श्री स्वयंभू माता माता मंदिर; अनुभूतियों की पृष्ठभूमि पर श्रद्धा का बसेरा
डॉ. उमेशचन्द्र शर्मा
विन्द्याचल की सुरम्य शैली श्रृंखलाओं के मध्य पद्मावती नदी के किनारे लगभग 200 फीट ऊंची पहाड़ी पर स्थित श्री स्वयंभू माता देवी स्थानम् अपनी विशिष्ट एवं अनुपम भौगोलिक स्थिति, मनोरम प्राकृतिक दृश्यावली तथा आध्यात्मिक ऊर्जा केंद्र के रूप में प्राचीन काल से ही आकर्षण का महत्वपूर्ण केंद्र बिन्दु बना हुआ है। वस्तुत: यह स्थान अनुभूतियों की दमदार पृष्ठभूमि पर श्रद्धा का एक सुख, शांतिपूर्ण बसेरा है। वन प्रांतर में स्थित इस स्थान का मनोरम सौंदर्य जहां आमंत्रण देता हुआ प्रतीत होता है, वहीं आंतरिक ऊर्जा के उर्ध्वगमन एवं आत्मबोध की स्थिति प्राप्त किए जाने के उद्देश्य से साधनारत मनुष्यों के हेतु एक महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में भी देखे जाने योग्य है। इन्हीं महत्वपूर्ण कारकों से इस भौतिक युग में भी यह शक्ति स्थल अपनी पृथक आध्यात्मिक पहचान बनाए हुए हैं।
मध्य प्रदेश के जनजातीय बाहुल्य झाबुआ जिले के मेघनगर जनपद क्षैत्र के अंतर्गत आने वाले ग्राम देवीगढ़ स्थित श्री स्वयंभू माता मंदिर एक तरफ जहां अपने प्राकृतिक सौंदर्य की आभा लिए हुए है, वहीं तंत्र साधना एवं तंत्र विद्या के लिए भी प्रसिद्ध रहा है, और यहां के सेवादारों सहित इस स्थान से जुड़े श्रद्धालुजनों के अनुसार यहां आज भी विचित्र चमत्कारों की अनुभूति होती है। मान्यता है कि प्राचीन काल में वनाच्छादित इस दुर्गम इलाके की सुरम्य पहाड़ी पर देवी की प्रतिमा स्वयंमेव प्रकट हुई थी। देवी के प्राकट्य के संबंध में जनजातीय समुदाय के उम्रदराज लोग बताते हैं कि पावागढ़ मंदिर पहुंचने में अक्षम एक वयोवृद्ध भक्त की करुणा से द्रवित देवी ने उस वृद्ध को स्वप्न में दर्शन देते हुए कहा कि तुझे व्यथित होने की जरूरत नहीं, मैं तेरे गांव की पहाड़ी पर ही विद्यमान हूं। बाद में जब ग्रामवासियों ने निर्दिष्ट स्थान की खुदाई की तो वहां देवी प्रतिमा मिली, जिसे बाद में विधि विधान से प्राण प्रतिष्ठित किया गया और चूंकि देवी प्रतिमा यहां स्वयंमेव प्रकट हुई थी, इसीलिए देवी को स्वयंभू माता का नाम दिया गया और यहां निर्मित मंदिर स्वयंभू माता मंदिर नाम पा गया, किंतु आम जनमानस में यह स्थल शंभू माता के ही नाम से जाना जाता है। यहां लगने वाले मेले को भी शंभू माता का मेला ही कहा जाता है। यह मेला जिले में होने वाले धार्मिक एवं सांस्कृतिक मेला आयोजनों में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है, इसीलिए आम बोलचाल में इसे मोटा मेला कहा जाता है।
ग्राम देवीगढ़ स्थित उक्त देवी स्थल किसी समय गहन वनों से आच्छादित अत्यन्त दुर्गम इलाकों में एक रहा है। समय के साथ साथ इस क्षेत्र में वनों का विनाश होने लगा, ओर मानव बस्तियां भी विकसित हुई, किन्तु पर्यावरणीय परिवर्तन के दौर में भी इस स्थान का धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व बरकरार बना हुआ है, और मंदिर में परंपरागत रूप से की जाने वाली पूजा अर्चना एवं अनुष्ठान का क्रम भी कमोबेश अब तक जारी है। देवी प्रतिमा की पूजा प्राचीन काल से ही जनजातीय समुदाय द्वारा की जाती रही है।
