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घटते जंगल और सिमटते हाथी गलियारे बढ़ा रहे मानव-हाथी संघर्ष

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घटते जंगल और सिमटते हाथी गलियारे बढ़ा रहे मानव-हाथी संघर्ष


खूंटी, 04 जुलाई (हि.स.)। झारखंड के खूंटी जिले सहित राज्य के कई वन क्षेत्रों में इन दिनों मानव-हाथी संघर्ष एक गंभीर चुनौती बनता जा रहा है। ग्रामीण इलाकों में हाथियों के खेतों में घुसने, फसलों को नुकसान पहुंचाने, मकानों को तोड़ने और कई बार लोगों की जान जाने की घटनाएं लगातार सामने आ रही हैं। दूसरी ओर, बिजली के करंट, रेल दुर्घटनाओं और अन्य कारणों से हाथियों की मौत के मामले भी बढ़े हैं।

विशेषज्ञों का कहना है कि इन घटनाओं को केवल हाथियों का उत्पात मानना समस्या का वास्तविक समाधान नहीं है। उनका मानना है कि जंगलों का लगातार सिकुड़ना, हाथी गलियारों (एलीफेंट कॉरिडोर) पर बढ़ता अतिक्रमण और अनियोजित विकास कार्य इस संघर्ष की सबसे बड़ी वजह हैं।

वन्यजीव विशेषज्ञ एवं सेवानिवृत्त वन प्रमंडल पदाधिकारी अर्जुन बड़ाइक बताते हैं कि हाथियों का प्राकृतिक आवास पिछले कई वर्षों में लगातार कम हुआ है। जंगलों की अंधाधुंध कटाई, खनन परियोजनाएं, नई सड़कें, रेलवे लाइनें, औद्योगिक विस्तार और मानव बस्तियों के तेजी से फैलने के कारण हाथियों के पारंपरिक आवागमन मार्ग बाधित हो गए हैं। जिन रास्तों से हाथियों के झुंड पीढ़ियों से आवाजाही करते रहे हैं, वहां अब गांव, खेत और निर्माण कार्य मौजूद हैं। ऐसे में हाथियों के सामने अपने पारंपरिक मार्ग छोड़ने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता।

उन्होंने बताया कि एक वयस्क हाथी को प्रतिदिन लगभग 150 से 200 किलोग्राम तक भोजन और बड़ी मात्रा में पानी की आवश्यकता होती है। प्राकृतिक जंगलों में भोजन और जल स्रोतों की कमी होने पर हाथी आसानी से उपलब्ध मक्का, धान, गन्ना और अन्य फसलों की ओर आकर्षित हो जाते हैं। यही कारण है कि रात के समय हाथियों के झुंड अक्सर गांवों और खेतों में पहुंच जाते हैं। इससे किसानों की महीनों की मेहनत कुछ ही घंटों में नष्ट हो जाती है और आर्थिक नुकसान के साथ तनाव भी बढ़ता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, अधिकांश संघर्ष तब होता है जब लोग हाथियों को भगाने का प्रयास करते हैं। ग्रामीण फसलों और घरों की सुरक्षा के लिए मशाल, पटाखे, ढोल-नगाड़े, ईंट-पत्थर और कई बार बिजली के अवैध तारों का भी इस्तेमाल करते हैं। ऐसे में भयभीत हाथी आक्रामक हो जाते हैं और आत्मरक्षा में हमला कर देते हैं। कई घटनाओं में ग्रामीणों और वनकर्मियों की जान भी जा चुकी है। वहीं हाथियों को भी गंभीर चोटें लगती हैं या उनकी मौत हो जाती है।

अर्जुन बड़ाइक का कहना है कि हाथी अत्यंत बुद्धिमान, सामाजिक और संवेदनशील वन्यजीव हैं। वे अपने झुंड के साथ संगठित रूप से रहते हैं और वर्षों तक अपने पारंपरिक मार्गों को याद रखते हैं। यदि उनके रास्ते में बाधा आती है या उन्हें खतरा महसूस होता है, तो उनका व्यवहार आक्रामक हो सकता है। इसलिए हाथियों की मौजूदगी के दौरान किसी भी प्रकार की हिंसक प्रतिक्रिया या उन्हें घेरने का प्रयास नहीं करना चाहिए। ऐसी स्थिति में तुरंत वन विभाग को सूचना देना और सुरक्षित दूरी बनाए रखना ही सबसे सुरक्षित उपाय है।

राज्य के तमाम जिलों की तरह खूंटी और आसपास के कई क्षेत्रों में वन विभाग समय-समय पर ग्रामीणों को जागरूक करने के लिए अभियान चलाता है। गांवों में हाथियों की गतिविधियों की सूचना देने, सतर्कता समूह बनाने और रात्रि निगरानी जैसी व्यवस्थाएं भी की जाती हैं। इसके बावजूद विशेषज्ञों का मानना है कि केवल तात्कालिक उपाय पर्याप्त नहीं हैं। जब तक हाथियों के प्राकृतिक आवास और उनके पारंपरिक गलियारों की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक यह समस्या बनी रहेगी।

वन्यजीव विशेषज्ञों का सुझाव है कि हाथी गलियारों को अतिक्रमणमुक्त रखा जाए, जंगलों का संरक्षण और पुनर्वनीकरण किया जाए, जल स्रोतों का विकास हो तथा विकास परियोजनाओं की योजना बनाते समय वन्यजीवों के आवागमन को प्राथमिकता दी जाए। साथ ही प्रभावित ग्रामीणों को फसल और संपत्ति के नुकसान का समयबद्ध मुआवजा दिया जाए, ताकि वन्यजीवों के प्रति उनके मन में असंतोष कम हो।

पर्यावरणविदों का भी मानना है कि मानव और वन्यजीवों के बीच सहअस्तित्व की भावना विकसित करना समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है। उनके अनुसार, हाथी केवल एक वन्यजीव नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं का भी महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। प्रकृति का संतुलन बनाए रखने में उनकी अहम भूमिका है। यदि उनके प्राकृतिक आवासों का संरक्षण नहीं किया गया और हाथी गलियारों पर बढ़ते अतिक्रमण को नहीं रोका गया, तो आने वाले वर्षों में मानव-हाथी संघर्ष और अधिक गंभीर रूप ले सकता है, जिसका नुकसान इंसानों और वन्यजीवों दोनों को समान रूप से उठाना पड़ेगा।

विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि समाधान किसी एक पक्ष के हित में नहीं, बल्कि जंगल, वन्यजीव और मानव समाज के बीच संतुलन स्थापित करने में है। वैज्ञानिक प्रबंधन, प्रभावी वन संरक्षण, स्थानीय समुदाय की भागीदारी और जागरूकता के माध्यम से ही इस लंबे समय से चली आ रही चुनौती का स्थायी समाधान संभव है।

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हिन्दुस्थान समाचार / अनिल मिश्रा