आगरा - चंबल नदी के रेत से लेकर नदी की धारा तक कछुआ नवजातोंं की साँसों का सफ़र
चंबल के किनारे रेत के घोसलों में कछुओं के अंडों से नवजातों का निकलना शुरू
हेचिंग के बाद नदी में छोड़े गए नन्हे कछुओं से बढेगा संकटग्रस्त कछुआ प्रजातियों का कुनबा
आगरा, 11 मई (हि.स.)। नेशनल चंबल सेंचुरी के अंतर्गत उत्तर प्रदेश के आगरा जनपद में चंबल नदी के किनारे बसे बाह, पिनाहट, नदगंवा क्षेत्र में कछुओं की कई प्रमुख और विलुप्त हो रही प्रजातियां के अंडों को संरक्षित (नेस्टिंग)करने के बाद अंडों से कछुआ शिशुओं के बाहर निकलने (हेचिंग )का क्रम शुरू हो गया है। इस प्रक्रिया के बाद चंबल नदी में कछुओं के बेड़े में एक अहम इजाफा होने की बड़ी संभावना है।
हेचिंग के बाद चंबल नदी में छोड़े जा रहे हैं कछुओं के नवजात शिशु
टीएसए( टर्टल सर्वाईवल एलाइंस) संस्था एवं वन विभाग की देखरेख और संरक्षण में मादा कछुओं द्वारा फरवरी से मार्च माह तक अंडे दिए जाने और उनकी नेस्टिंग के बाद उनके अंडों से नवजात शिशुओं के बाहर निकलने का सिलसिला विगत दो दिनों से शुरू हो चुका है। इन शिशुओं को बड़ी सावधानी से उनके प्राकृतिक निवास चंबल नदी में छोड़ा गया है, जिनकी गतिविधियों पर टी एस ए और वन विभाग द्वारा सतत दृष्टि रखी जा रही है।
चंबल सेंचुअरी के अंतर्गत सम्मलित है यह क्षेत्र
चंबल सेंचुरी के अंतर्गत चंबल नदी के किनारे मध्य प्रदेश का धौलपुर जनपद,आगरा का बाह क्षेत्र और जनपद इटावा का क्षेत्र सम्मिलित है। यह क्षेत्र घड़ियालों, मगरमच्छों, डॉल्फिन और कछुओं की महत्वपूर्ण और विलुप्त हो रही प्रजातियों के संरक्षण का प्रमुख केंद्र बिंदु है।
जहां दुनिया भर से कछुओं की कई प्रजाति विलुप्त हो गई हैं तो चंबल नदी में वो प्रजातियां भी पाई जा रही हैं। उनका संरक्षण किया जा रहा है। यह क्षेत्र घड़ियालों, मगरमच्छों, कछुओं और डालफिन मछलियों के संरक्षण के लिए भी पूरे देश में जाना जाता है।
चंबल नदी कछुओं की नौ प्रमुख प्रजातियां का है प्राकृतिक निवास स्थान
यदि हम केवल कछुओं की बात करें तो मिली जानकारी के अनुसार भारत में कछुओं की करीब 29 प्रजातियां पाई जाती हैं जिनमें से 9 दुर्लभ प्रजाति चंबल नदी में देखने को मिलती हैं। कछुओं की इन प्रजातियां का संरक्षण चंबल सेंचुरी में हो रहा है। चंबल सेंचुरी के फॉरेस्ट रेंजर कुलदीप सहाय पंकज ने सोमवार को बताया कि चंबल नदी में कछुओं की प्रमुख प्रजाति जैसे सीम, साल, बटागुर, पचपेड़ा, कटहेवा,घोंड, इंडियन स्टार, सुंदरी, मोरपंखी,ढोर, एवं काली ढोर, आदि प्रजातियां पाई जाती हैं। कछुआ ऐसा जलीय जीव है जो पानी की गंदगी को साफ करता है।
नेस्टिंग के बाद अब हैचिंग शुरू
