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विश्व ऑटिज़्म जागरूकता दिवस: शुरुआती संकेतों की पहचान से बच्चों के विकास को मिलती है नई दिशा

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विश्व ऑटिज़्म जागरूकता दिवस: शुरुआती संकेतों की पहचान से बच्चों के विकास को मिलती है नई दिशा


जयपुर, 02 अप्रैल (हि.स.)। विश्व ऑटिज़्म जागरूकता दिवस प्रतिवर्ष 2 अप्रैल को मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा वर्ष 2007 में स्थापित इस दिवस का उद्देश्य ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम से जुड़े व्यक्तियों के प्रति जागरूकता बढ़ाना और समाज में उनकी स्वीकार्यता सुनिश्चित करना है। यह दिवस न्यूरोडायवर्सिटी को समझने और हर बच्चे की विशिष्ट क्षमताओं के अनुरूप सहयोग उपलब्ध कराने की आवश्यकता को रेखांकित करता है। वहीं, पूरे अप्रैल माह को ऑटिज़्म जागरूकता माह के रूप में मनाया जाता है, जिसमें स्कूल, स्वास्थ्य संस्थान और समुदाय मिलकर समावेशी वातावरण बनाने की दिशा में कार्य करते हैं।

फोर्टिस एस्कॉर्ट्स हॉस्पिटल, जयपुर के एडिशनल डायरेक्टर (पीडियाट्रिक न्यूरोलॉजी) डॉ. शरद शर्मा ने बताया कि समय पर पहचान और शीघ्र हस्तक्षेप ऑटिज़्म से जुड़े बच्चों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि इंडियन जर्नल ऑफ पीडियाट्रिक्स में वर्ष 2021 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार भारत में लगभग हर 68 बच्चों में से 1 बच्चा ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम से प्रभावित होता है, लेकिन कई मामलों में पहचान देर से हो पाती है। यदि शुरुआती संकेतों को समय रहते पहचान लिया जाए तो बच्चों के विकासात्मक परिणामों और जीवन की गुणवत्ता में उल्लेखनीय सुधार संभव है।

बोलने में देरी या सीमित संवाद क्षमता, आंखों से संपर्क कम रखना या नाम पुकारने पर प्रतिक्रिया न देना, सामाजिक गतिविधियों या खेल में कम रुचि, दोहराव वाले व्यवहार जैसे हाथ हिलाना या वस्तुओं को एक पंक्ति में लगाना, दिनचर्या में बदलाव को स्वीकार करने में कठिनाई तथा ध्वनि, रोशनी, स्पर्श या बनावट के प्रति अत्यधिक संवेदनशीलता जैसे संकेत ऑटिज़्म के शुरुआती लक्षण हो सकते हैं।

डॉ. शर्मा के अनुसार ऑटिज़्म के लक्षण आमतौर पर तीन वर्ष की आयु से पहले दिखाई देने लगते हैं। इसका निदान बच्चे के व्यवहार और विकासात्मक पैटर्न के आधार पर किया जाता है। विशेषज्ञों द्वारा स्क्रीनिंग टूल्स और विस्तृत मूल्यांकन के जरिए इसकी पुष्टि की जाती है। समय पर पहचान से हस्तक्षेप और उपचार शीघ्र शुरू किया जा सकता है।

ऑटिज़्म से जुड़े बच्चों के लिए निरंतर और सही सहयोग बेहद जरूरी है। व्यवहारिक, स्पीच और ऑक्यूपेशनल थेरेपी उनके समग्र विकास में अहम भूमिका निभाती हैं। इसके साथ ही, संरचित दिनचर्या और सहायक वातावरण बच्चों के सीखने और अनुकूलन को बेहतर बनाते हैं। अभिभावकों की सक्रिय भागीदारी और केयरगिवर्स का प्रशिक्षण भी उपचार प्रक्रिया को मजबूत बनाता है।

विशेषज्ञों का मानना है कि सही मार्गदर्शन और सहयोग मिलने पर ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम से जुड़े कई बच्चे आगे चलकर आत्मनिर्भर और संतोषजनक जीवन जी सकते हैं। यह दिवस हमें यह संदेश देता है कि ऑटिज़्म के शुरुआती संकेतों की पहचान किसी लेबल के लिए नहीं, बल्कि बच्चों को सही समय पर उचित देखभाल, समझ और अवसर प्रदान करने के लिए बेहद जरूरी है।

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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश