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बिलासपुर का ‘बजरंग पंचायत मंदिर’: जहां आस्था के साथ मिलता था इंसाफ, सौ साल पुरानी परंपरा आज भी कायम

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बिलासपुर का ‘बजरंग पंचायत मंदिर’: जहां आस्था के साथ मिलता था इंसाफ, सौ साल पुरानी परंपरा आज भी कायम


बिलासपुर, 02 अप्रैल (हि.स.)। छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में एक ऐसा मंदिर है, जो केवल पूजा-अर्चना का केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की अनूठी मिसाल भी रहा है। यहां हनुमानजी को साक्षी मानकर लगने वाली पंचायत ने दशकों तक लोगों के विवाद सुलझाए और समाज में एकता की मिसाल कायम की।

शहर के मगरपारा-तालापारा क्षेत्र में स्थित श्री बजरंग पंचायत मंदिर अपनी अलग पहचान रखता है। करीब एक सदी से भी अधिक पुराना यह स्थल उस दौर की याद दिलाता है, जब न्याय के लिए लोगों को अदालतों के चक्कर नहीं लगाने पड़ते थे, बल्कि आस्था और विश्वास के आधार पर यहीं फैसले हो जाया करते थे।

मंदिर परिसर में हनुमानजी को साक्षी मानकर पंचायत लगती थी, जहां गांव और शहर के लोग अपने छोटे-बड़े विवाद लेकर पहुंचते थे। उस समय दिए गए फैसले न केवल अंतिम माने जाते थे, बल्कि समाज के हर वर्ग द्वारा स्वीकार भी किए जाते थे।

इस पंचायत की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि यहां न्याय करते समय धर्म, जाति या वर्ग का कोई भेदभाव नहीं किया जाता था। हिंदू, मुस्लिम और ईसाई सभी समुदाय के लोग इस मंच पर बराबरी से अपनी बात रखते थे और पंचायत के निर्णय को सहर्ष स्वीकार करते थे। यह परंपरा सामाजिक सौहार्द और आपसी विश्वास की ऐसी मिसाल थी, जो आज भी लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी हुई है।

अंग्रेजी शासनकाल से जुड़ी विरासत

स्थानीय निवासी ओम प्रकाश पटेल के अनुसार, इस परंपरा की शुरुआत अंग्रेजी शासनकाल में हुई थी। उस समय मंदिर का वर्तमान स्वरूप नहीं था और खुले स्थान पर ही हनुमानजी की स्थापना कर पंचायत लगाई जाती थी। समाज के बुजुर्ग और मुखिया यहां बैठकर दोनों पक्षों की बात सुनते और निष्पक्ष निर्णय देते थे। लोगों का मानना था कि हनुमानजी को साक्षी मानकर दिया गया फैसला कभी गलत नहीं हो सकता।

जब थाना नहीं, पंचायत ही थी सहारा

उस दौर में शहर में सीमित प्रशासनिक व्यवस्था थी और लोग पुलिस या अदालत के बजाय इस पंचायत पर अधिक भरोसा करते थे। विवादों का निपटारा यहीं हो जाता था, जिससे समय और संसाधनों दोनों की बचत होती थी। धीरे-धीरे यह स्थान “बजरंग पंचायत मंदिर” के नाम से प्रसिद्ध हो गया, एक ऐसा स्थल जहां आस्था और न्याय का अनोखा संगम देखने को मिलता था।

आज भी कायम है विश्वास

हालांकि समय के साथ न्यायिक व्यवस्था आधुनिक हो चुकी है, लेकिन इस मंदिर की ऐतिहासिक पहचान आज भी लोगों के दिलों में जिंदा है। स्थानीय लोग इसे केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि सामाजिक एकता और न्याय की विरासत के रूप में देखते हैं। यह मंदिर आज भी इस बात का प्रतीक है कि जब समाज में विश्वास और नैतिकता मजबूत हो, तो न्याय केवल कानून से नहीं, बल्कि सामूहिक समझ और आस्था से भी संभव है।

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हिन्दुस्थान समाचार / विष्णु पांडेय