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युद्ध हो या समुद्री संकट, अब दुनिया के किसी कोने में भारतीय नाविक नहीं होंगे ‘गुम’, डीजीएमए ने आसमान में बिछाई आंखें

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युद्ध हो या समुद्री संकट, अब दुनिया के किसी कोने में भारतीय नाविक नहीं होंगे ‘गुम’, डीजीएमए ने आसमान में बिछाई आंखें


-भारतीय नाविकों की सुरक्षा के लिए डीजीएमए ने शुरू किया सीफेयरर ट्रैकिंग मॉड्यूल

कोलकाता, 7 सितंबर (हि.स.)। हिंद महासागर क्षेत्र में बदलते भू-राजनीतिक हालात और समुद्री सुरक्षा से जुड़े खतरों के बीच भारत ने अपने नाविकों की सुरक्षा को लेकर निगरानी तंत्र मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। समुद्री प्रशासन महानिदेशालय ने ई-नैविक पोर्टल पर सीफेयरर ट्रैकिंग मॉड्यूल शुरू किया है। इसका मकसद भारतीय और विदेशी झंडे वाले जहाजों पर तैनात भारतीय नाविकों की स्थिति और उनके जहाजों की आवाजाही से जुड़ी जानकारी को एक केंद्रीकृत व्यवस्था में उपलब्ध कराना है। इसका खास तौर पर लाभ बंगाल की खाड़ी में मिलेगा जो बांग्लादेश और चीन के साझा खतरे से निपटने के लिए बेहद जरूरी था।

बंगाल की खाड़ी में भारत और बांग्लादेश की समुद्री सीमा पर रोजी-रोटी की तलाश में निकले मछुआरों के लिए हर साल का सफर बेहद जोखिम भरा साबित होता है। तटरक्षक बलों और मछुआरा संगठनों के पिछले चार-पांच सालों के आंकड़े बताते हैं कि खराब मौसम, चक्रवाती तूफानों और इंजन की खराबी के चलते हर साल दोनों देशों के औसतन 150-200 नाविक व मछुआरे अंतरराष्ट्रीय सीमा पार भटक जाते हैं या समुद्र के बीचों-बीच फंस जाते हैं। इनमें से जहां अधिकांश को तटरक्षक बलों के संयुक्त अभियानों और फ्लैग बैठकों के जरिए बचाकर सुरक्षित स्वदेश वापस भेज दिया जाता है, वहीं उफनती लहरों और नाव पलटने की त्रासदियों में हर साल 30 से 50 मछुआरे या तो गहरे समुद्र में डूबकर जान गंवा बैठते हैं या हमेशा के लिए लापता हो जाते हैं। छोटे ट्रॉलरों में आधुनिक जीपीएस और नेविगेशन सिस्टम की कमी के कारण जून से अक्टूबर के मॉनसून सीजन में यह संकट सबसे ज्यादा गहराता है।

डीजीएमए ने बंगाल की खाड़ी के अलावा हॉर्मुज जलडमरूमध्य, फारस की खाड़ी, ओमान की खाड़ी, लाल सागर, अदन की खाड़ी, बाब-अल-मंदेब, काला सागर और सोमालिया के आसपास के समुद्री इलाकों को उच्च जोखिम वाला क्षेत्र बताया है। फिलहाल इन क्षेत्रों में भारतीय नाविकों की मौजूदगी पर विशेष नजर रखने को कहा गया है। लेकिन इस पूरी व्यवस्था का महत्व बंगाल की खाड़ी के लिए भी कम नहीं है। बंगाल की खाड़ी हिंद महासागर का एक महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है और भारत के पूर्वी तट, बंदरगाहों तथा अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए इसकी रणनीतिक भूमिका बेहद अहम है।

संकट में सबसे पहला सवाल - कहां है भारतीय नाविक?

