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महाभारत काल से जुड़ा है लोधेश्वर महादेव धाम, काशी की तर्ज पर बन रहा कॉरिडोर

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महाभारत काल से जुड़ा है लोधेश्वर महादेव धाम, काशी की तर्ज पर बन रहा कॉरिडोर


बाराबंकी, 30 जुलाई। उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले की रामनगर तहसील से लगभग तीन किलोमीटर दूर स्थित लोधेश्वर महादेव धाम उत्तर भारत के प्रमुख शिव तीर्थों में गिना जाता है। पौराणिक मान्यताओं, धार्मिक आस्था और ऐतिहासिक महत्व के कारण यहां प्रतिदिन हजारों श्रद्धालु दर्शन और जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं। श्रावण मास, महाशिवरात्रि, हरतालिका तीज और अगहन मास में लगने वाले विशाल मेलों में लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ती है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ द्वारा काशी विश्वनाथ धाम की तर्ज पर लोधेश्वर महादेव कॉरिडोर विकसित करने की घोषणा के बाद इस प्राचीन तीर्थ का महत्व और बढ़ गया है तथा यहां सुविधाओं का विस्तार तेजी से किया जा रहा है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार लोधेश्वर महादेव का शिवलिंग स्वयंभू है और इसे पृथ्वी पर विद्यमान 52 स्वयंभू शिवलिंगों में से एक माना जाता है। विद्वानों के अनुसार यह स्थल महाभारत और रामायण काल की घटनाओं से भी जुड़ा हुआ है। पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार सतयुग में भगवान विष्णु ने वाराह अवतार लेकर पृथ्वी का उद्धार किया था। इसके बाद उन्होंने भगवान शिव की आराधना की, तब शिव गंडकी नदी के तट पर स्वयंभू लिंग के रूप में प्रकट हुए। भगवान विष्णु ने ही इस शिवलिंग का नाम 'गंडकेश्वर' रखा।

त्रेता युग में भगवान श्रीराम के जलसमाधि लेने के बाद उनके पुत्र लव शोकाकुल हो गए। महर्षि वशिष्ठ के निर्देश पर उन्होंने वाराह क्षेत्र में आकर भगवान शिव की आराधना की और इस शिवलिंग का नाम 'लवेश्वर' रखा। इसके बाद द्वापर युग में पांडवों और माता कुंती के इस क्षेत्र में आने का उल्लेख मिलता है। मान्यता है कि माता कुंती ने निकटवर्ती किंतूर में कुंतेश्वर महादेव की स्थापना की और अर्जुन इंद्रलोक से पारिजात वृक्ष लेकर आए, जो आज भी क्षेत्र की धार्मिक पहचान बना हुआ है।

महाभारत काल से जुड़ी एक अन्य मान्यता के अनुसार कौरव-पांडव युद्ध के लिए प्रारंभिक रूप से इसी क्षेत्र पर विचार किया गया था, लेकिन इसे पृथ्वी का मध्य क्षेत्र तथा अयोध्या और नैमिषारण्य के मध्य स्थित पवित्र स्थल मानते हुए युद्ध का स्थान बदल दिया गया। धर्मराज युधिष्ठिर ने यहां यज्ञ कर भगवान शिव का पूजन किया। अर्जुन के बाण से निकली जलधारा को आज भी 'बोहनिया तालाब' के रूप में जाना जाता है, जहां कांवड़िए स्नान करने के बाद लोधेश्वर मंदिर में जलाभिषेक करने जाते हैं।

कलियुग में लोधौरा गांव के निवासी लोधेराम अवस्थी को भगवान शिव ने स्वप्न में दर्शन देकर अपने प्रकट होने का संकेत दिया। खेत की खुदाई के दौरान शिवलिंग मिलने के बाद उन्होंने उसकी पूजा-अर्चना शुरू की। मान्यता है कि भगवान शिव ने स्वयं कहा था कि कलियुग में वे लोधेराम के नाम से 'लोधेश्वर' कहलाएंगे। बाद में उनके निर्देशानुसार सवाई सहदेव पुरी को मंदिर का पहला महंत बनाया गया। तभी से पुरी संप्रदाय के संन्यासी इस मठ की परंपरा को आगे बढ़ाते आ रहे हैं। वर्तमान में महंत पद का उत्तराधिकार विवाद न्यायालय में विचाराधीन है।

लोधेश्वर महादेव मठ की कई सहायक गद्दियां भी उत्तर प्रदेश के विभिन्न क्षेत्रों में स्थापित हैं। मंदिर परिसर और मठ की व्यवस्था वर्षों से पुरी संप्रदाय के संन्यासियों द्वारा संचालित की जाती रही है। पहले यहां के मेलों का संचालन मंदिर प्रशासन करता था, लेकिन पिछले करीब दो दशकों से जिला प्रशासन भी व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी संभाल रहा है।

मंदिर के पुजारी आदित्य तिवारी के अनुसार सामान्य दिनों में भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु दर्शन के लिए आते हैं, जबकि सावन, महाशिवरात्रि, हरतालिका तीज और अगहन मास के मेलों में लाखों श्रद्धालु भगवान लोधेश्वर महादेव का जलाभिषेक कर मनोकामनाएं मांगते हैं। उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान सहित कई राज्यों से कांवड़िए पैदल गंगाजल लेकर यहां पहुंचते हैं।

वरिष्ठ पत्रकार चंद्र प्रकाश चौरसिया का कहना है कि लोधेश्वर महादेव उत्तर भारत के सबसे महत्वपूर्ण शिव तीर्थों में शामिल है। काशी विश्वनाथ धाम की तर्ज पर प्रस्तावित कॉरिडोर बनने के बाद यहां श्रद्धालुओं की सुविधाएं बढ़ेंगी और धार्मिक पर्यटन को भी नई गति मिलेगी। इससे बाराबंकी का यह प्राचीन तीर्थ राष्ट्रीय स्तर पर और अधिक पहचान हासिल करेगा।

हिन्दुस्थान समाचार / पंकज कुमार चतुवेर्दी