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शिक्षा की गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध बिहार में दरभंगा जिला का भूपतारा चंद्रशेखर महाविद्यालयअ तीत की यादों में सिमटा

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शिक्षा की गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध बिहार में दरभंगा जिला का भूपतारा चंद्रशेखर महाविद्यालयअ तीत की यादों में सिमटा


दरभंगा, 26 फ़रवरी (हि.स.)। बिहार में दरभंगा जिला के तारडीह प्रखंड अंतर्गत वर्ष 1979 में स्थापित भूपतारा चंद्रशेखर महाविद्यालय, नदियायी कभी क्षेत्र में उच्च शिक्षा का प्रमुख केंद्र माना जाता था। लेकिन आज यह संस्थान जर्जर अवस्था में अतीत की यादों तक सिमट गया है।

इंटर एवं बीए की पढ़ाई के लिए प्रसिद्ध यह महाविद्यालय इंटरमीडिएट बोर्ड पटना से संबद्ध था और शुरुआती वर्षों में इसका रिजल्ट बिहार में अव्वल माना जाता था। उस दौर में जब राज्य में इंटर कॉलेजों की शुरुआत हो रही थी, तब यह संस्थान अग्रणी स्थान पर था। लगभग 54 शिक्षक और ढाई सौ से अधिक विद्यार्थी यहां अध्ययनरत थे।

प्रख्यात जमींदार चंद्रशेखर चौधरी द्वारा दान में दी गई लगभग सात बीघा भूमि पर यह महाविद्यालय स्थापित हुआ था। शिक्षकों ने दशकों तक बिना वेतन सेवा दी और संबद्धता शुल्क चंदा इकट्ठा कर जमा किया। लाखों रुपये की एफिलिएशन फीस दी जाती रही, लेकिन शिक्षकों को नियमित मानदेय नहीं मिला। इसके बावजूद समर्पित शिक्षकों—कृष्ण कुमार झा, वीरेंद्र मिश्र, प्रेमकुमार झा और प्रेमचंद्र झा—के प्रयासों से यहां से साढ़े तीन हजार से अधिक छात्र डॉक्टर, प्रोफेसर, शिक्षक और विभिन्न प्रशासनिक पदों पर पहुंचे। आसपास के कई विद्यालयों में आज भी इस संस्थान के पूर्व छात्र शिक्षक के रूप में कार्यरत हैं।

महाविद्यालय दलित, महादलित और ओबीसी वर्ग के छात्रों के लिए भी शिक्षा का केंद्र था। विशेष रूप से छात्राओं की बड़ी संख्या यहां पढ़ती थी। पुराने विद्यार्थी आज भी अपने प्रमाणपत्र के लिए यहां पहुंचते हैं और खंडहर में बदल चुकी इमारत को देखकर भावुक हो उठते हैं। समय के साथ शिक्षा नीति में बदलाव और प्रशासनिक अनियमितताओं के कारण इंटर कॉलेज की मान्यता समाप्त हो गई।

बहाली और मंजूरी के नाम पर लाखों रुपये लेने के आरोप तत्कालीन सचिव विजय कांत ठाकुर पर लगे। कई शिक्षकों ने जमीन और गहने बेचकर राशि दी, फिर भी उन्हें न्याय नहीं मिला। रैबती चौधरी, प्रमोद राय और विंध्य नाथ चौधरी यहां लिपिक पद पर कार्यरत थे।

वर्तमान में महाविद्यालय का विशाल परिसर अतिक्रमण की चपेट में है। जहां कभी सैकड़ों विद्यार्थियों की चहल-पहल रहती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा है। स्थानीय लोगों और पूर्व छात्रों ने प्रशासन से इस ऐतिहासिक शैक्षणिक धरोहर के संरक्षण और पुनर्जीवन की मांग की है, ताकि क्षेत्र में शिक्षा की वह गौरवशाली परंपरा फिर से जीवित हो सके।

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हिन्दुस्थान समाचार / Krishna Mohan Mishra