बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर लाल किले पर गूंजेगा जनजातीय अस्मिता का स्वर
नई दिल्ली, 20 मई (हि.स.)। देश की राजधानी दिल्ली में लाल किला मैदान में रविवार 24 मई काे “जनजातीय सांस्कृतिक समागम” का आयोजन होने जा रहा है जिसमें देश के हर राज्य एवं क्षेत्र से 550 से अधिक आदिवासी समुदायाें के एक लाख से ज्यादा लाेग भारत के आदिवासी समाज की पहचान, परंपरा, संघर्ष, सांस्कृतिक गौरव और सामाजिक चेतना का विराट प्रदर्शन करेंगे।
महान स्वतंत्रता सेनानी और आदिवासी जननायक भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर जनजातीय समाज की एकता, सांस्कृतिक पुनर्जागरण और सामाजिक जागरण का प्रतीक माना जा रहे इस महाआयोजन में देश के गृह मंत्री अमित शाह मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होंगे। इसके अलावा देश के विभिन्न राज्यों से जनजातीय समाज के कई प्रमुख प्रतिनिधि, सामाजिक कार्यकर्ता, बुद्धिजीवी और सांस्कृतिक समूह भी कार्यक्रम में भाग लेंगे।
भारत के ऐतिहासिक और राजनीतिक प्रतीकों में शामिल लाल किला पहली बार इतने बड़े स्तर पर जनजातीय सांस्कृतिक चेतना का केंद्र बनने जा रहा है। आयोजकों का मानना है कि यह आयोजन केवल उत्सव या शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि देश के आदिवासी समाज की सांस्कृतिक उपस्थिति और राष्ट्रीय जीवन में उसकी भूमिका को नई पहचान देने का प्रयास है।
550 से अधिक जनजातीय समुदायों का होगा संगम
आयोजकों के अनुसार देशभर के 550 से अधिक जनजातीय समुदायों से लगभग डेढ़ लाख प्रतिनिधियों के इस समागम में शामिल होने की संभावना है। उत्तर-पूर्व भारत के पर्वतीय क्षेत्रों से लेकर मध्य भारत के वनांचलों, पश्चिमी भारत के आदिवासी बहुल इलाकों, अंदमान एवं निकाेबार के द्वीपाें और दक्षिण भारत के दूरस्थ क्षेत्रों में निवास करने वाले जनजातीय लोग दिल्ली पहुंचेंगे।
विशेष बात यह है कि सम्मेलन में शामिल होने वाले अधिकांश प्रतिनिधि किसी सरकारी सहायता के बिना अपने स्वयं के संसाधनों और सामुदायिक सहयोग के माध्यम से राजधानी पहुंच रहे हैं। जनजातीय समाज के लोगों का कहना है कि यह आयोजन केवल एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि उनकी सांस्कृतिक अस्मिता, सामाजिक अधिकारों और ऐतिहासिक पहचान से जुड़ा भावनात्मक आंदोलन है।
हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर लोगों का दिल्ली पहुंचना इस बात का प्रमाण माना जा रहा है कि आदिवासी समाज अपने इतिहास, संस्कृति और अधिकारों को लेकर पहले से अधिक जागरूक, संगठित और सक्रिय हो रहा है।
गांवों-जंगलों तक पहुंचा जनसंपर्क अभियान
इस विराट आयोजन का नेतृत्व जनजातीय सुरक्षा मंच कर रहा है। मंच के राष्ट्रीय संयोजक गणेश राम भगत की अध्यक्षता में पिछले कई महीनों से देशभर में व्यापक जनसंपर्क अभियान चलाया गया। आयोजन से जुड़े कार्यकर्ताओं ने गांवों, जंगलों, पहाड़ी क्षेत्रों और दूरस्थ आदिवासी बस्तियों तक पहुंचकर लोगों को सम्मेलन के उद्देश्य, सांस्कृतिक एकता और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े विषयों के प्रति जागरूक किया।
आयोजकों का कहना है कि सम्मेलन का उद्देश्य केवल सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देना नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की समस्याओं, अधिकारों, पहचान और भविष्य से जुड़े मुद्दों को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में लाना भी है। यही कारण है कि यह आयोजन अब एक व्यापक सामाजिक और सांस्कृतिक आंदोलन का स्वरूप लेता दिखाई दे रहा है।
कई राज्यों से विशेष तैयारियां
