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जालंधर में प्रधानमंत्री की रैली के साथ भाजपा करेगी पंजाब में चुनावी अभियान का आगाज

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जालंधर में प्रधानमंत्री की रैली के साथ भाजपा करेगी पंजाब में चुनावी अभियान का आगाज


नई दिल्ली, 07 जुलाई (हि.स.)। पश्चिम बंगाल जैसे मुश्किल राज्य के विधानसभा चुनावों में ऐतिहासिक जीत हासिल करने के बाद आत्मविश्वास से लबरेज भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने अब पंजाब फतेह करने की रणनीति पर गंभीरता से काम करना शुरू कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की इस माह जालंधर में प्रस्तावित रैली को भाजपा के चुनावी शंखनाद के रूप में देखा जा रहा है।

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने हिन्दुस्थान समाचार से बातचीत में कहा कि भाजपा बंगाल के बाद पंजाब को जीतने की पुरजोर कोशिश करेगी। इसके लिए संगठन के स्तर पर भी तैयारी हो रही है। बूथ स्तर से लेकर जिला संगठन तक को मजबूत करने पर ध्यान दिया जा रहा है। संघ के कई पदाधिकारियाें ने वहां बैठकें ली हैं। उन्हाेंने कहा कि अपने पुराने साथी शिरोमणि अकाली दल को साथ लेकर चुनाव लड़ा जाये या अकेले चुनाव में जायें, इस पर पार्टी में अभी कोई मत नहीं बना है। हालांकि गृह मंत्री अमित शाह ने कुछ समय पहले कहा था कि भाजपा अकेले 117 सीटों पर चुनाव लड़ेगी। पर सूत्रों के अनुसार भाजपा एवं अकालियों के बीच गठबंधन को लेकर बातचीत जारी है जिसके अनुसार भाजपा अब छोटे भाई नहीं बल्कि बड़े भाई की भूमिका निभाना चाहती है।

पंजाब की राजनीति हमेशा से देश की सबसे दिलचस्प और जटिल राजनीतिक तस्वीरों में से एक रही है। यहां सत्ता परिवर्तन केवल सरकार बदलने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि इसके साथ सामाजिक समीकरण, किसान राजनीति, सिख पहचान, धार्मिक संस्थाओं का प्रभाव और राष्ट्रीय दलों की रणनीति भी बदलती रही है। पंजाब ने विभाजन की त्रासदी भी देखी एवं सिख अलगावाद का दौर भी झेला है। पिछले दो दशकों में पंजाब ने तीन अलग-अलग राजनीतिक दौर देखे हैं। पहले शिरोमणि अकाली दल और भारतीय जनता पार्टी भाजपा का गठबंधन, फिर कांग्रेस की वापसी और उसके बाद आम आदमी पार्टी का अभूतपूर्व उभार। अब एक बार फिर भारतीय जनता पार्टी पूरे दमखम के साथ पंजाब में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

एक समय था जब पंजाब की राजनीति का सबसे मजबूत गठबंधन शिरोमणि अकाली दल और भाजपा का माना जाता था। शिराेमणि अकाली दल और शिवसेना पहले ऐसे राजनीतिक दल थे जाे भाजपा के साथ 1996 में गठबंधन में आए थे और पहली बार 1997 में पंजाब में भाजपा एवं शिराेमणि अकाली दल ने पंजाब में मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया। जिसके बाद दोनों ने मिलकर पंजाब में कुल तीन बार 1997, 2007 और 2012 सरकार बनाईं। इस दाैरान दाेनाें दलाें ने केन्द्र में भी राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में मजबूत साझीदारी निभायी लेकिन वर्ष 2020 में केंद्र के विवादास्पद कृषि कानूनाें के विरोध में शिराेमणि अकाली दल ने भाजपा का साथ छोड़ दिया।