प्राचीन काल में गहन वनों से पटे हुए इस दुर्गम पहाड़ी क्षेत्र में हिंसक पशुओं का खतरा हमेशा मंडराता रहता था, ऐसे में आम लोगों का वहां पहुंचना बड़ा मुश्किल था, किंतु वक्त के उस विकराल कालखंड में भी इस स्थान पर तांत्रिक साधक अपनी साधना को आयाम देते थे, और तंत्र साधना के माध्यम से आध्यात्मिक ऊर्जा प्राप्त करने के उद्देश्य से यहां साधना किया करते थे। तंत्र क्रिया के लिए विख्यात उक्त मंदिर चमत्कारों के रूप में भी जाना जाता है। मंदिर से लंबे समय से जुड़े जनजातीय समुदाय के साधक इस बात की पुष्टि करते हैं, कि अमावस्या और पूर्णिमा की रात्रि में यहां विचित्र अनुभूतियां होती है। मंदिर से लंबे समय से जुड़े एक साधक के अनुसार यहां संध्या काल में नगाड़े बजने की आवाज सुनी गई, जबकि एक सेवादार के अनुसार उन्हें देवी कृपा की प्रत्यक्ष अनुभूति उस समय हुई जब जीवन में विषम परिस्थितियों में आत्म निवेदन से समस्या का समाधान हुआ। केवल यही नहीं बल्कि देवी का श्राप बस्ती के उजड़ने की वजह भी बना। कहा जाता है कि ग्राम देवीगढ़ प्राचीन काल में कुलंबी (पाटीदार) समुदाय की सामुहिक बस्ती रहा, किंतु माताजी के श्राप के कारण पाटीदार समुदाय की बस्ती तहस नहस हो गई। देवी चमत्कार का एक अन्य प्रत्यक्ष प्रमाण तब देखने में आया जब अस्सी के दशक में पड़े सूखे के दौरान देवीगढ़ में बहने वाली पद्मावती नदी सूख गई, ऐसी स्थिति में जिला प्रशासन द्वारा मेला निरस्त कर दिया गया, किंतु अगले ही दिन नदी में जल प्रवाहित होने लगा, जिसे देखते हुए जिला प्रशासन द्वारा मेला स्थगित किए जाने संबंधी अपना ही आदेश निरस्त कर दिया गया।
मंदिर के समीप पहाड़ी पर प्राकृतिक रूप से निर्मित एक गुफा भी है, जिसे सिंह का आवास माना जाता है। जनजातीय समुदाय के उम्रदराज लोगों के अनुसार उक्त पहाड़ी क्षेत्र में शेर सहित अन्य अनेक जंगली जानवरों का भी आवास रहा है। क्षेत्र के ग्रामीण जन बताते हैं कि अस्सी के दशक तक यहां शेरों को देखा भी जाता रहा, किंतु वनों के विनाश ने इन हिंसक पशुओं को भी पलायन हेतु मजबूर कर दिया।
प्राचीन काल में यातायात के साधनों के अभाव तथा दुर्गम ओर असुरक्षित क्षेत्र होने की वजह से यहां पहुंचना मुश्किल भरा होता था, ऐसे स्थान पर तत्कालीन राजवंश द्वारा मेले की शुरुआत की गई थी, ताकि वर्ष में एक बार ही सही आम व्यक्ति ऐसे धार्मिक एवं आध्यात्मिक महत्व के स्थान पर सपरिवार पहुंच कर धर्म लाभ अर्जित करते हुए, मनोरंजन का उद्देश्य भी पूराकर सके। देशी रियासतों द्वारा परिपोषित यह मेला रियासतों का अस्तित्व समाप्त हो जाने और देश की आजादी के बाद स्थानीय ग्राम पंचायत द्वारा आयोजित किया जाता है।
मेले के अवसर पर मेला समिति ओर ग्राम पंचायत देवीगढ़ द्वारा जहा दर्शनार्थियों एवं दुकानदारों की सुविधाओं के मद्देनजर व्यापक रूप से व्यवस्थाएं की जाती है, वहीं सुरक्षात्मक दृष्टि से पुलिस बल की भी तैनाती रहती है, किंतु प्रशासनिक उपेक्षा के कारण एक तरफ जहां मेला स्थल पर अतिक्रमण बढ़ता जा रहा है, और मेला स्थल संकुचित होता जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ मेला अधिकारी की नियुक्ति के अभाव में सुव्यवस्थित रूप से मेले का संचालन भी नहीं हो पाता है, साथ ही मेले के दौरान किसी तरह की अप्रिय स्थिति निर्मित होने पर कानून व्यवस्था बनाए रखने हेतु दिक्कत होंने का अंदेशा भी बना रहता है।
डॉ. उमेश चन्द्र शर्मा
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. उमेश चंद्र शर्मा

