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विभाजन की विभीषिका: प्रीतम दास चावला की कहानी, जिसमें विभाजन ने सब कुछ छीना

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विभाजन की विभीषिका: प्रीतम दास चावला की कहानी, जिसमें विभाजन ने सब कुछ छीना


-सिंध में छूटा घर, मुरैना में फिर बसी जिंदगी

भोपाल, 13 अगस्त (हि.स.)। एक मां ने बच्चों का हाथ कसकर थाम रखा था। पिता बार-बार पीछे मुड़कर उस घर को देख रहे थे, जिसमें परिवार की कई पीढ़ियों की हंसी, रिश्तों की गर्माहट और जीवन की सारी जमा पूंजी बसती थी। आंगन में चूल्हा बुझ चुका था, सामान समेटने का समय नहीं था और यह भी पता नहीं था कि जिस घर की चौखट से वे निकल रहे हैं, उसे फिर कभी देख पाएंगे या नहीं। परिवार के सामने सिर्फ एक सवाल था; जान बचानी है तो जाना होगा।

दरअसल, यही वह भयावह समय था, जब सिंध के काशमोर से एक परिवार ने भारत की ओर कदम बढ़ाया। उस परिवार के छोटे से बच्चे प्रीतम दास चावला को तब शायद पूरी तरह मालूम नहीं था कि वह यात्रा उनके जीवन की दिशा हमेशा के लिए बदल देगी। घर सिंध में छूट गया, संपत्ति छूट गई, कारोबार छूट गया, मगर हौसला साथ आया। उसी हौसले ने आगे चलकर मध्य प्रदेश के मुरैना में एक नई जिंदगी खड़ी की।

काशमोर की समृद्ध दुनिया, जिसे एक झटके में छोड़ना पड़ा

प्रीतम दास चावला का जन्म वर्ष 1944 में सिंध प्रांत के काशमोर शहर में हुआ था। बचपन की उम्र इतनी छोटी थी कि 1947 की हर घटना उनकी आंखों के सामने उसी तरह दर्ज नहीं हो सकी, लेकिन परिवार के बुजुर्गों से सुनी बातें और उन दिनों की धुंधली स्मृतियां आज भी उनके भीतर जीवित हैं।

उनके पिता गिरधारी लाल चावला और दादा स्थानीय समाज में सम्मानित व्यक्ति थे। पिता सरपंच थे। परिवार के पास हवेलियां थीं, जमीन-जायदाद थी, दुकानें थीं, मवेशी थे, घोड़े थे और कई एकड़ सिंचित भूमि थी। जीवन व्यवस्थित था। भविष्य सुरक्षित दिखाई देता था। किसी ने कल्पना नहीं की थी कि एक दिन यही परिवार अपना सब कुछ छोड़कर अनजान रास्ते पर चलने को मजबूर होगा।

विभाजन आया तो संपत्ति से ज्यादा जिंदगी बचाना जरूरी हो गया

1947 में देश के विभाजन के साथ सिंध पाकिस्तान का हिस्सा बन गया। हालात तेजी से बदले। प्रीतम दास बताते हैं कि उस समय हिंदू परिवारों के भीतर भय लगातार बढ़ता जा रहा था। मस्जिदों से हिंदुओं को सब कुछ छोड़कर जाने की बातें कही जा रही थीं। उन्हें भारत चले जाने या फिर इस्लाम स्वीकार करने का दबाव झेलना पड़ रहा था।

आसपास से आने वाली खबरें परिवार की चिंता बढ़ा रही थीं। हिंदू घरों से बेटियों और बहुओं को उठा ले जाने जैसी घटनाओं की खबरें सुनाई देती थीं। ऐसे वातावरण में संपत्ति बचाने की चिंता पीछे छूट गई थी। अब सबसे बड़ी चिंता थी, परिवार के हर सदस्य की जान कैसे बचे?

प्रीतम दास के परिवार के पास बहुत कुछ था, लेकिन उस समय हवेलियां, जमीन, दुकानें, घोड़े और मवेशी सब छोटे पड़ गए थे। सामने सिर्फ एक रास्ता था, भारत की ओर निकलना। घर से निकलते समय कोई नहीं जानता था कि वापसी नहीं होगी। जिस जमीन पर पीढ़ियों ने मेहनत की थी, जिस घर की दीवारों ने परिवार के सुख-दुख देखे थे, सब अचानक पीछे छूट गया।