हालांकि इतिहास देखा जाये तो दोनों दलों ने लंबे समय तक मिलकर सरकार चलाई और सत्ता का संतुलन बनाए रखा। अकाली दल जहां ग्रामीण और सिख मतदाताओं का प्रतिनिधित्व करता था, वहीं भाजपा शहरी, हिन्दू और व्यापारी वर्ग में अपनी मजबूत पकड़ रखती थी। इसके बाद पंजाब की राजनीति पूरी तरह बदल गई और भाजपा को पहली बार अपने दम पर राज्य में संगठन खड़ा करने की चुनौती मिली।

भाजपा और अकाली का गठबंधन टूटने से कांग्रेस को फायदा मिला। इसका फायदा उठाकर कांग्रेस ने सत्ता में वापसी की, लेकिन आंतरिक कलह, नेतृत्व परिवर्तन और संगठनात्मक कमजोरी ने उसकी सरकार को जनता की अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरने दिया। मुख्यमंत्री बदलने जैसे फैसलों ने पार्टी की स्थिति को और कमजोर किया। कांग्रेस की आंतरिक कलह और भाजपा की नामौजूदगी का फायदा आम आदमी पार्टी को मिला। इसका नतीजा यह हुआ कि आम आदमी पार्टी जबर्दस्त तरीके से सत्ता में आई। इस ऐतिहासिक बहुमत ने पंजाब की राजनीति में नया अध्याय लिख दिया। लेकिन इस एतिहासिक बहुमत ने भी पंजाब को समस्याओं से नहीं निकाला बल्कि समस्या को बढ़ा दिया। ख़बरों के अनुसार सत्ता के लिए केजरीवाल ने खालिस्तान समर्थको से भी मुलाकात की थी। बाद के दिनों में आम आदमी पार्टी के ढीले रवैया का फायदा उठाकर खालिस्तान समर्थकों ने भारत को फिर से अस्थिर करने की कोशिश की।

इसी बीच भाजपा ने पंजाब में अपनी रणनीति पूरी तरह बदल दी है। अब पार्टी किसी गठबंधन पर निर्भर रहने के बजाय अपने संगठन को गांव-गांव तक मजबूत करने, नए नेताओं को जोड़ने और युवा, किसान, अनुसूचित जाति तथा शहरी मतदाताओं के बीच आधार बढ़ाने पर काम कर रही है। विभिन्न दलों के नेताओं का भाजपा में शामिल होना भी इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पार्टी राष्ट्रीय नेतृत्व के प्रभाव और केंद्र सरकार की योजनाओं के माध्यम से राज्य में अपनी स्वीकार्यता बढ़ाने की कोशिश कर रही है। दूसरी ओर, शिरोमणि अकाली दल अपनी खोई राजनीतिक जमीन वापस पाने के लिए संघर्ष कर रहा है। कांग्रेस भी संगठन को फिर से मजबूत करने और जनता का भरोसा जीतने की कोशिश में लगी है। ऐसे में पंजाब की राजनीति अब त्रिकोणीय नहीं बल्कि बहुकोणीय मुकाबले की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है, जहां प्रत्येक दल अपने-अपने सामाजिक और राजनीतिक समीकरण तैयार कर रहा है।

पंजाब की राजनीतिक यात्रा यह बताती है कि यहां सत्ता कभी स्थायी नहीं रही। जनता ने समय-समय पर हर बड़े दल को अवसर भी दिया है और सत्ता से बाहर का रास्ता भी दिखाया है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भाजपा अपने संगठन विस्तार के दम पर नया राजनीतिक समीकरण बना पाएगी, क्या बंगाल की तरह भाजपा यहाँ भी अपनी सांगठनिक ताकत के बल पर सत्ता परिवर्तन करने में सफल होगी। क्या पंजाब की जनता जिसने आम आदमी पार्टी को ऐतिहासिक बहुमत से जिताया था उसे बाहर का रास्ता दिखा देगी। इन सवालाें के जवाब तो अगले साल की शुरूआत में होने वाले पंजाब विधानसभा चुनाव के बाद ही मिलेंगे। लेकिन एक बात तो तय है कि भाजपा इस बार पंजाब में पूरी ताकत के साथ चुनाव में जाने वाली है।

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हिन्दुस्थान समाचार / सौरव राय