जम्मू-कश्मीर में किताबों के जरिए किया जा रहा था आतंकवादियों का महिमामंडन
-डॉ. मयंक चतुर्वेदी
नई दिल्ली , 05 जुलाई (हि.स.)। जम्मू-कश्मीर में पिछले कुछ वर्षों के दौरान केंद्र की मोदी सरकार की सख्ती के परिणामस्वरूप आतंकवाद और अलगाववाद के खिलाफ सुरक्षा एजेंसियों ने लगातार बड़ी सफलताएं हासिल की हैं। सीमापार से होने वाली घुसपैठ में कमी आई है, आतंकवादी नेटवर्क कमजोर हुए हैं, अलगाववादी संगठनों की आर्थिक गतिविधियों पर शिकंजा कसा गया है और कई संगठनों पर प्रतिबंध लगाए गए हैं, लेकिन इसी बीच जम्मू-कश्मीर के सरकारी स्कूलों की लाइब्रेरी के लिए खरीदी गई दो किताबों को लेकर यूएपीए के तहत प्राथमिकी दर्ज की गई है।
दरअसल, इन किताबों में मुंबई हमलों के मास्टर माइंड आतंकी हाफिज सईद और अलगाववादी नेता मकबूल भट को महान हस्तियां बताया गया है। पुलिस की काउंटर इंटेलिजेंस विंग ने अब प्राथमिकी दर्ज करके छापेमारी शुरू कर दी है। दूसरी ओर जम्मू-कश्मीर सरकार ने सरकारी स्कूलों में वितरित इन पुस्तकों पर तत्काल प्रतिबंध लगाते हुए उन्हें वापस मंगाने के आदेश दिए हैं।
इन पुस्तकों में आतंकवाद और अलगाववाद से जुड़े व्यक्तियों का महिमामंडन करने के साथ ही पाकिस्तान समर्थित शब्दावली का इस्तेमाल किया गया और ऐसे कथन शामिल किए गए जो भारत की संवैधानिक स्थिति के विपरीत हैं। सरकार ने मामले को गंभीर मानते हुए आठ अधिकारियों को निलंबित कर दिया है। एक संविदा कर्मचारी की सेवाएं समाप्त कर दी हैं। लेखक और प्रकाशक को ब्लैकलिस्ट किया है तथा पूरी खरीद और स्वीकृति प्रक्रिया की उच्चस्तरीय जांच शुरू कर दी है। लेकिन इस सब के बीच एक बड़ी चिंता सामने आई है, क्या जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी सोच अब शिक्षा और साहित्य के माध्यम से नई पीढ़ी तक पहुंचने का प्रयास किया जा रहा है?
जेकेपीएफ के प्रयासों से सामने आया मामला
यह मामला उस समय सामने आया जब जम्मू-कश्मीर पीपुल्स फोरम (जेकेपीएफ) ने आरोप लगाया कि वर्ष 2025-26 की समग्र शिक्षा योजना के अंतर्गत सरकारी स्कूलों के पुस्तकालयों में कुछ ऐसी पुस्तकें वितरित की गई हैं, जिनमें अलगाववादी नेताओं और आतंकवाद से जुड़े व्यक्तियों को सकारात्मक रूप में प्रस्तुत किया गया है। इन पुस्तकों में सैयद अली शाह गिलानी, मसरत आलम, मीरवाइज उमर फारूक और अन्य अलगाववादी नेताओं के विचारों को प्रमुखता दी गई है। कुछ स्थानों पर आतंकवादियों तथा पत्थरबाजों को भी ऐसे रूप में प्रस्तुत किया गया है, जिससे बच्चों के मन पर गलत प्रभाव पड़ सकता है।
किन किताबों पर लगा प्रतिबंध
सरकारी जांच के दौरान विशेषज्ञ समिति द्वारा चयनित कुल 463 पुस्तकों की समीक्षा की गई। इनमें दो पुस्तकें विवाद के केंद्र में आईं हैं, Personalities and Legends of J&K और Great Personalities of Jammu and Kashmir।
सरकारी आदेश के अनुसार पहली पुस्तक की 123 प्रतियां जम्मू, रामबन और उधमपुर जिलों के सरकारी विद्यालयों तक पहुंची थीं, जबकि दूसरी पुस्तक की 128 प्रतियां जम्मू और बारामुला जिलों में वितरित की गई थीं। अब दोनों पुस्तकों की सभी प्रतियां तत्काल प्रभाव से वापस मंगाई जा रही हैं।
सबसे बड़ा विवाद किस बात पर?
