देश-विदेश में पहचान बना रहा बांकुड़ा का टेराकोटा घोड़ा
बांकुड़ा, 06 मार्च (हि.स.)।
पश्चिम बंगाल के बांकुड़ा जिले का प्रसिद्ध टेराकोटा घोड़ा केवल एक सुंदर हस्तशिल्प नहीं है, बल्कि यह क्षेत्र की परंपरा, लोक-आस्था और ऐतिहासिक विरासत का अहम प्रतीक माना जाता है। लाल मिट्टी से बने ये घोड़े बांकुड़ा की पहचान बन चुके हैं और देश-विदेश में भी अपनी अलग जगह बना चुके हैं।
स्थानीय लोकमान्यता के अनुसार इन मिट्टी के घोड़ों का धार्मिक महत्व भी है। विशेष रूप से धर्मराज देव की पूजा में लोग अपनी मन्नत पूरी होने पर टेराकोटा घोड़े देवता को अर्पित करते हैं। इस कारण यह शिल्प स्थानीय संस्कृति और आस्था से गहराई से जुड़ा हुआ है। कई स्थानीय इतिहासकारों का मानना है कि इस तरह की माटी कला की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है।
बांकुड़ा के पंचमुड़ा और आसपास के इलाकों के कारीगर पीढ़ियों से इस कला को जीवित रखे हुए हैं। यहां बनने वाले टेराकोटा घोड़ों की पहचान उनकी लंबी गर्दन, खड़े कान और सुडौल शरीर से होती है। यह पारंपरिक शैली सदियों से चली आ रही है।
पंचमुड़ा के कारीगर गोपाल पाल ने बताया, “हमारे परिवार में चार पीढ़ियों से टेराकोटा घोड़े बनाए जा रहे हैं। यह केवल हमारा पेशा नहीं, बल्कि हमारी पहचान और परंपरा है।”
वहीं स्थानीय निवासी बाबूलाल महतो ने कहा, “धर्म ठाकुर की पूजा में मिट्टी के घोड़े चढ़ाने की परंपरा बहुत पुरानी है। मन्नत पूरी होने पर लोग यहां आकर घोड़ा चढ़ाते हैं।”
स्थानीय शोधकर्ता पेशे से शिक्षक शंभूनाथ बनर्जी के अनुसार, “बांकुड़ा का टेराकोटा घोड़ा आज भारतीय हस्तशिल्प का एक प्रतीक बन चुका है। भारतीय हस्तशिल्प के आधिकारिक लोगो में भी इसका उपयोग इसकी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक महत्ता को दर्शाता है।”
स्टेला क्रैम्रिश जैसी विदेशी कलाविदों ने बांकुड़ा घोड़े को भारतीय लोक-कला का आदिम और शाश्वत प्रतीक मानकर वैश्विक पहचान दिलाई है।
स्थानीय कारीगरों का कहना है कि इस पारंपरिक कला को बचाए रखने के लिए इसे बाजार और सम्मान दोनों मिलना जरूरी है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इस ऐतिहासिक शिल्पकला से जुड़ी रह सकें।
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हिन्दुस्थान समाचार / अभिमन्यु गुप्ता

