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साधकों और सेवादारों को खानपान व चरित्र की शुद्धता का ध्यान रखना चाहिए: बाबा उमाकांत महाराज

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साधकों और सेवादारों को खानपान व चरित्र की शुद्धता का ध्यान रखना चाहिए: बाबा उमाकांत महाराज


जयपुर, 10 अक्टूबर (हि.स.)। संत बाबा उमाकांत महाराज ने सत्संगियों को खानपान और चरित्र की शुद्धता बनाए रखने तथा लालच से दूर रहकर निरंतर साधना करने का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि साधकों और सेवादारों को खाने-पीने में विशेष सावधानी बरतनी चाहिए और दूसरों की वस्तुओं को पाने या खाने का लालच नहीं करना चाहिए।

महाराज ने कहा कि मन को नियंत्रित कर सांसारिक इच्छाओं को कम करते हुए लगातार साधना करने की आवश्यकता है। साधना के मार्ग में कई तरह की बाधाएं आती हैं, इसलिए साधकों को अपने मन पर नियंत्रण रखने और बुराइयों से दूर रहने का प्रयास करना चाहिए। उन्होंने खानपान और चरित्र को सही रखते हुए साधना में आगे बढ़ने पर जोर दिया।

बाबा उमाकांत महाराज ने कहा कि कई बार व्यक्ति लालच में आकर बिना सोचे-समझे किसी दूसरे की दी हुई वस्तु स्वीकार कर लेता है। उसे यह विचार करना चाहिए कि वस्तु किसकी है, किस उद्देश्य से दी जा रही है और देने वाले की मंशा क्या है। उनके अनुसार, गलत तरीके से अर्जित वस्तुओं को स्वीकार करने का असर व्यक्ति के मन और साधना पर पड़ सकता है तथा उसका ध्यान अच्छे कार्यों से हट सकता है।

उन्होंने साधकों और सेवादारों को सचेत करते हुए कहा कि किसी भी वस्तु को स्वीकार करने से पहले उसके बारे में विचार करना चाहिए। मन को लालच से बचाकर सेवा और साधना के प्रति समर्पित रहना जरूरी है।

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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश