, जिन्हें स्थानीय भाषा में 'बड़ा गरुड़' या 'हरगिला' कहा जाता है, के लिए भागलपुर का नवगछिया अनुमंडल के तहत आने वाला कदवा दियारा इलाका एक बेहद महत्वपूर्ण और सुरक्षित आश्रय स्थल के रूप में उभरा है।

पूरी दुनिया में उंगलियों पर गिने जाने वाले इन दुर्लभ पक्षियों की वैश्विक आबादी का एक बड़ा हिस्सा अब इसी क्षेत्र में धड़कता है।

आंकड़ों के अनुसार, विश्वभर की कुल आबादी में से 700 से अधिक गरुड़ पक्षी अकेले कदवा दियारा इलाके में रह रहे हैं। भागलपुर अब इस प्रजाति के लिए पूरे एशिया का एकमात्र संरक्षण केंद्र और असम के बाद भारत का दूसरा सबसे बड़ा प्रजनन स्थल बन गया है।

आमतौर पर माना जाता है कि पक्षी खेतों में फसलों को नुकसान पहुंचाते हैं, लेकिन कदवा दियारा में कहानी बिल्कुल उलट है। यहाँ के स्थानीय किसानों ने इन विशालकाय पक्षियों को कृषि में अपने सबसे आवश्यक और वफादार साथी के रूप में अपना लिया है। ये गरुड़ खेतों के लिए प्राकृतिक रक्षक (बायो-शील्ड) का काम कर रहे हैं।

खेतों में फसलों को बर्बाद करने वाले हानिकारक कीटों और चूहों को गरुड़ अपना निवाला बनाते हैं। इसका सबसे बड़ा फायदा स्थानीय मक्का उत्पादक किसानों को हुआ है। किसानों के अनुसार, पहले उन्हें अपनी मक्का की फसलों को कीड़ों से बचाने के लिए हर सात दिन में महंगे और हानिकारक रासायनिक कीटनाशकों का छिड़काव करना पड़ता था। लेकिन जब से गरुड़ों का बसेरा इन खेतों में बढ़ा है, तब से कीटनाशकों के छिड़काव की जरूरत पूरी तरह खत्म हो गई है। यह पर्यावरण के साथ-साथ किसानों की जेब के लिए भी एक बड़ी राहत है।

स्थानीय निवासी प्रिंस यादव ने इन पक्षियों के इतिहास पर प्रकाश डालते हुए साझा किया कि ये पक्षी यहाँ कई वर्षों से रह रहे हैं। शुरुआती दौर में इन्होंने सिर्फ दो पीपल के पेड़ों पर घोंसला बनाना शुरू किया था, लेकिन साल 2006 के बाद से ग्रामीणों के सहयोग के कारण इनकी आबादी में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की गई है।

कदवा दियारा के लोग गरुड़ को सिर्फ एक पक्षी नहीं मानते, बल्कि उन्हें देवताओं की तरह पूजते हैं। गरुड़ मुख्य रूप से मछली खाना पसंद करते हैं और दलदली व जलीय क्षेत्रों में सक्रिय रहते हैं। पर्यावरण को साफ-सुथरा रखने में भी इनकी भूमिका अतुलनीय है। इसके अलावा, यहाँ एक दिलचस्प लोक-मान्यता भी है; कुछ ग्रामीणों का दृढ़ विश्वास है कि जब गरुड़ अपने विशाल पंख फड़फड़ाते हैं, तो उससे उत्पन्न होने वाली हवा में औषधीय गुण होते हैं, जो बीमारियों को दूर रखते हैं।

संरक्षण के प्रति ग्रामीणों का समर्पण ऐसा है कि यदि प्रजनन काल के दौरान कोई चूजा दुर्घटनावश पेड़ से नीचे गिर जाता है, तो ग्रामीण तुरंत सक्रिय हो जाते हैं। वे न सिर्फ उसे बचाते हैं, बल्कि वन विभाग और विशेषज्ञों की देखरेख में उसके बड़े होने तक पूरी सुरक्षा सुनिश्चित करते हैं। इस संबंध में क्षेत्र के जाने-माने पर्यावरणविद एवं पक्षीविद दीपक कुमार झुन्नू का कहना है, कदवा, नवगछिया के बड़ा गरुड़ (हरगिला) केवल एक दुर्लभ पक्षी नहीं, बल्कि हमारी गंगा तटीय जैव-विविधता और प्राकृतिक विरासत की पहचान हैं। इनके संरक्षण के लिए केवल सरकारी प्रयास पर्याप्त नहीं होंगे। घोंसलों और प्रजनन स्थलों की नियमित निगरानी के साथ स्थानीय ग्रामीणों, महिलाओं, युवाओं और विद्यालयों की सक्रिय भागीदारी जरूरी है।

उन्होंने आगे जोर देते हुए कहा कि कदवा में बड़ा गरुड़ संरक्षण को एक स्थायी जन-अभियान का रूप दिया जाना चाहिए, ताकि यह पूरा क्षेत्र देश और दुनिया में हरगिला संरक्षण की एक सबसे मजबूत मिसाल के रूप में स्थापित हो सके। निश्चित रूप से, कदवा दियारा की यह गाथा इंसानों और वन्यजीवों के बीच सह-अस्तित्व का एक ऐसा बेहतरीन उदाहरण है, जिससे दुनिया भर के संरक्षणवादी सीख ले सकते हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / बिजय शंकर