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बीजू आम : खूंटी की पहचान, आदिवासी संस्कृति की विरासत और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव

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बीजू आम : खूंटी की पहचान, आदिवासी संस्कृति की विरासत और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की मजबूत नींव


खूंटी, 06 जून (हि.स.)। झारखंड का खूंटी जिला अपनी समृद्ध आदिवासी संस्कृति, प्राकृतिक संपदा और ऐतिहासिक विरासत के लिए देशभर में जाना जाता है। भगवान बिरसा मुंडा की धरती के रूप में प्रसिद्ध यह क्षेत्र न केवल सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि कृषि और जैव विविधता के मामले में भी अपनी अलग पहचान रखता है। इन्हीं प्राकृतिक धरोहरों में से एक है बीजू आम, जो वर्षों से इस क्षेत्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था, पारंपरिक जीवनशैली और स्थानीय संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बना हुआ है।

खूंटी, गुमला और सिमडेगा के जंगलों और पहाड़ी इलाकों में प्राकृतिक रूप से उगने वाला बीजू आम केवल एक फल नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों के जीवन, आजीविका और सांस्कृतिक पहचान से जुड़ा हुआ है। इसकी विशेष खुशबू, विशिष्ट स्वाद और पूरी तरह जैविक उत्पादन इसे अन्य आमों से अलग बनाते हैं। यही कारण है कि झारखंड के अलावा बिहार, पश्चिम बंगाल, ओडिशा और आसपास के राज्यों के लोग भी इसके स्वाद के दीवाने हैं।

प्रकृति का अनमोल उपहार

बीजू आम की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे उगाने के लिए किसी विशेष देखभाल, रासायनिक खाद या कीटनाशक की आवश्यकता नहीं होती। जंगलों और पहाड़ी क्षेत्रों में वर्षों से मौजूद पेड़ प्राकृतिक रूप से फल देते हैं। यही वजह है कि बीजू आम को शत-प्रतिशत जैविक फल माना जाता है।

हाइब्रिड किस्मों जैसे आम्रपाली, मालदा या मल्लिका की तुलना में इसका आकार छोटा होता है, लेकिन स्वाद और सुगंध में यह बेहद खास माना जाता है। इसका गूदा (पल्प) रेशेदार और अत्यंत रसदार होता है। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग इसे काटकर खाने के बजाय सीधे चूसकर खाना पसंद करते हैं।

स्वाद के साथ रोजगार का भी साधन

बीजू आम केवल खाने तक सीमित नहीं है। इसके कच्चे फलों का उपयोग बड़े पैमाने पर अचार, अमचूर और पारंपरिक अमावट (आम पापड़) बनाने में किया जाता है। गर्मियों के मौसम में ग्रामीण परिवार इन उत्पादों को तैयार कर स्थानीय बाजारों में बेचते हैं, जिससे उन्हें अतिरिक्त आय प्राप्त होती है। विशेषज्ञों के अनुसार, एक पूर्ण विकसित बीजू आम का पेड़ सालाना आठ से दस क्विंटल तक फल दे सकता है। यही कारण है कि दशकों तक खूंटी और आसपास के हाट-बाजारों में बिकने वाले आमों का बड़ा हिस्सा बीजू आम का हुआ करता था।

सामुदायिक संस्कृति की अनूठी मिसाल

बीजू आम को लेकर खूंटी के ग्रामीण इलाकों में एक विशेष परंपरा भी देखने को मिलती है। यहां कई स्थानों पर इन पेड़ों पर किसी एक व्यक्ति का अधिकार नहीं माना जाता, बल्कि पूरे गांव का सामूहिक अधिकार होता है। फल पकने के मौसम में महिलाएं, बच्चे और ग्रामीण मिलकर आम संग्रह करते हैं और स्थानीय हाटों में बेचते हैं। इससे न केवल आर्थिक लाभ होता है, बल्कि सामुदायिक सहभागिता और सामाजिक एकता भी मजबूत होती है। यह परंपरा आदिवासी समाज की सामूहिक जीवन शैली और प्रकृति के प्रति उनके जुड़ाव को दर्शाती है।

बढ़ती हाइब्रिड खेती के बीच भी कायम है पहचान

पिछले कुछ वर्षों में सरकार की विभिन्न योजनाओं, विशेष रूप से ‘बिरसा हरित ग्राम योजना’ के माध्यम से खूंटी जिले में आम्रपाली, लंगड़ा और मल्लिका जैसी व्यावसायिक किस्मों की खेती को बढ़ावा मिला है। इसके परिणामस्वरूप खूंटी झारखंड के प्रमुख आम उत्पादक जिलों में शामिल हो गया है। हालांकि, व्यावसायिक उत्पादन बढ़ने के बावजूद बीजू आम की मांग कम नहीं हुई है। इसकी प्राकृतिक खुशबू, पारंपरिक स्वाद और जैविक गुणवत्ता के कारण ग्रामीण बाजारों में इसकी लोकप्रियता आज भी बरकरार है।

