इतिहास के आईने से: नैनीताल में 171 वर्ष पहले आज ही के दिन गिरे थे डेढ़ पाउंड तक के ओले
नैनीताल, 11 मई (हि.स.)। आज के दौर में ‘ग्लोबलवार्मिंग’ के प्रभाव में ‘एक्सट्रीम ईवेंट’ यानी कभी अतिवृष्टि, कभी अत्यधिक सूखा, कभी अत्यधिक गर्मी और कभी अत्यधिक सर्दी का मौसम देखा जाता है, लेकिन इतिहास में भी ऐसी घटनाएं रिकॉर्ड होती रही हैं।
नैनीताल में 18 सितंबर 1880 की घटना बहुचर्चित है, जब केवल 40 घंटे में हुई 35 इंच यानी 889 मिमी बारिश के बाद आठ सेकेण्ड के भीतर नगर में वर्तमान रोप-वे के पास ऐसा विनाशकारी भूस्खलन हुआ कि 151 लोग (108 भारतीय और 43 ब्रितानी नागरिक), उस जमाने का नगर का सबसे विशाल ‘विक्टोरिया होटल और मि. बेल के बिसातखाने की दुकान व तत्कालीन बोट हाउस क्लब के पास स्थित तत्कालीन नैनादेवी मन्दिर जमींदोज हो गऐ थे और नैनीताल का भौगौलिक स्वरूप बिगड़ गया था।
वहीं वर्ष 1856 में प्रकाशित बॉम्बे ज्योग्राफिकल सोसाइटी के प्रकाशन के अनुसार आज से ठीक 171 वर्ष पूर्व 11 मई 1855 का दिन भी नैनीताल के इतिहास में एक ऐसी प्राकृतिक आपदा के रूप में दर्ज है, जिसने मौसम विज्ञानियों और स्थानीय लोगों को स्तब्ध कर दिया था। उस दिन नैनीताल में ऐसी भीषण ओलावृष्टि हुई थी, जिसे आकार, वजन और तीव्रता की दृष्टि से दुनिया की सबसे भयावह घटनाओं में गिना जाता है। उस दिन गिरे कुछ ओलों का वजन डेढ़ पाउंड तक बताया गया था और उनकी परिधि 9 से 13 इंच तक मापी गई।
उस समय के विवरण के अनुसार कई दिनों से मौसम में असामान्य परिवर्तन देखा जा रहा था। सुबह शांत और ठंडी थी, जबकि दोपहर अत्यधिक गर्म हो गयी थी। लेकिन 11 मई की शाम उत्तर और उत्तर-पूर्व दिशा से घने बादल उमड़े, बाद में दक्षिण और दक्षिण-पश्चिम से आए बादलों से उनका मेल हुआ। शाम लगभग छह बजे तेज गर्जना और बिजली चमकने के साथ हल्की वर्षा शुरू हुई और देखते ही देखते विशालकाय ओलों की बारिश होने लगी।
प्रकाशन के अनुसार प्रत्यक्षदर्शियों ने उस दृश्य की तुलना “आकाश से अखरोटों से भरे बोरे उड़ेलने” जैसी स्थिति से की थी। यह भी लिखा गया है, शुरुआत में कबूतर के अंडे जितने बड़े ओले गिरे, लेकिन कुछ ही क्षणों में क्रिकेट गेंद से भी बड़े ओलों की बौछार शुरू हो गई। लोग भयभीत होकर सुरक्षित स्थानों की ओर भागने लगे। अंग्रेज अधिकारी इन ओलों को तौलने और नापने में जुट गए। कुछ ओलों का वजन 6 से 10 तोला तक था, जबकि कुछ डेढ़ पाउंड तक भारी पाए गए।
ओलावृष्टि का प्रभाव इतना भयावह था कि पेड़ों की छाल उखड़ गई, बाग-बगीचे तबाह हो गए और घरों की छतों को नुकसान पहुंचा। नैनी झील का दृश्य ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो उस पर तोपों से लगातार गोले दागे जा रहे हों। एक बंदर की मृत्यु हो गई और कई लोग घायल हो गए। पक्षियों और वन्यजीवों को भी भारी क्षति पहुंची थी।
बताया जाता है कि यह घटना इतनी असाधारण थी कि इसकी तुलना 1697 में इंग्लैंड के हर्टफोर्डशायर में हुई ऐतिहासिक ओलावृष्टि से की गई थी। इस घटना का विस्तृत उल्लेख वर्ष 1856 में बॉम्बे ज्योग्राफिकल सोसाइटी के प्रकाशन में किया गया था। नैनीताल में सामान्य रूप से गर्मियों में ओलावृष्टि होती रही है, लेकिन उस समय तक उपलब्ध मौसमीय अभिलेखों में इतने विशाल आकार के ओलों का कोई उल्लेख नहीं है।
हिन्दुस्थान समाचार / डॉ. नवीन चन्द्र जोशी

