विकास के नए मानक गढ़ रहा बिहार, 20 वर्षों में एचडीआई, आय और गरीबी उन्मूलन में उल्लेखनीय सुधार
पटना, 12 जून (हि.स.)। कभी पिछड़ेपन और गरीबी की चुनौतियों से जूझने वाला बिहार अब विकास के कई महत्वपूर्ण मानकों पर नई पहचान बना रहा है। सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय, नीति आयोग, राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस), सैंपल रजिस्ट्रेशन सिस्टम (एसआरएस) तथा बिहार आर्थिक सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि पिछले दो दशकों में राज्य ने मानव विकास, गरीबी उन्मूलन, स्वास्थ्य, शिक्षा, आय और रोजगार जैसे क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति दर्ज की है।
आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2006 से 2023 के बीच बिहार का मानव विकास सूचकांक (एचडीआई) 0.485 से बढ़कर 0.614 हो गया। इस दौरान राज्य के एचडीआई में लगभग 27 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो राष्ट्रीय औसत 23 प्रतिशत से अधिक है। यह उपलब्धि शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और जीवन स्तर में सुधार का संकेत देती है।
गरीबी उन्मूलन के क्षेत्र में बिहार का प्रदर्शन और भी प्रभावशाली रहा है। नीति आयोग के बहुआयामी गरीबी सूचकांक (एमपीआई) के अनुसार वर्ष 2015-16 से 2019-21 के बीच राज्य में बहुआयामी गरीबी 51.89 प्रतिशत से घटकर 33.76 प्रतिशत रह गई। 18.13 प्रतिशत अंक की यह गिरावट देश के सभी राज्यों में सर्वाधिक मानी गई है। राष्ट्रीय स्तर पर इसी अवधि में गरीबी में 9.89 प्रतिशत अंक की कमी दर्ज की गई, जबकि बिहार ने लगभग दोगुना सुधार हासिल किया।
विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, आवास, स्वच्छता और बुनियादी सेवाओं के विस्तार के लिए किए गए निवेश और लक्षित कल्याणकारी योजनाओं ने इस परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
आर्थिक क्षेत्र में भी बिहार ने उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल की हैं। वर्ष 2004 में राज्य की प्रति व्यक्ति आय 5,780 रुपये थी, जो वित्तीय वर्ष 2024-25 में बढ़कर 76,490 रुपये हो गई। यह लगभग 13 गुना यानी 1,223 प्रतिशत की वृद्धि है। इस अवधि में बिहार ने करीब 13 प्रतिशत की वार्षिक चक्रवृद्धि वृद्धि दर दर्ज की, जिसे राष्ट्रीय औसत की तुलना में बेहतर माना जा रहा है।
विकास व्यय में वृद्धि का सकारात्मक प्रभाव सामाजिक क्षेत्रों में भी दिखाई देता है। वर्ष 2005-06 में प्रति व्यक्ति विकास व्यय 1,463 रुपये था, जो 2024-25 में बढ़कर 13,279 रुपये तक पहुंच गया। इसी अवधि में स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च 14.8 गुना और शिक्षा पर खर्च 13.2 गुना बढ़ा है।
स्वास्थ्य क्षेत्र में सुधार का सबसे बड़ा प्रमाण संस्थागत प्रसव के आंकड़ों में दिखाई देता है। वर्ष 2005-06 में जहां केवल 19.9 प्रतिशत प्रसव स्वास्थ्य संस्थानों में होते थे, वहीं 2023-24 में यह आंकड़ा बढ़कर 81.1 प्रतिशत हो गया। इसके साथ ही जन्म के समय औसत जीवन प्रत्याशा 64.2 वर्ष से बढ़कर 69.5 वर्ष हो गई है।
रोजगार के मोर्चे पर भी बिहार का प्रदर्शन उत्साहजनक रहा है। पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (पीएलएफएस) 2024 के अनुसार राज्य की बेरोजगारी दर 3 प्रतिशत दर्ज की गई, जो राष्ट्रीय औसत 3.2 प्रतिशत से कम है।
सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) की दिशा में भी बिहार तेजी से आगे बढ़ रहा है। वर्ष 2023-24 में स्वच्छ जल एवं स्वच्छता (एसडीजी-6) के क्षेत्र में 98 अंकों के साथ बिहार देश में तीसरे स्थान पर रहा। वहीं अच्छे स्वास्थ्य एवं कल्याण (एसडीजी-3) के मामले में राज्य का स्कोर वर्ष 2018-19 के 44 से बढ़कर 2023-24 में 67 हो गया।
आंकड़े स्पष्ट संकेत देते हैं कि बिहार ने पिछले दो दशकों में सामाजिक और आर्थिक विकास की दिशा में मजबूत आधार तैयार किया है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इस प्रगति को और गति देने के लिए रोजगार सृजन, औद्योगिक निवेश, कौशल विकास तथा गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के विस्तार पर निरंतर ध्यान बनाए रखना होगा। यदि यह गति बरकरार रही, तो आने वाले वर्षों में बिहार देश के अग्रणी विकासशील राज्यों में अपनी स्थिति और मजबूत कर सकता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / गोविंद चौधरी