विवाद का सबसे बड़ा कारण पुस्तक में मकबूल भट के बारे में लिखी गई सामग्री बनी। इस संबंध में सामने आई “जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र” की रिपोर्ट के अनुसार पुस्तक में उनके अध्याय का शीर्षक शहीद मकबूल भट्ट रखा गया है। इतना ही नहीं, आगे उन्हें शहीद-ए-आज़म, आधुनिक कश्मीर का महान क्रांतिकारी और कश्मीर का राष्ट्रपिता जैसे विशेषणों से संबोधित किए जाने का आरोप है।
रिपोर्ट का दावा है कि पुस्तक स्वयं उनके विरुद्ध चली न्यायिक प्रक्रिया और सजा का उल्लेख करती है, लेकिन इसके बावजूद उन्हें सम्मानजनक शब्दों में प्रस्तुत करती है। विपक्ष के नेता सुनिल शर्मा का कहना है कि विद्यालयी स्तर की पुस्तक में किसी दोषसिद्ध व्यक्ति को इस प्रकार प्रस्तुत करना बच्चों के सामने न्यायिक व्यवस्था और इतिहास की भिन्न तस्वीर पेश कर सकता है। पुस्तक में यह भी उल्लेख है कि मकबूल भट्ट की फांसी के बाद कश्मीर में सशस्त्र क्रांति का दौर शुरू हुआ और उनका मिशन अभी अधूरा है, जोकि अत्याधिक आपत्तिजनक है।
उल्लेखनीय है कि मकबूल भट वही व्यक्ति हैं जिसे आतंकवादी घटनाओं एवं कई हत्याओं के मामले में दोषी ठहराया गया था। जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) का संस्थापक रहा है। उसे एक सीआईडी अधिकारी की हत्या, विमान अपहरण की घटनाओं से जुड़े आरोप तथा बाद में भारतीय राजनयिक रविंद्र म्हात्रे के अपहरण और हत्या के घटनाक्रम से जुड़ी परिस्थितियों के बाद फांसी दी गई थी।
किन-किन चेहरों को मिला प्रमुख स्थान?
विवादित पुस्तकों में जिन व्यक्तियों पर अलग-अलग अध्याय होने का दावा किया गया है, उनमें प्रमुख नाम हैं-मकबूल भट्ट, सैयद अली शाह गिलानी, मसरत आलम, शब्बीर शाह, मीरवाइज उमर फारूक, जबकि ये सभी किसी न किसी रूप में अलगाववादी राजनीति या हुर्रियत कॉन्फ्रेंस से जुड़े रहे हैं। पुस्तक में सैयद अली शाह गिलानी के विचारों को विस्तार से प्रस्तुत किया गया है। अलगाववादी नेताओं सैयद अली शाह गिलानी, शब्बीर शाह, मीरवाइज उमर फारूक को प्रभावशाली व्यक्तित्व बताया है।
ऐसे में जम्मू कश्मीर अध्ययन केंद्र का मानना है कि पुस्तक में उनके राजनीतिक दृष्टिकोण का उल्लेख तो है, लेकिन उनके नेतृत्व वाले अलगाववादी आंदोलन, पाकिस्तान समर्थक रुख और भारत की संवैधानिक व्यवस्था के विरोध से जुड़े संदर्भ नहीं दिए गए। स्वभाविक है कि इन पुस्तकों के माध्यम से सिर्फ एक तरफा विचार प्रस्तुत किए गए जोकि अलगाववादियों के पक्ष में हैं।
पुस्तक में मसरत आलम का भी विस्तृत उल्लेख किया गया है। कई कथनों को उद्धृत किया गया है। साथ ही उनके जीवन का परिचय अपेक्षाकृत सहानुभूतिपूर्ण शैली में लिखा गया है। जबकि उनके विरुद्ध अनेक आपराधिक मामले दर्ज रहे हैं, उन्हें कई बार हिरासत में लिया गया और बाद में उनके संगठन पर भी कार्रवाई हुई। इसी प्रकार शब्बीर शाह और मीरवाइज उमर फारूक पर लिखे अध्याय भी विवादों में हैं। दोनों नेताओं को मुख्यतः अलगाववादी आंदोलन के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत किया गया, जबकि उनसे जुड़े विवाद, जांच और कानूनी कार्रवाइयों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।
हुर्रियत का पूरा संदर्भ क्यों महत्वपूर्ण है?