जलवायु परिवर्तन से बढ़ा संकट

जहां एक ओर बीजू आम की लोकप्रियता बनी हुई है, वहीं दूसरी ओर इसके अस्तित्व पर कई चुनौतियां भी मंडरा रही हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन का सबसे अधिक असर इसी पारंपरिक किस्म पर पड़ रहा है। बेमौसम बारिश, अत्यधिक गर्मी और बसंत ऋतु के प्राकृतिक चक्र में बदलाव के कारण पेड़ों में समय पर मंजर नहीं आ पाते। कई बार समय से बारिश नहीं होने के कारण मधुवा जैसे रोग फैल जाते हैं, जिससे मंजर सूख जाते हैं और उत्पादन प्रभावित होता है। इसके अलावा पर्यावरण प्रदूषण और बदलती जलवायु परिस्थितियों के कारण पुराने पेड़ों की उत्पादन क्षमता भी लगातार घट रही है। कई क्षेत्रों में पहले की तुलना में उत्पादन लगभग आधा रह गया है।

पेड़ों की कटाई भी बनी बड़ी चुनौती

ग्रामीण क्षेत्रों में ईंधन और लकड़ी की आवश्यकता के कारण वर्षों पुराने बीजू आम के पेड़ों की कटाई भी लगातार हुई है। शहरीकरण और भूमि उपयोग में बदलाव ने भी इन पारंपरिक वृक्षों की संख्या को प्रभावित किया है। जानकारों का कहना है कि यदि समय रहते इनके संरक्षण की दिशा में ठोस प्रयास नहीं किए गए तो आने वाले वर्षों में बीजू आम की संख्या में और गिरावट देखने को मिल सकती है।

प्रसंस्करण उद्योग बन सकता है समाधान

कृषि विशेषज्ञ और आत्मा के उप निदेशक अमरेश कुमार का मानना है कि बीजू आम के संरक्षण और ग्रामीण आय बढ़ाने के लिए खाद्य प्रसंस्करण सबसे प्रभावी उपाय साबित हो सकता है। उनके अनुसार यदि स्वयं सहायता समूहों (एसएचजी) और किसान उत्पादक संगठनों (एफपीओ) के माध्यम से बीजू आम से उच्च गुणवत्ता वाले अचार, अमचूर, जैम, जूस और पारंपरिक अमावट का उत्पादन बड़े स्तर पर किया जाए, तो ग्रामीणों को बेहतर बाजार और उचित मूल्य मिल सकता है। इससे बिचौलियों पर निर्भरता भी कम होगी और स्थानीय स्तर पर रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे।

संरक्षण के साथ विकास की जरूरत

कर्रा प्रखंड के बिकुवादाग गांव के आम उत्पादक किसान दिलीप कुमार शर्मा कहते हैं कि बीजू आम केवल एक फल नहीं, बल्कि पूरे क्षेत्र की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। उनके अनुसार पर्यावरण संरक्षण और स्थानीय जैव विविधता को बचाने के लिए बीजू आम के पेड़ों का संरक्षण बेहद जरूरी है।

विशेषज्ञों का भी मानना है कि यदि पारंपरिक किस्मों के संरक्षण, पौधरोपण, वैज्ञानिक प्रबंधन और मूल्य संवर्धन पर समान रूप से ध्यान दिया जाए तो बीजू आम न केवल अपनी पहचान बनाए रखेगा, बल्कि ग्रामीण विकास का मजबूत माध्यम भी बन सकता है।

विरासत को बचाने का समय

बीजू आम खूंटी की मिट्टी, संस्कृति और प्रकृति से जुड़ी एक ऐसी विरासत है, जो पीढ़ियों से लोगों के जीवन का हिस्सा रही है। बदलते समय में इसके संरक्षण की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक बढ़ गई है। यदि सरकार, स्थानीय समुदाय, किसान और सामाजिक संगठन मिलकर इस दिशा में प्रयास करें, तो बीजू आम न केवल खूंटी की पहचान बना रहेगा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जैव विविधता और सांस्कृतिक धरोहर का जीवंत प्रतीक बना रहेगा।------------

हिन्दुस्थान समाचार / अनिल मिश्रा