भवानी शंकर पंड्या : आजादी की लड़ाई के सिपाही, आज भी देश की सेवा में उतने ही जवान
- गुलामी के खिलाफ संघर्ष से लेकर शिक्षा के त्याग तक 99 साल की अविस्मरणीय देश सेवा
अहमदाबाद, 14 अगस्त (हि.स.)। आयु के सौवें साल के पड़ाव के करीब पहुंचने के बाद भी सेवानिवृत्त होने की कोई इच्छा नहीं होना, न केवल किसी
के जज्बे, हौसले, जुनून और अटूट देश प्रेम को प्रकट करता है अपितु उनके दृढ़ संकल्प और मजबूत इच्छा शक्ति को भी दर्शाता है। ऐसी ही जीती-जागती शख्सियत हैं गुजरात के अहमदाबाद निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भवानी शंकर हरगोविंददास पंड्या।
99 वर्षीय भवानी शंकर ने जिंदगी के इस दौर में अनगिनत पड़ाव पार किए हैं और समय का दौर शरीर पर अपनी छाप छोड़ जाता है, लेकिन स्वतंत्रता संग्राम सेनानी भवानी शंकर के विचारों, संकल्प और देशभक्ति पर समय का कोई असर नहीं हुआ। आज भी जब वे देश की तरक्की की बात करते हैं, तो उनकी आंखों में युवाओं जैसी चमक और भविष्य के प्रति उनका विश्वास साफ झलकता है।
देश की आज़ादी के लिए सिर्फ़ 17 साल की उम्र में घर छोड़ने वाले भवानी शंकर पंड्या आज 99 साल की उम्र में भी देश के लिए एक जवान जैसा जोश, जुनून और जोश महसूस करते हैं। उनके लिए आज़ादी किसी इतिहास की किताब का एक चैप्टर नहीं है|
उन्होंने
आज़ादी को जिया है। उन्होंने ब्रिटिश राज देखा है, आज़ादी के आंदोलन में हिस्सा लिया है, गिरफ्तार हुए हैं, जेल गए हैं और 15 अगस्त 1947 को देश को आज़ाद होते अपनी आंखों से देखा है। इसीलिए इतिहास भवानी शंकर के शब्दों में नहीं पढ़ा जाता, बल्कि इतिहास ज़िंदा होकर हमारे सामने खड़ा हो जाता है।
25 मई, 1927 को मेहमदाबाद तहसील के सरसवनी गांव में जन्मे भवानी शंकर पंड्या को बचपन से ही देश की सेवा के संस्कार मिले थे। सरसवनी गांव को राष्ट्रीय संत रविशंकर महाराज की जन्मभूमि के तौर पर जाना जाता है और भवानी शंकर का घर महाराज के घर के ठीक सामने था। रविशंकर महाराज के मूल्यों से ही भवानी शंकर को देश की सेवा की प्रेरणा मिली।
बचपन से ही रविशंकर महाराज के सान्निध्य, उनके विचारों और सेवा के मूल्यों ने भवानी शंकर के मन में देश के लिए कुछ करने की इच्छा जगाई। समय के साथ यह भावना संकल्प बन गई और सिर्फ़ 17 साल की उम्र में उन्होंने देश की आज़ादी के लिए घर छोड़ने का फ़ैसला किया।
वह एक ऐसा समय था, जब आज़ादी का मतलब सिर्फ़ राजनीतिक आज़ादी नहीं था। इसका मतलब था गुलामी की ज़ंजीरों को तोड़ना, अन्याय के ख़िलाफ़ खड़ा होना और देश के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर देना। 'करो या मरो' के नारे के साथ वे आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो गए।
ब्रिटिश राज में भारतीयों के साथ हो रहे अन्याय और बेइज्ज़ती ने भवानी शंकर के संवेदनशील मन को परेशान कर दिया। महात्मा गांधी के विचारों और देशभक्ति के माहौल से प्रेरित होकर वे आज़ादी की लड़ाई में शामिल हो गए। साल 1939 में हरिपुरा में हुए कांग्रेस सम्मेलन में सेवा करने का मौका उनकी ज़िंदगी का एक अहम पड़ाव था। उसके बाद, उन्होंने साल 1942 के ऐतिहासिक 'भारत छोड़ो' आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। जब महात्मा गांधी के 'करो या मरो' के नारे के साथ पूरे देश में आज़ादी की लौ जल रही थी, तो भवानी शंकर ने भी अपनी जवानी देश के चरणों में लगा दी।
21 दिन बोरसद जेल से लेकर एक साल साबरमती जेल में रहे
आज़ादी की लड़ाई में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने का नतीजा गिरफ्तारी के रूप में सामने आया। भवानी शंकर पंड्या को 21 दिन बोरसद जेल में बिताने पड़े। उसके बाद अदालत ने उन्हें एक साल की सज़ा सुनाई और उन्हें साबरमती जेल भेज दिया गया। साबरमती जेल के दिन उनकी ज़िंदगी की ऐसी यादें हैं, जिन्हें वे आज भी गर्व के साथ याद करते हैं। जेल की चारदीवारी के अंदर उन्हें देश की आज़ादी के लिए संघर्ष करने वाले कई देश सेवकों के साथ रहने का मौका मिला।
लोकसभा के पहले स्पीकर गणेश वासुदेव मावलंकर, जुगतराम दवे, पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई, ईश्वरभाई पटेल, धीरूभाई देसाई और मोतीभाई बरवटिया जैसे देश सेवकों के साथ जेल में रहना उनके लिए संघर्ष और देश सेवा के मूल्यों को सीखने का एक अनोखा अनुभव था। जेल के बाहर जहां अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई चल रही थी, वहीं जेल के अंदर भी आज़ाद भारत का सपना ज़िंदा था।