चंबल नदी सेंचुरी क्षेत्र में कछुआ प्रजातियों की नेस्टिंग फरवरी से अप्रैल माह तक की गई थी और अब नन्हे बच्चों की हैचिंग हो रही है। कछुओं के बचाव के लिए लगाये गये नेस्टों से आगरा के चंबल सेंचुरी क्षेत्र में अब तक करीब 150 अंडों से हेचिंग हुई, अंडों से निकले इन कछुआ नवजात शिशुओं को चंबल नदी में छोड़ दिया गया। मार्च और अप्रैल माह में कछुओं के अंडों की नेस्टिंग नदी के किनारे सेंडिंग एरिया में की गई थी , हेचिंग का यह क्रम अभी कुछ दिन जारी रहेगा। करीब 500 मादा कछुओं द्वारा अंडे दिए गए हैं जिनकी हेचिंग होगी। अनुमानत: एक मादा कछुआ द्वारा 20 से लेकर 30 तक अंडे दिए जाते हैं।
चंबल सेंचुरी के इन स्थानों पर होती है नेस्टिंग और हेचिंग
मध्य प्रदेश के धौलपुर जनपद में चंबल नदी के किनारे 'सेंड प्लेसेज' के अलावा उत्तर प्रदेश में आगरा में बाह /जैतपुर के चम्बल किनारे नदगवां घाट एवं इटावा के गढायता मैं कछुओं की विभिन्न प्रजातियों के अंडों की संरक्षण और हैकिंग के बाद नदी में छोड़े जाने का काम टी एस ए और वन विभाग द्वारा बड़ी सावधानी और सुरक्षात्मक उपायों के साथ किया जाता है।
नेस्टिंग और हैकिंग के दौरान क्या हैं खतरे और चुनौतियां
चंबल नदी के किनारे का क्षेत्र चोरी छुपे खनन प्रभावित रहता है,यहां से स्थानीय लोग चोरी चुपके ट्रैक्टर ट्रालियों में चंबल सेंड को निर्माण कार्यों के लिए ले जाते हैं। इस दौरान चंबल नदी के किनारे सुरक्षित किए गए कछुओं के अंडे नष्ट हो जाते हैं। जंगली जानवरों,पक्षियों से भी अंडों को बड़ा खतरा बना रहता है इसलिए टी एस ए और वन विभाग द्वारा इन अंडों को एक स्थान पर एकत्रित कर चारों तरफ से जाली लगाकर उनका संरक्षित करने का महत्वपूर्ण काम होता है। सामान्य तौर पर मादा कछुआ के अंडे देने का समय फरवरी से लेकर अप्रैल तक चलता है और मई माह से अंडो कछुआ के नवजात शिशु निकलना शुरू हो जाते हैं। इस दौरान सबसे बड़ी चुनौती इन अंडों को सुरक्षित रखना और उनकी हेचिंग के बाद नवजात शिशुओं को नदी में छोड़ने का रहता है। नदी में छोड़ने के बाद भी यह संस्थाएं शिशुओं की सुरक्षा को लेकर कुछ दिनों तक उन पर सतत नजर रखती है।
कछुओं के लिए चंबल नदी का यह क्षेत्र क्यों है महत्वपूर्ण
टर्टल सर्वाइवल एजेंसी (टी एस ए )के संपर्क अधिकारी पंकज पारीक ने जानकारी दी कि आगरा से लगे राजस्थान के धौलपुर और उत्तर प्रदेश में आगरा होता हुआ इटावा तक फैला हुआ राष्ट्रीय चंबल अभ्यारण कछुओं की संकटग्रस्त एवं विलुप्त हो रही बटागुर प्रजाति के कछुआ संरक्षण के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण प्राकृतिक निवास है, बटागुर प्रजाति में लाल सिरधारी और तीन धारी वाले कछुआ प्रजाति की संख्या धीरे-धीरे कम हो रही। चंबल क्षेत्र में इंडियन रफ टर्टल सामान्य रूप से अधिक संख्या में पाया जाता है।
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हिन्दुस्थान समाचार / Vivek Upadhyay