रिपोर्ट में एक पूरा अध्याय ऑल पार्टीज हुर्रियत कॉन्फ्रेंस (APHC) को समर्पित है। पुस्तक में जिन अधिकांश व्यक्तियों का उल्लेख है, वे किसी न किसी समय इसी मंच से जुड़े रहे हैं। हुर्रियत के घोषित उद्देश्यों में आत्मनिर्णय, कश्मीर को विवादित क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत करना और भारत की संवैधानिक स्थिति को चुनौती देना शामिल रहा है।
'आईओके' और 'आईएचके' शब्दों पर भी विवाद
विवाद केवल व्यक्तियों के महिमामंडन तक सीमित नहीं है। “जम्मू-कश्मीर अध्ययन केंद्र” की रिपोर्ट के अनुसार पुस्तक में कई स्थानों पर जम्मू-कश्मीर के लिए इंडियन आकूपाइड (आईओके) और इंडियन हेल्ड कश्मीर (आईएचके) जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। दरअसल, ये वही शब्द हैं जिनका उपयोग पाकिस्तान लंबे समय से अपने आधिकारिक प्रचार में करता रहा है। भारत का आधिकारिक और संवैधानिक दृष्टिकोण यह है कि जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है।
भारत को 'दमनकारी राज्य' बताने का आरोप
पुस्तक के कुछ हिस्सों में भारत को कश्मीर के संदर्भ में कब्जा करने वाला और दमनकारी राज्य बताया गया है। पुस्तक में भारत के शासन की तुलना औपनिवेशिक शासन से की गई है और लोकतांत्रिक मूल्यों तथा मानवाधिकारों के प्रति भारत की प्रतिबद्धता पर भी प्रश्न उठाए गए हैं।
लल्लेश्वरी के बहाने ब्राह्मणों को किया गया टार्गेट
यहां विवाद अकेले राजनीति सोच तक सीमित नहीं है। पुस्तक में कश्मीर की महान संत और शिवभक्त लल्लेश्वरी (ललद्यद) के संबंध में भी ऐसे दावे किए गए हैं जिनका कई इतिहासकारों ने विरोध किया है। पुस्तक में लिखा गया कि लल्लेश्वरी ब्राह्मणों से असंतुष्ट थीं और बाद में उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया। जबकि ऐसा दावा ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं है। कश्मीर की साझा सांस्कृतिक विरासत में लल्लेश्वरी को हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदाय समान श्रद्धा से याद करते हैं। मुस्लिम समाज उन्हें लल आरिफा कहता है, जबकि हिंदू समाज उन्हें संत कवयित्री और शिवभक्त के रूप में पूजता है।
इतिहास या वैचारिक नैरेटिव?
सबसे गंभीर बहस इस बात पर है कि क्या यह सामग्री इतिहास प्रस्तुत कर रही थी या किसी विशेष वैचारिक दृष्टिकोण को स्थापित करने का प्रयास कर रही थी। यानी कि एक तरह से अकादमिक जिहाद फैला रही है! पूरा विवाद अब इस प्रश्न पर आकर टिक गया है कि आखिर ऐसी सामग्री सरकारी प्रणाली से होकर विद्यालयों तक पहुंची कैसे?
बताया गया है कि इन पुस्तकों को एक विशेषज्ञ समिति ने आयु-उपयुक्त मानते हुए अनुशंसित किया था। इसके बाद समग्र शिक्षा योजना के तहत सार्वजनिक धन से इनकी खरीद की गई और फिर सरकारी विद्यालयों के पुस्तकालयों में भेजा गया। यानी यह किसी शिक्षक या विद्यालय का व्यक्तिगत निर्णय नहीं था, बल्कि पूरी प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरने के बाद पुस्तकें बच्चों तक पहुंचीं।
किताबें या वैचारिक दस्तावेज?
पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है। क्या ये पुस्तकें केवल इतिहास और जीवनी प्रस्तुत कर रही थीं? या फिर उनमें एक ऐसा राजनीतिक नैरेटिव शामिल था, जिसे विद्यालयी छात्रों तक पहुंचाया जा रहा था? यही प्रश्न अब सरकारी जांच का सबसे बड़ा विषय है। आठ अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित किया गया, एक संविदा कर्मचारी की सेवाएं समाप्त कर दी गईं। पुस्तकों के लेखक और प्रकाशक को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया।
30 दिन में मांगी गई रिपोर्ट
जांच की जिम्मेदारी अतिरिक्त मुख्य सचिव (वित्त) अश्विनी कुमार को सौंपी गई है। उन्हें निर्देश दिए गए हैं कि वे 30 दिनों के भीतर विस्तृत रिपोर्ट प्रस्तुत करें। इस संबंध में स्कूल शिक्षा विभाग के आयुक्त सचिव राम निवास शर्मा का कहना है, “उक्त किताबों के चयन, खरीदारी और वितरण के हर स्तर की जांच हो रही है। यह देखा जाएगा कि किस-किस अधिकारी की क्या भूमिका थी और उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जाएगी।”