आज़ादी तो मिल गई, लेकिन देश सेवा का संकल्प वैसा ही रहा
देश 15 अगस्त, 1947 को आज़ाद हो गया। ब्रिटिश राज खत्म हो गया। लेकिन भवानी शंकर पंड्या के लिए देश सेवा खत्म नहीं हुई, बस उसका रूप बदल गया।
रविशंकर महाराज के मूल्यों से प्रेरित होकर उन्होंने 'शिक्षा के ज़रिए राष्ट्र निर्माण' का रास्ता अपनाया। शिक्षक के तौर पर अपना करियर शुरू करने के बाद, उन्होंने अलग-अलग एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन में प्रिंसिपल और डायरेक्टर के तौर पर अपनी ज़िम्मेदारियां निभाईं। उनके लिए क्लासरूम सिर्फ़ पढ़ाने की जगह नहीं थी, बल्कि देश का भविष्य बनाने की जगह थी। उन्होंने गरीब और ज़रूरतमंद छात्र की पढ़ाई के लिए लगातार कोशिशें कीं। उनके मार्गदर्शन में पढ़े कई छात्र आगे चलकर डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर और दूसरे फील्ड में आगे बढ़े।
एक ज़माने में वे देश को गुलामी से आज़ाद कराने के लिए युवाओं के साथ सड़कों पर उतरे थे और दूसरे ज़माने में वे उन्हीं युवाओं की नई पीढ़ी को पढ़ा-लिखाकर देश बनाने के लिए तैयार कर रहे थे।
देश का हित सरकार के तोहफ़े से बड़ा हैएक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी के तौर पर उनकी सेवाओं को देखते हुए, गुजरात सरकार ने उन्हें एक प्लॉट दिया और पेंशन भी मंज़ूर की। लेकिन भवानी शंकर पंड्या, जिन्होंने अपनी ज़िंदगी में देश सेवा को सबसे ऊँचा स्थान दिया, पेंशन लेने से मना कर दिया।
उन्हें लगा कि इस रकम का इस्तेमाल देश और समाज के दूसरे फ़ायदेमंद कामों के लिए किया जाना चाहिए। उनके लिए पेंशन न लेना सिर्फ़ सरकारी फ़ायदों को छोड़ना नहीं था, बल्कि यह उनकी पूरी ज़िंदगी की सोच की झलक थी। देश से लेना नहीं, बल्कि देश को देना है।
मुझे पांच साल और जीना है99 साल की उम्र में भी भवानी शंकर पंड्या को सेवानिवृत्त होने की कोई इच्छा नहीं है। आज भी जब वे देश की तरक्की की बात करते हैं, तो उनकी आंखों में जवानी जैसी चमक और भविष्य के प्रति उनका विश्वास साफ दिखता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व के बारे में वे भावुक होकर कहते हैं कि मैं भगवान से प्रार्थना करता हूं कि मुझे पांच साल और जीने दें। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मैं देश का सुनहरा इतिहास देखना चाहता हूं। ये शब्द सिर्फ एक बूढ़े स्वतंत्रता सेनानी की भावनाएं नहीं हैं, बल्कि एक देशभक्त की अंदरूनी ख्वाहिश है जिसे भारत के उज्ज्वल भविष्य पर पक्का यकीन है।
वे प्रधानमंत्री को एक स्वतंत्रता सेनानी के तौर पर बधाई देते हैं। देश को और ज़्यादा ताकतवर, खुशहाल और शानदार बनते देखने की अपनी इच्छा ज़ाहिर करते हैं।
एक ज़िंदगी, देश सेवा के दो अमर अध्यायभवानी शंकर पंड्या की ज़िंदगी देश सेवा के दो अमर अध्यायों की गाथा है। पहले अध्याय में, उन्होंने गुलामी के खिलाफ लड़ाई लड़ी, गिरफ्तार हुए और जेल गए। दूसरे अध्याय में, उन्होंने शिक्षा को देश बनाने का ज़रिया बनाया और कई पीढ़ियों को बनाया।
आज़ादी के अमृत में, जब नई पीढ़ी आज़ाद भारत में पैदा होकर अपने अधिकारों को स्वाभाविक रूप से महसूस करती है, तो भवानी शंकर जैसे स्वतंत्रता सेनानियों की ज़िंदगी की कहानी हमें याद दिलाती है कि आज़ादी कोई आसान तोहफ़ा नहीं थी। इसके पीछे अनगिनत युवाओं की तपस्या, त्याग, संघर्ष, जेल और बलिदान है।
भवानी शंकर पंड्या सिर्फ़ संघर्ष के गवाह नहीं हैं, वे उस संघर्ष का जीता-जागता दस्तावेज़ हैं। उनकी 99 साल की ज़िंदगी का सफ़र हमें एक कभी न भूलने वाला संदेश देता है।
देश सेवा की कोई उम्र सीमा नहीं होती। सेवा करने का तरीका बदल सकता है, समय बदल सकता है, पीढ़ियाँ बदल सकती हैं; लेकिन सच्ची देशभक्ति कभी नहीं मरती। इस स्वतंत्रता दिवस पर भवानी शंकर पंड्या जैसे स्वतंत्रता सेनानियों को सलाम करने का मतलब सिर्फ़ अतीत को याद करना ही नहीं है, बल्कि वर्तमान को ज़िम्मेदारी और भविष्य को संकल्प से जोड़ना भी है।
यही आज़ादी का असली मतलब है।
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हिन्दुस्थान समाचार / हर्ष शाह

