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एमडीएसयू में राज्य का प्रथम स्वदेशी कंसोर्टियम होगा स्थापित

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एमडीएसयू में राज्य का प्रथम स्वदेशी कंसोर्टियम होगा स्थापित


अजमेर, 18 जून(हि.स.)। महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्वविद्यालय, अजमेर की 82वीं विद्या परिषद बैठक गुरुवार को नालंदा कक्ष, बृहस्पति भवन में कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल की अध्यक्षता में आयोजित हुई। बैठक में विद्यार्थियों, शोधार्थियों एवं युवाओं के भविष्य को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अनुरूप अनेक दूरगामी एवं ऐतिहासिक निर्णय लिए गए। परिषद ने रोजगारोन्मुखी शिक्षा, कौशल विकास, भारतीय ज्ञान परंपरा, स्वदेशी नवाचार, योग, बहुविषयी शोध तथा गुणवत्ता उन्नयन को केंद्र में रखकर विश्वविद्यालय की भावी शैक्षणिक दिशा निर्धारित की।

बैठक का सबसे महत्वपूर्ण निर्णय विश्वविद्यालय में “महर्षि दयानन्द सरस्वती स्वदेशी कंसोर्टियम” की स्थापना को स्वीकृति प्रदान करना रहा। यह कंसोर्टियम स्थानीय उद्योग, उद्यमिता, स्टार्टअप, कौशल विकास, नवाचार, बौद्धिक संपदा, इंटर्नशिप एवं रोजगार सृजन को बढ़ावा देगा। इसके अंतर्गत स्थानीय आवश्यकताओं एवं उद्योगों की मांग के अनुरूप नए स्किल कोर्स विकसित किए जाएंगे। साथ ही स्टार्टअप बूट कैंप, इनोवेशन सेल, प्रशिक्षण कार्यक्रम, उद्यमिता विकास गतिविधियां एवं रोजगार संवर्धन कार्यक्रम संचालित किए जाएंगे। विश्वविद्यालय प्रशासन का मानना है कि यह पहल युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने तथा “वोकल फॉर लोकल” एवं “आत्मनिर्भर भारत” के राष्ट्रीय दृष्टिकोण को साकार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम सिद्ध होगी।

विद्या परिषद ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के अंतर्गत मूल्य आधारित एवं राष्ट्रनिर्माण केंद्रित शिक्षा को बढ़ावा देने का निर्णय भी लिया। परिषद में इस बात पर सहमति व्यक्त की गई कि विद्यार्थियों को राजस्थान के गौरवशाली इतिहास एवं प्रेरक व्यक्तित्वों से परिचित कराने के लिए महाराणा प्रताप, पृथ्वीराज चौहान तथा अन्य महान राष्ट्रनायकों पर आधारित क्रेडिट पाठ्यक्रम विकसित किए जाएंगे। इन पाठ्यक्रमों के माध्यम से युवाओं को राष्ट्रभक्ति, नेतृत्व, त्याग, संघर्ष एवं सांस्कृतिक गौरव की प्रेरणा मिलेगी। साथ ही महर्षि दयानंद सरस्वती का वैदिक दर्शन नामक वैल्यू एडेड कोर्स को भी स्वीकृति प्रदान की गई, जिससे विद्यार्थी भारतीय ज्ञान परंपरा एवं वैदिक चिंतन को समझ सकेंगे।

बैठक में विश्वविद्यालय एवं संबद्ध महाविद्यालयों के मध्य शैक्षणिक सहयोग को सुदृढ़ बनाने के लिए गुणवत्ता संवर्धन निधि स्थापित करने का महत्वपूर्ण निर्णय लिया गया। इस फंड के माध्यम से संबद्ध महाविद्यालयों में शोध गतिविधियों, संगोष्ठियों, नवाचार कार्यक्रमों, शिक्षण गुणवत्ता सुधार, क्षमता निर्माण तथा नेक की तैयारी को प्रोत्साहित किया जाएगा। विश्वविद्यालय पहली बार महाविद्यालयों के गुणवत्ता उन्नयन के लिए एक संरचित अकादमिक एवं सहयोगी व्यवस्था विकसित करने जा रहा है, जिससे उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में व्यापक सुधार की अपेक्षा है।

विद्या परिषद ने विश्वविद्यालय के शैक्षणिक गौरव को नई ऊंचाई देने के उद्देश्य से राष्ट्रीय जीवन, शिक्षा, संस्कृति, समाज सेवा एवं जनकल्याण के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान देने वाले प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों को मानद डॉक्ट्रेट आॅफ लेटर (D.Litt.)” उपाधि प्रदान करने की प्रक्रिया प्रारंभ करने का निर्णय लिया। इसके लिए पृथक नियमावली एवं चयन प्रक्रिया विकसित की जाएगी। विश्वविद्यालय का मानना है कि इससे संस्थान की राष्ट्रीय प्रतिष्ठा और अधिक सुदृढ़ होगी तथा समाज में उत्कृष्ट कार्य करने वाले व्यक्तित्वों को सम्मानित करने की परंपरा विकसित होगी।