लाहौर से दिल्ली तक का सफर भय, अनिश्चितता से भरा हुआ था परिवार किसी तरह लाहौर पहुंचा। वहां से कठिन परिस्थितियों के बीच ट्रेन पकड़कर दिल्ली की ओर रवाना हुआ। वह रेल यात्रा परिवार की स्मृतियों में आज भी भय और अनिश्चितता से भरी हुई है। जिस ट्रेन को सामान्य परिस्थितियों में यात्रा का साधन माना जाता है, वही उस दौर में लाखों विस्थापितों के लिए जीवन और मृत्यु के बीच का रास्ता बन गई थी। हर पड़ाव पर चिंता थी। हर आवाज पर डर था। हर खबर दिल दहला देती थी। भारत की धरती पर पहुंचने के बाद भी संघर्ष समाप्त नहीं हुआ। अपना देश मिल गया था, लेकिन अपना घर नहीं था।

दिल्ली का शरणार्थी शिविर : जहां संपन्न परिवार भी बेघर था

दिल्ली में परिवार को शरणार्थी शिविर में रहना पड़ा। यह उनके जीवन का एक ऐसा दौर था, जब कल तक जिनके पास अपना घर, जमीन और कारोबार था, वे हजारों अन्य परिवारों की तरह शिविर में रहने को विवश थे। विस्थापन ने पहचान बदल दी थी। जो परिवार सिंध में अपने सामाजिक सम्मान और संपन्नता के लिए जाना जाता था, वह अब एक शरणार्थी परिवार था। लेकिन यहीं से उनके भीतर एक नई जिद पैदा हुई, जिंदगी को फिर से खड़ा करना है।

हरियाणा से मुरैना तक नई जमीन, नया संघर्ष

कुछ समय बाद रिश्तेदारों ने परिवार को हरियाणा बुलाया। वहां लगभग एक वर्ष रहने के बाद उन्हें मध्य प्रदेश के मुरैना में विस्थापित परिवारों को बसाए जाने की जानकारी मिली। कस्टोडियन संपत्तियों के माध्यम से नए जीवन की संभावना दिखाई दी और परिवार मुरैना आ गया। यहीं से प्रीतम दास चावला के परिवार की दूसरी जिंदगी शुरू हुई। यह जिंदगी सिंध जैसी नहीं थी। यहां न पुश्तैनी हवेलियां थीं, न पुरानी जमीनें और न वह कारोबार जिसे पीढ़ियों ने खड़ा किया था लेकिन एक चीज थी, मेहनत करने की क्षमता।

नाश्ते के होटल से शुरू हुई नई जिंदगी

मुरैना में परिवार ने नाश्ते का होटल और ठेला लगाया। शुरुआत छोटी थी, लेकिन सपना बड़ा था, अपने पैरों पर खड़ा होना। इसके बाद फल का काम किया। नौकरी की। गली-गली सामान बेचने का काम किया। जीवन आसान नहीं था। हर दिन मेहनत करनी पड़ती थी। कभी आमदनी कम होती, कभी काम बदलना पड़ता, लेकिन परिवार पीछे नहीं हटा। धीरे-धीरे मेहनत रंग लाई और वे ट्रांसपोर्ट के व्यवसाय से भी जुड़े। जिस परिवार ने सिंध में अपनी संपन्न दुनिया खो दी थी, उसने मुरैना की धरती पर फिर से अपने जीवन की नींव रखनी शुरू कर दी।

आज भी सिंध की स्मृतियां दिल में हैं

समय बीत गया। पीढ़ियां बदल गईं। मुरैना में घर बना, काम बना, परिवार बढ़ा, लेकिन सिंध की स्मृतियां कहीं गई नहीं। प्रीतम दास के लिए काशमोर केवल जन्मस्थान नहीं है। वह उनके बचपन का संसार है। वह जगह जहां परिवार था, हवेलियां थीं, खेत थे, दुकानें थीं और एक ऐसी जिंदगी थी, जिसे उन्होंने कभी खत्म होने की कल्पना नहीं की थी। विभाजन की पीड़ा को भुलाया नहीं जा सकता। कुछ घाव समय के साथ दिखाई देना बंद कर देते हैं, लेकिन भीतर उनका दर्द बना रहता है।

भारत में फिर खड़ा होना ही सबसे बड़ी जीत थी

आज जब प्रीतम दास चावला पीछे मुड़कर अपने जीवन को देखते हैं तो उनके सामने दो तस्वीरें उभरती हैं। एक तस्वीर सिंध की है, समृद्ध घर, जमीन, कारोबार और वह बचपन, जो अचानक छिन गया। दूसरी तस्वीर मुरैना की हैए संघर्ष, मेहनत, छोटे कारोबार और धीरे-धीरे फिर से खड़ी होती जिंदगी। इन दोनों तस्वीरों के बीच एक चीज लगातार बनी रही, हौसला। विभाजन उनसे उनकी जिजीविषा नहीं छीन सका, जिसने उन्हें फिर से खड़ा किया। प्रीतम दास की जिंदगी आज भी उस पीढ़ी का जीवंत दस्तावेज है, जिसने इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक को अपने जीवन पर झेला, लेकिन हार नहीं मानी।

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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी