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ऐसा मंदिर जहां हर साल चावल के समान बढ़ता है शिवलिंग

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ऐसा मंदिर जहां हर साल चावल के समान बढ़ता है शिवलिंग


शल्लेश्वर मंदिर के गर्भ में छिपा है महाभारतकालीन इतिहास

हमीरपुर, 09 अगस्त (हि.स.)। उत्तर प्रदेश हमीरपुर जिले में शल्लेश्वर शिव मंदिर का इतिहास सैकड़ों साल पुराना है। यहां स्थापित शिवलिंग हर साल चावल के समान बढ़ता है। श्रावण मास के सोमवार को दूरदराज से बड़ी संख्या में कावड़िऐं आकर जलाभिषेक करेंगे। यह मंदिर महाभारत काल से भी जुड़ा है।

सरीला कस्बे में शल्लेश्वर मंदिर का वैभव कम से कम डेढ़ हजार बरस पुराना है। यहां किसी जमाने में सरीला रियासत होती थी। यह जिले के सबसे पिछड़ा क्षेत्र है जिसे लोग महाभारत काल से जुड़ा मानते है। शल्लेश्वर मंदिर के गर्भ में एक लम्बा इतिहास छिपा है। बुन्देलखण्ड का इतिहास महाभारत काल से माना जाता है। उस जमाने में सोलह जनपद हुआ करते थे, जिसमें एक जनपद चेदिन के नाम से विख्यात था। अब इसे बुन्देलखण्ड के नाम से भी जाना जाता है। चेदिन महा जनपद की राजधानी की शुक्तिमती थी। प्राचीनतम राजा शिशुपाल इस जनपद के ही थे जिन्हें श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से मौत की सजा दी थी। चेदिन, प्रदेश का छोटा हिस्सा सरीला है जिसमें अति प्राचीनतम शिवलिंग शल्लेश्वर मंदिर में स्थापित है। यहां के इतिहासकार डा.भवानीदीन के मुताबिक, शल्लेश्वर धाम सरीला प्राचीनतम शिवलिंग है जहां बने मठ को देखने से यहीं प्रतीत होता है कि इसका निर्माण गुप्तकाल एवं चंदेल काल के मध्य हुआ है।

भगवान शिव के शिवलिंग को देखने से स्पष्ट होता है कि इसका चंदेल काल के पहले निर्माण हुआ है। मठ में भी गुंबद दीवार होने के कारण यह चंदेल कालीन प्रतीत होता है। सरीला स्टेट की वंशावली महाराज छत्रसाल से प्रारम्भ हुयी थी जो आज भी सरीला स्टेट हमीरपुर की एक तहसील है।

सरीला के महेन्द्र सिंह राजपूत ने बताया कि बुन्देलखण्ड में गुप्तकाल को स्वर्ण युग माना गया है। गुप्तकाल में इस क्षेत्र में मंदिरों, गुफाओं और वस्तुकला का उदय हुआ था। वहीं उससे पहले मंदिरों का उल्लेख नहीं मिलता है। बुन्देलखण्ड क्षेत्र में मंदिरों का निर्माण गुप्तकाल में शुरू हुआ था और चंदेलकाल तक उसका विस्तार चरम पर था। बुन्देलखण्ड में चंदेलों का साम्राज्य नौंवी शताब्दी में स्थापित हुआ था। चंदेल में प्रथम राजा चन्द्रवर्धन थे, जो चन्द्रवंशी क्षत्रिय थे। इस क्षेत्र में सर्वाधिक मंदिरों का निर्माण चंदेलकाल में हुआ था। राजा परमलाल सन् 1202 में कुतुबुद्दीन ऐबक से पराजित होकर कालिंजर पलायन कर गये थे। बाद में यह क्षेत्र मुस्लिम शासकों के आधीन हो गया था। बताया कि इस मंदिर में स्थापित शिवलिंग के गर्भ में प्राचीनतम इतिहास छिपा होगा, मगर यह अभी पुरातत्व के हाथ में नहीं आया है। हमीरपुर जिले में कछवा कला व सुमेरपुर सहित कुछ धरोहरें पुरातत्व के आधीन हैं, जिनके संरक्षण के लिये कार्यवाही चल रही है।

आज भी रहस्य बनी हुई हैं शिलालेख की भाषामंदिर की देखरेख करने वाले हरगोविन्द राजपूत का कहना है कि शल्लेश्वर मंदिर के गर्भ में विशालकाय शिवलिंग स्थापित है जिसकी गणना लोधेश्वर, कोटेश्वर सहित कई मंदिरों से की जाती है। मंदिर में प्रवेश करते ही दीवार परदेवनगरी में एक शिलालेख लगी है जिसकी भाषा कोई पढ़ नहीं पाया है। शिलालेख में संवत 1200 लिखा है। इसी में शिल्लसेन प्रवर्धिता भी लिखा शिलालेख लगा है जिसका अर्थ कोई नहीं समझ पाया।

864 बरस पूर्व मंदिर का हुआ था विस्तारसरीला के लोगों ने बताया कि इस मंदिर का विस्तार 864 साल पहले हुआ था। कई दशक पहले शिलालेख की भाषा पुरातत्व विभाग को भेजी गयी थी, जिसमें यह बात सामने आयी कि राजा परमलाल के पहले शिल्लेसन राजा ने इस मंदिर का विस्तार कराया था। इस मंदिर के पास ही तालाब किनारे शल्हऊ कुआं भी है जिसका कनेक्शन इस मंदिर से है। ऐसा मानना है कि इस कुएं का पानी पीने से चर्मरोग ठीक हो जाता है।

बिना सरिया मौरंग सीमेंट से बना है मंदिरसरीला क्षेत्र के लक्ष्मीनारायण मिश्रा ने बताया कि शल्लेश्वर मंदिर में लोहे की सरिया, मौरंग व सीमेंट का इस्तेमाल नहीं किया गया है। यह कंकरीट और चूने से बना है जिसकी मजबूती बेमिसाल है। यह मंदिर चंदेलकालीन तेलीय पत्थर से निर्मित है। समय-समय पर स्थानीय लोगों की मदद से इस मंदिर को आधुनिक रूप देने का काम किया गया है। महेन्द्र राजपूत की माने तो मंदिर का शिवलिंग हर साल चावल के दाने के आकार के बराबर बढ़ता है।

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हिन्दुस्थान समाचार / पंकज मिश्रा