सामाजिक समरसता की अनूठी मिसाल अरण्य षष्ठी की ‘बाटो’ प्रथा, परंपरा और आधुनिकता के बीच आज भी जीवंत
मेदिनीपुर, 21 जून (हि. स.)। ज्येष्ठ महीने के शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाने वाला अरण्य षष्ठी का पर्व केवल 'जमाई षष्ठी' (दामाद सत्कार) तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह बंगाल के लोक-जीवन, प्रकृति प्रेम और मातृ-शक्ति के गहरे अंतर्संबंधों को भी दर्शाता है। राढ़ क्षेत्रों -पुरुलिया, झाड़ग्राम, बांकुड़ा, मेदिनीपुर में इस अवसर पर माताएं अपने बच्चों के मंगल, दीर्घायु और निरोगी जीवन की कामना करते हुए सदियों पुरानी ‘बाटो’ प्रथा का पालन पूरी निष्ठा से करती हैं। आधुनिकता के इस दौर में भी यह लोक-परंपरा शहरी तड़क-भड़क से दूर अपनी जड़ों को मजबूत किए हुए है।
संस्कृति विशेषज्ञों के अनुसार, 'अरण्य षष्ठी' का मूल स्वरूप प्रकृति की पूजा और संतान संरक्षण से जुड़ा है। इस दिन माताएं अरण्य (वन) की अधिष्ठात्री देवी षष्ठी की पूजा करती हैं। पूजा में उपयोग होने वाले उपकरण और सामग्रियां सीधे तौर पर ग्रामीण अर्थव्यवस्था और प्रकृति से जुड़े हैं। परंपरा के तहत नवजात या छोटे बच्चों की माताएं विशेष पूजा-अर्चना करती हैं। इसके लिए ताल (ताड़) के पत्तों से बने छोटे झोलेनुमा पात्र (टुकुई) और छोटे हाथ-पंखों का उपयोग किया जाता है। मान्यता के अनुसार, पुत्र के लिए आठ और पुत्री के लिए छह टुकुई तथा पंखों की आवश्यकता होती है। इन पात्रों में आम, लीची, जामुन जैसे सात प्रकार के मौसमी फल, मिठाई, दही और भीगे हुए चने भरकर ‘बाटो’ तैयार किया जाता है, जो इस बात का प्रतीक है कि मनुष्य का जीवन प्रकृति के उपहारों से ही फलता-फूलता है।
‘बाटो’ प्रथा की सबसे सुंदर विशेषता इसका सामाजिक पहलू है। पूजा के दौरान इन बाटो को लेकर माताएं गांव के सामूहिक षष्ठी स्थल (आमतौर पर बरगद या पीपल के पेड़ के नीचे) पर पहुंचती हैं। जिस बच्चे के मंगल की कामना की जाती है, उसे वहां विधि-विधान से स्पर्श कराकर पूजा की जाती है। एक बाटो अपने बच्चे के लिए रखा जाता है, जबकि शेष बाटो उन माताओं को आदरपूर्वक दान दिया जाता है जिनके बच्चे जीवित और स्वस्थ हैं। समाजशास्त्रियों का मानना है कि यह प्रथा ग्रामीण बंगाल में आपसी भाईचारे, एकजुटता और सामूहिक मातृत्व की भावना को सुदृढ़ करती है, जहां हर बच्चा पूरे समाज की साझी संपत्ति मानी जाती है।
संयुक्त परिवारों और दूर रहने वाले बच्चों के लिए भी इस पूजा में विशेष प्रावधान हैं। कई परिवारों में घर के अन्य बच्चों के नाम पर भी अलग-अलग बाटो चढ़ाए जाते हैं। पूजा के बाद बच्चों के माथे पर षष्ठी देवी का पीला तिलक लगाकर उनके नाम का बाटो दिया जाता है, जिसे वे स्वयं ग्रहण करते हैं। यदि कोई संतान रोजगार या शिक्षा के सिलसिले में बाहर (प्रवास पर) हो, तो उसके हिस्से का बाटो जल में अर्पित करने की परंपरा है। माना जाता है कि जल के माध्यम से मां की दुआएं और आशीर्वाद सुदूर बैठे बच्चे तक पहुंचते हैं।
समय के साथ इस परंपरा के बाह्य स्वरूप में बदलाव जरूर आया है। कुटीर उद्योग के ह्रास और आधुनिक बाजारवाद के कारण तालपत्र से बने पारंपरिक टुकुई और हाथ पंखों की उपलब्धता कम हुई है, जिनकी जगह अब कुछ क्षेत्रों में प्लास्टिक की रंग-बिरंगी टोकरियों और कृत्रिम पंखों ने ले ली है। कई जगह कुम्हारों द्वारा बनाए गए मिट्टी के छोटे पात्रों का भी उपयोग होने लगा है। बावजूद इसके, अनुष्ठान की मूल आत्मा और श्रद्धा रत्ती भर भी कम नहीं हुई है।
लोक-मान्यता है कि अरण्य षष्ठी के दिन बाटो अर्पित कर बच्चों के माथे पर तिलक न लगाने पर वर्षभर किसी अन्य षष्ठी पूजा (जैसे शीतल षष्ठी या दुर्गा षष्ठी) में यह अनुष्ठान नहीं किया जा सकता। यही कारण है कि महानगरीय संस्कृति के प्रभाव के बावजूद लोग इस प्राचीन लोक-परंपरा को आज भी पूरी पवित्रता से संजोए हुए हैं।
शनिवार को इसी परंपरा का निर्वहन करते हुए पुरुलिया और बांकुड़ा के कई गांवों की सैकड़ों महिलाएं पारंपरिक परिधानों में, माथे पर सिंदूर लगाए पूजा सामग्री के साथ षष्ठी स्थल पर एकत्र हुईं। महिलाओं ने बताया कि रूप-रंग और साधन भले बदल रहे हों, लेकिन वे आज भी अपनी दादी-नानी के जमाने के रीति-रिवाजों के अनुसार ही अपने बच्चों के सुख-समृद्धि और दीर्घायु की कामना के लिए यह व्रत करती हैं। यह पर्व दिखाता है कि बंगाल की सामाजिक और सांस्कृतिक चेतना अपनी लोक-परंपराओं में कितनी गहराई से रची-बसी है।
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हिन्दुस्थान समाचार / अभिमन्यु गुप्ता

