जयपुर में मृत श्वानों के निस्तारण की व्यवस्था पर सवाल, कचरा गाड़ियों में ले जाए जा रहे शव
जयपुर, 24 जून (हि.स.)। राजधानी जयपुर में आवारा श्वानों और बिल्लियों के शवों के निस्तारण की व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं। पशु प्रेमियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का आरोप है कि नगर निगम मृत श्वानों के शवों को सम्मानजनक तरीके से उठाने के बजाय कचरा संग्रहण वाहनों के माध्यम से उनका निस्तारण कर रहा है, जिससे पशु कल्याण और संवेदनशीलता को लेकर गंभीर प्रश्न खड़े हो गए हैं।
जानकारी के अनुसार, घरों में पाले जाने वाले पालतू श्वानों का मामला अलग है, लेकिन सड़क पर रहने वाले बेसहारा श्वानों और बिल्लियों के शव उठाने की जिम्मेदारी नगर निगम ने सफाई व्यवस्था से जुड़े अधिकारियों को दे रखी है। आरोप है कि इन शवों को कचरा उठाने वाली गाड़ियों में डालकर निस्तारित किया जाता है।
पशु कल्याण से जुड़े लोगों का कहना है कि यह केवल सफाई व्यवस्था का विषय नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं, सार्वजनिक स्वास्थ्य और प्रशासनिक जवाबदेही से जुड़ा मुद्दा भी है। उनका कहना है कि शहर में आवारा पशुओं के जीवित रहने की व्यवस्था पर चर्चा होती है, लेकिन उनकी मृत्यु के बाद सम्मानजनक निस्तारण के लिए कोई अलग तंत्र विकसित नहीं किया गया है। जयपुर शहर में आवारा श्वानों की अनुमानित संख्या लगभग एक लाख बताई जाती है। पशु प्रेमियों का सवाल है कि जब नगर निगम बड़े मवेशियों के शव उठाने और निस्तारण के लिए अलग व्यवस्था और टेंडर कर सकता है, तो श्वानों और बिल्लियों के लिए ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई गई।
स्थानीय नागरिकों का कहना है कि कई बार शिकायत के बावजूद मृत पशुओं के शव उठाने में देरी होती है, जिससे आसपास के क्षेत्र में दुर्गंध और स्वच्छता संबंधी समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं।
नगर निगम हर वर्ष गाय सहित अन्य बड़े मवेशियों के शव उठाने के लिए अलग टेंडर जारी करता है। वर्तमान में एक मृत मवेशी के शव को उठाने के लिए निगम ठेकेदार को 745 रुपये का भुगतान करता है। इससे पहले यह राशि 890 रुपये प्रति शव थी। वर्ष 2025 में इस कार्य पर निगम ने लगभग डेढ़ करोड़ रुपये खर्च किए थे।
नगर निगम की उपायुक्त (स्टोर एवं पशु प्रबंधन शाखा) अनिता मित्तल ने बताया कि गाय एवं अन्य मवेशियों के शव उठाने के लिए निगम नियमित रूप से टेंडर जारी करता है, लेकिन श्वानों और बिल्लियों के शवों के लिए कोई अलग टेंडर व्यवस्था नहीं है। यह कार्य संबंधित सफाई तंत्र के माध्यम से कराया जाता है।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने रेबीज संक्रमित, लाइलाज बीमारी से ग्रस्त अथवा अत्यधिक आक्रामक आवारा कुत्तों को निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के तहत इच्छामृत्यु देने की अनुमति दी थी। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि ऐसे पशुओं के अंतिम निस्तारण और अंतिम संस्कार की प्रक्रिया सम्मानजनक और निर्धारित मानकों के अनुरूप होनी चाहिए।
रोग नियंत्रण एवं पशुपालन विभाग के डिप्टी डायरेक्टर तपेश माथुर ने कहा कि पशु कल्याण संस्थाओं की लंबे समय से मांग रही है कि मृत पशुओं के क्रिमीनेशन (अंतिम निस्तारण) के लिए अलग स्थान निर्धारित किए जाएं। उनके अनुसार मृत श्वानों और बिल्लियों के शवों को कचरा वाहनों में ले जाना मानवीय दृष्टिकोण से उचित नहीं माना जा सकता। उन्होंने कहा कि शवों का निस्तारण वैज्ञानिक और सम्मानजनक तरीके से किया जाना चाहिए।
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हिन्दुस्थान समाचार / राजेश