किसी समुद्री दुर्घटना, जहाज पर हमले, आग, समुद्री डकैती या किसी दूसरे आपात हालात में सबसे महत्वपूर्ण सवाल होता है कि प्रभावित जहाज कहां है और उस पर कितने भारतीय नागरिक मौजूद हैं। अभी तक ऐसी जानकारी कई बार अलग-अलग एजेंसियों, शिपिंग कंपनियों और जहाज संचालकों के जरिए हासिल करनी पड़ती है।

आपात स्थिति में सुगम होगी जहाजों की ट्रैकिंग

नए मॉड्यूल का उद्देश्य इसी सूचना तंत्र को एक जगह लाना है। इसमें जहाज की पहचान, उसकी स्थिति, यात्रा से जुड़ी जानकारी, जहाज पर मौजूद भारतीय नाविकों का विवरण और संबंधित भर्ती एवं नियुक्ति एजेंसी की जानकारी दर्ज की जाएगी। जहाज की वास्तविक स्थिति उपलब्ध नहीं होने पर संबंधित भौगोलिक क्षेत्र का चयन कर जानकारी दर्ज करने की व्यवस्था भी रखी गई है। यानी आपात स्थिति में सरकार के सामने सिर्फ जहाज का नाम नहीं, बल्कि उससे जुड़े भारतीय नाविकों का केंद्रीकृत विवरण उपलब्ध कराने की कोशिश है।

बंगाल की खाड़ी के लिए क्यों अहम है यह व्यवस्था?

बंगाल की खाड़ी में भारत के कई महत्वपूर्ण बंदरगाह हैं और यहां से बड़ी संख्या में मालवाहक जहाजों की आवाजाही होती है। कोलकाता और हल्दिया जैसे बंदरगाह पूर्वी भारत के व्यापारिक ढांचे का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इसके अलावा यह क्षेत्र भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र से जोड़ने वाले समुद्री संपर्क का भी हिस्सा है। ऐसे में बंगाल की खाड़ी में किसी बड़े समुद्री हादसे या सुरक्षा संकट की स्थिति में भारतीय नाविकों की मौजूदगी का अद्यतन रिकॉर्ड तत्काल उपलब्ध होना राहत और बचाव अभियान के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है। यही वजह है कि डीजीएमए की नई व्यवस्था को केवल पश्चिम एशिया या काला सागर के मौजूदा संकट तक सीमित करके देखने के बजाय भारत की व्यापक समुद्री सुरक्षा व्यवस्था के हिस्से के रूप में देखा जा रहा है।

रोजाना अपडेट होगी जहाज की स्थिति

नये मॉड्यूल की खासियत यह है कि शुरुआती स्तर पर जहाज और उसमें मौजूद भारतीय चालक दल की पूरी जानकारी दर्ज करने के बाद जहाज की स्थिति को रोजाना अपडेट करना होगा। चालक दल के किसी सदस्य के जहाज पर आने या उतरने की जानकारी भी नियमित रूप से अपडेट करनी होगी। इससे किसी खास समय पर यह पता लगाने में मदद मिल सकती है कि किसी जोखिम वाले समुद्री क्षेत्र में कितने भारतीय नाविक मौजूद हैं और वे किन जहाजों पर तैनात हैं।

हालांकि, यह व्यवस्था फिलहाल बीटा संस्करण में चल रही है और इसमें काफी हद तक संबंधित भर्ती एजेंसियों तथा जहाज कंपनियों को जानकारी अपडेट करनी होगी। डीजीएमए का कहना है कि वह भविष्य में इस प्रक्रिया को अधिक स्वचालित बनाने के विकल्प तलाश रहा है, ताकि मैनुअल जानकारी भरने पर निर्भरता कम हो।

असली चुनौती - क्या सूचना समय पर अपडेट होगी?

ट्रैकिंग व्यवस्था की सफलता सिर्फ तकनीक पर निर्भर नहीं करेगी। बल्कि सबसे बड़ी चुनौती आंकड़ों को लगातार और सही तरीके से अपडेट करना होगी। यदि जहाज की स्थिति या चालक दल में बदलाव की जानकारी समय पर दर्ज नहीं हुई तो आपात स्थिति में उपलब्ध आंकड़ा पुराना हो सकता है। इसीलिए डीजीएमए ने जहाज मालिकों, संचालकों और संबंधित भर्ती एजेंसियों को उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में मौजूद जहाजों और भारतीय चालक दल की जानकारी प्राथमिकता के आधार पर अपडेट करने को कहा है।

दूसरी महत्वपूर्ण बात आंकड़ों की सुरक्षा है। डीजीएमए के अनुसार, जहाजों की स्थिति से जुड़ी जानकारी को गोपनीय और नियंत्रित पहुंच वाली सूचना के रूप में रखा जाएगा। इसे केवल अधिकृत अधिकारी निर्धारित लॉगिन के जरिए देख सकेंगे। यह पहल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि समुद्री सुरक्षा से जुड़ी वास्तविक समय की जानकारी सार्वजनिक होने पर सुरक्षा जोखिम पैदा कर सकती है।

पश्चिम एशिया और काला सागर की घटनाओं ने बढ़ाई चिंता

नए मॉड्यूल की जरूरत को हाल के घटनाक्रम से समझा जा सकता है। विदेश मंत्रालय से साझा की गई जानकारी के अनुसार, मध्य-पूर्व संकट में अब तक दस भारतीय नाविकों की मौत हो चुकी है। इसके अलावा काला सागर क्षेत्र में पांच और भारतीय नाविकों के मारे जाने की पुष्टि हुई है। इन घटनाओं ने यह सवाल और गंभीर बना दिया है कि संकट की स्थिति में सरकार के पास विदेशों में मौजूद भारतीय नाविकों की कितनी ताजा और सटीक जानकारी उपलब्ध है।

यही वह जगह है जहां नया ट्रैकिंग मॉड्यूल महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यदि किसी जहाज की स्थिति, उसके मार्ग और उस पर मौजूद भारतीय नाविकों की जानकारी एक ही प्रणाली में उपलब्ध हो, तो संकट के दौरान संबंधित सरकारी एजेंसियों के बीच सूचना साझा करने और प्रतिक्रिया शुरू करने में लगने वाला समय कम किया जा सकता है।

क्या कहना है रक्षा विशेषज्ञों का?

सेवानिवृत्त नौसेना अधिकारी धनंजय भगत ने इस पहल को 'समुद्री स्थितिजन्य जागरूकता' मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया हैं। हिन्दुस्थान समाचार से विशेष बातचीत में उन्होंने कहा, “समुद्री सुरक्षा में सबसे महत्वपूर्ण चीज सिर्फ यह जानना नहीं है कि कोई जहाज कहां है, बल्कि यह जानना भी है कि उस जहाज पर हमारे कितने नागरिक मौजूद हैं। यदि यह जानकारी लगातार अद्यतन और विश्वसनीय रूप में उपलब्ध रहती है तो किसी संकट की स्थिति में नौसेना, तटरक्षक, विदेश मंत्रालय और अन्य संबंधित एजेंसियों के बीच समन्वय तेजी से किया जा सकता है। हालांकि ट्रैकिंग प्रणाली तभी प्रभावी होगी जब जहाज की स्थिति और चालक दल से जुड़ी जानकारी समय पर अपडेट हो और उसे वास्तविक समय की समुद्री निगरानी व्यवस्था से जोड़ा जाए।”

धनंजय भगत ने यह भी रेखांकित किया है कि बंगाल की खाड़ी जैसे बड़े समुद्री क्षेत्र में केवल जहाजों की निगरानी पर्याप्त नहीं है। जहाज की पहचान, मार्ग, चालक दल, संचार व्यवस्था और आसपास की सुरक्षा स्थिति को एक साथ देखने वाली व्यवस्था ज्यादा प्रभावी होगी।

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हिन्दुस्थान समाचार / ओम पराशर