मध्य प्रदेश के महाकौशल, मालवा और निमाड़ क्षेत्रों से दस हजार से अधिक आदिवासी प्रतिनिधियों के दिल्ली पहुंचने की तैयारी की गई है। इसके लिए विशेष ट्रेनों में टिकट बुक कराए गए हैं ताकि विभिन्न जिलों से लोग सामूहिक रूप से राजधानी पहुंच सकें। अंदमान एवं निकाेबार द्वीपाें में रहने वाले लाेग जलमार्ग से चेन्नई के लिए निकल चुके हैं और वे चेन्नई से दक्षिणी जनजातीय समूहाें के साथ ट्रेन से दिल्ली आ रहे हैं।
इसके अतिरिक्त झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और पूर्वोत्तर राज्यों से भी बड़ी संख्या में प्रतिनिधियों के शामिल होने की संभावना है। आयोजकों के अनुसार सम्मेलन में भाग लेने वाले लोग पारंपरिक वेशभूषा, लोक वाद्ययंत्रों और सांस्कृतिक प्रतीकों के साथ पहुंचेंगे, जिससे पूरा आयोजन भारतीय जनजातीय संस्कृति की विविधता और समृद्ध विरासत का जीवंत चित्र प्रस्तुत करेगा।
सामाजिक और संवैधानिक मुद्दों पर भी होगी चर्चा
यह सम्मेलन केवल सांस्कृतिक प्रस्तुतियों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसमें सामाजिक, संवैधानिक और पहचान से जुड़े महत्वपूर्ण विषयों पर भी चर्चा की जाएगी। जनजातीय समाज के कई संगठनों का मानना है कि जो व्यक्ति अपनी पारंपरिक संस्कृति, रीति-रिवाज, आस्था और सामाजिक पहचान से पूरी तरह अलग हो चुका है, उसे जनजातीय आरक्षण और अन्य विशेष लाभों का अधिकार नहीं मिलना चाहिए।
इसी मुद्दे को लेकर सम्मेलन में व्यापक विमर्श होने की संभावना है। सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जनजातीय समुदायों की मौलिक पहचान, पारंपरिक संस्कृति और सामाजिक संरचना को संरक्षित करना वर्तमान समय की बड़ी आवश्यकता है। इसलिए यह आयोजन सांस्कृतिक उत्सव के साथ-साथ सामाजिक चेतना और संवैधानिक अधिकारों के विमर्श का भी बड़ा मंच बनेगा।
पांच मार्गों से निकलेगी भव्य शोभायात्रा
आयोजकों के अनुसार 24 मई की शाम मुख्य कार्यक्रम से पहले दिल्ली के पांच अलग-अलग मार्गों से भव्य शोभायात्राएं निकाली जाएंगी। इन शोभायात्राओं में देशभर से आए जनजातीय प्रतिनिधि पारंपरिक पोशाकों में लोकगीत, लोकनृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियां देंगे।
ढोल, मांदर, नगाड़ों और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज के बीच निकलने वाली ये यात्राएं राजधानी की सड़कों पर जनजातीय संस्कृति की रंगीन और जीवंत झलक प्रस्तुत करेंगी। आयोजकों का कहना है कि यह शोभायात्रा केवल सांस्कृतिक प्रदर्शन नहीं होगी, बल्कि आदिवासी समाज की एकता, आत्मगौरव और परंपराओं का सार्वजनिक उद्घोष बनेगी।
बिरसा मुंडा के संघर्ष और बलिदान को किया जाएगा नमन
सम्मेलन में भगवान बिरसा मुंडा के संघर्ष, बलिदान और सामाजिक चेतना को विशेष रूप से याद किया जाएगा। बिरसा मुंडा को भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में आदिवासी समाज की आवाज़ और अंग्रेजी शासन के खिलाफ जनसंघर्ष के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।
आयोजकों का कहना है कि यह समागम नई पीढ़ी को बिरसा मुंडा के विचारों, संघर्षों और सांस्कृतिक चेतना से जोड़ने का भी प्रयास करेगा। सम्मेलन में उनके जीवन पर आधारित सांस्कृतिक प्रस्तुतियां, विचार गोष्ठियां और प्रेरक संबोधन भी आयोजित किए जाने की संभावना है।
कई प्रमुख जनजातीय प्रतिनिधि होंगे शामिल
सम्मेलन में डॉ. राजकिशोर हांसदा, सत्येन्द्र सिंह खरवार, हर्ष चौहान, बुधरी ताती, तेची गुविन, हीरा कुमार नागू, अशोक कुमार गोंड, महेश भागचंदका और प्रकाश उईके जैसे अनेक प्रमुख जनजातीय प्रतिनिधि अपनी उपस्थिति दर्ज कराएंगे।
आयोजकों का मानना है कि लाल किले की ऐतिहासिक धरती पर होने वाला यह सम्मेलन भविष्य में केवल एक सांस्कृतिक आयोजन के रूप में नहीं, बल्कि जनजातीय समाज की नई सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक चेतना के प्रतीक के रूप में याद किया जा सकता है।------------हिन्दुस्थान समाचार/ सौरभ राय
हिन्दुस्थान समाचार / उदय कुमार सिंह