स्वास्थ्य एवं भारतीय जीवन मूल्यों को बढ़ावा देने की दिशा में भी महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। परिषद ने विश्वविद्यालय से संबद्ध महाविद्यालयों में योग उप-केंद्र स्थापित करने को स्वीकृति प्रदान की। इन केंद्रों के माध्यम से विद्यार्थियों को योग, स्वास्थ्य प्रबंधन, तनाव नियंत्रण एवं भारतीय जीवन दर्शन से जोड़ने का अवसर मिलेगा। साथ ही एलएप योजना एवं योग प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से प्रशिक्षित युवाओं को रोजगार एवं प्रशिक्षण के नए अवसर उपलब्ध कराए जाएंगे।

विद्यार्थियों को भविष्य की तकनीकी चुनौतियों के लिए तैयार करने के उद्देश्य से एमसीए डेटा साइंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सर्टिफिकेट कोर्स, साइबर सिक्योरिटी सर्टिफिकेट कोर्स, डिजिटल मार्केटिंग कोर्स तथा संस्कृत सम्भाषणम सर्टिफिकेट कोर्स को भी स्वीकृति प्रदान की गई। परिषद ने स्पष्ट किया कि आने वाला समय कृत्रिम बुद्धिमत्ता, डेटा विश्लेषण, साइबर सुरक्षा एवं डिजिटल कौशल का है और विश्वविद्यालय विद्यार्थियों को इन क्षेत्रों में सक्षम बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के प्रभावी क्रियान्वयन के अंतर्गत डबल डिग्री व्यवस्था, वर्ष में दो बार प्रवेश, स्वयं पाठ्यक्रम, एबिलिटी एन्हांसमेंट कोर्स (एईसी), स्किल एन्हांसमेंट कोर्स (एसईसी) तथा वैल्यू एडेड कोर्स (वीएसी) को विश्वविद्यालय की शैक्षणिक संरचना में समाहित करने की दिशा में भी महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। इससे विद्यार्थियों को बहुविषयी अध्ययन, लचीले शिक्षण विकल्प एवं वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप कौशल प्राप्त होंगे।

शोध एवं नवाचार को बढ़ावा देने के लिए परिषद ने इंटरडिसिप्लिनरी रिसर्च डिग्री, इंडियन नॉलेज सिस्टम (IKS) आधारित शोध, अभ्यास के प्रोफेसर व्यवस्था तथा बौद्धिक संपदा अधिकार से संबंधित नीतिगत पहल को भी समर्थन प्रदान किया। परिषद का मानना है कि शोध को केवल अकादमिक गतिविधि तक सीमित न रखकर समाज, नीति एवं उद्योग से जोड़ा जाना आवश्यक है।

बैठक में विश्वविद्यालय पुस्तकालय के आधुनिकीकरण नेक प्रत्यायन की तैयारियों को गति देने, तथा शोध एवं गुणवत्ता संवर्धन से जुड़े विभिन्न सुधारात्मक कदमों की भी जानकारी दी गई। इस अवसर पर कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल ने कहा कि, “राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों को केवल डिग्री प्रदान करना नहीं, बल्कि उन्हें ज्ञान, कौशल, संस्कार, नवाचार एवं रोजगार से जोड़ना है। विद्या परिषद द्वारा लिए गए निर्णय युवाओं को आत्मनिर्भर बनाने, भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ने, स्थानीय रोजगार अवसरों का सृजन करने तथा वैश्विक प्रतिस्पर्धा के अनुरूप तैयार करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। हमारा प्रयास है कि महर्षि दयानन्द सरस्वती विश्वविद्यालय राजस्थान में शिक्षा, शोध, नवाचार, स्वदेशी उद्यमिता और मूल्य आधारित शिक्षण का अग्रणी केंद्र बने।”

विद्या परिषद की बैठक में कुलगुरु प्रो. सुरेश कुमार अग्रवाल सहित सम्भागीय आयुक्त एवं अध्यक्ष राजस्थान माध्यमिक शिक्षा बोर्ड शक्ति सिंह राठौड़, प्रो. सुभाष चन्द्र, प्रो. मोनिका भटनागर, प्रो. मिलन यादव, प्रो. शिव प्रसाद, प्रो. सुब्रतो दत्ता, प्रो. अनिल दाधीच, प्रो॰ दुष्यन्त त्रिपाठी, प्रो. सुचेता प्रकाश, प्रो. ऋतु माथुर, प्रो. अरविन्द पारीक, प्रो. सावन कुमार जांगिड़, तथा प्रो. हरसुख राम छारंग ने बैठक में सहभागिता की। बैठक का संचालन कुलसचिव कैलाश चन्द्र शर्मा ने किया।

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हिन्दुस्थान समाचार / संतोष