अलगाववाद का बदलता चेहरा
सुरक्षा विशेषज्ञ लंबे समय से कहते रहे हैं कि आधुनिक समय में आज वैचारिक प्रभाव, डिजिटल माध्यम, सोशल मीडिया, सांस्कृतिक विमर्श और शिक्षा भी संघर्ष के महत्वपूर्ण क्षेत्र बन चुके हैं। यदि कोई संगठन प्रत्यक्ष हिंसा में सफल नहीं होता, तो वह समाज की नई पीढ़ी की सोच को प्रभावित करने का प्रयास कर सकता है, इसलिए विद्यालयों में पढ़ाई जाने वाली सामग्री की निष्पक्षता और तथ्यपरकता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
जम्मू कश्मीर अध्ययन केन्द्र की ओर से कहा गया है कि स्कूल पुस्तकालयों में पढ़ने के लिए भेजी गई ‘पर्सनैलिटीज एंड लीजेंड्स ऑफ जेएंडके’ और ‘ग्रेट पर्सनैलिटीज ऑफ जम्मू एंड कश्मीर’ पुस्तक में आतंकवादियों, अलगाववादियों और देश विरोधी तत्वों को शामिल किए जाने का वह विरोध करता है और दोषियों के विरुद्ध कड़ी कानूनी कार्रवाई करने की सरकार से मांग करता है।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की प्रतिक्रिया
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने प्रारंभिक प्रतिक्रिया में कहा कि उन्होंने विवादित पुस्तक अभी तक नहीं पढ़ी है और न ही पहले उसके बारे में जानकारी थी। उन्होंने कहा कि पूरी सामग्री देखने और तथ्यों का अध्ययन करने के बाद ही वह कोई अंतिम टिप्पणी करेंगे।
एस.पी. वैद ने जताई गंभीर चिंता
जम्मू-कश्मीर के पूर्व पुलिस महानिदेशक एस.पी. वैद, जिनका नाम भी कथित रूप से पुस्तक में शामिल था, ने इस पूरे घटनाक्रम पर कड़ी प्रतिक्रिया व्यक्त की। उन्होंने कहा कि ऐसी पुस्तक में अपना नाम शामिल होना उनके लिए सम्मान नहीं बल्कि चिंता का विषय है। उनके अनुसार यदि विद्यालयों में ऐसी सामग्री पहुंचती है जिसमें अलगाववाद, आतंकवाद और भारत विरोधी सोच को वैचारिक आधार मिलता हो, तो यह आने वाली पीढ़ी के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। वैद का मानना है, “आतंकवाद सिर्फ हथियारों से नहीं, बल्कि विचारों से भी फैलता है। यदि बच्चों को गलत ऐतिहासिक और राजनीतिक संदर्भ दिए जाएं तो उसका प्रभाव वर्षों तक बना रह सकता है।”
विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा ने इस पूरे मामले को विद्यालयों में राष्ट्रविरोधी सोच फैलाने की कोशिश बताया। उन्होंने मांग की कि केवल अधिकारियों के निलंबन से काम नहीं चलेगा, बल्कि पूरी प्रक्रिया की निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। यदि सार्वजनिक धन से खरीदी गई पुस्तकों में ऐसी सामग्री पहुंच सकती है तो यह प्रशासनिक गलती होने के साथ ही संस्थागत विफलता का संकेत भी है।
जेकेपीएफ रिपोर्ट ने किन सवालों को उठाया?
इस विवाद को सामने लाने वाली जम्मू-कश्मीर पीपुल्स फोरम (जेकेपीएफ) ने अपनी रिपोर्ट में कई गंभीर प्रश्न उठाए हैं। रिपोर्ट के अनुसार, पुस्तक किसने लिखवाई? विशेषज्ञ समिति ने किन मानकों पर इसे स्वीकृति दी? क्या समिति ने पुस्तक की पूरी सामग्री पढ़ी थी? लेखकों और प्रकाशक को कितना भुगतान किया गया? कुल कितनी प्रतियां खरीदी गईं? किन-किन विद्यालयों में इन्हें भेजा गया? सार्वजनिक धन का कुल कितना उपयोग हुआ? रिपोर्ट यह भी मांग करती है कि समग्र शिक्षा योजना के अंतर्गत खरीदी गई अन्य पुस्तकों की भी स्वतंत्र समीक्षा कराई जाए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कहीं और ऐसी सामग्री शामिल तो नहीं है।
उल्लेखनीय है कि समग्र शिक्षा भारत सरकार की केंद्र प्रायोजित योजना है, जिसके माध्यम से प्री-प्राइमरी से लेकर कक्षा 12 तक की शिक्षा के लिए राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को वित्तीय सहायता दी जाती है। जम्मू-कश्मीर जैसे केंद्रशासित प्रदेश में केंद्र सरकार की हिस्सेदारी विशेष रूप से अधिक रहती है।
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हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. मयंक चतुर्वेदी

