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महाराणा प्रताप के गौरव को शिवाजी महाराज जैसी जनश्रद्धा से जोड़ना होगा: निम्बाराम

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महाराणा प्रताप के गौरव को शिवाजी महाराज जैसी जनश्रद्धा से जोड़ना होगा: निम्बाराम


महाराणा प्रताप के गौरव को शिवाजी महाराज जैसी जनश्रद्धा से जोड़ना होगा: निम्बाराम


महाराणा प्रताप के गौरव को शिवाजी महाराज जैसी जनश्रद्धा से जोड़ना होगा: निम्बाराम


उदयपुर, 16 सितंबर (हि.स.)। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के राजस्थान क्षेत्र प्रचारक निम्बाराम ने कहा कि महाराष्ट्र में जिस श्रद्धा और गौरव के साथ छत्रपति शिवाजी महाराज को जनमानस में स्थापित किया गया है, उसी प्रकार की श्रद्धा और गौरव वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप के प्रति भी जन-जन में स्थापित करना होगा। उन्होंने कहा कि प्रताप गौरव केन्द्र इस दिशा में महत्वपूर्ण कार्य कर रहा है, लेकिन यह दायित्व केवल किसी एक संस्था या संगठन का नहीं, बल्कि हम सभी का सामूहिक कर्तव्य है। हमें मिलकर महाराणा प्रताप के शौर्य, स्वाभिमान और राष्ट्रनिष्ठा के संदेश को समाज के व्यापक वर्ग तक पहुंचाना होगा।

वे बुधवार को प्रताप गौरव केन्द्र ‘राष्ट्रीय तीर्थ’ के पद्मिनी सभागार में दिवेर विजय महोत्सव — 2026 के उद्घाटन समारोह को मुख्य वक्ता के रूप में संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि युद्ध में दोनों पक्षों को क्षति होती है, लेकिन इतिहास उन योद्धाओं के साहस और संकल्प को स्मरण करता है, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी अपने स्वाभिमान और मूल्यों से समझौता नहीं किया। उन्होंने भगवान श्रीराम और महाराणा प्रताप के संघर्षों का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि भगवान श्रीराम के जन्म के उद्देश्य को साकार करने के लिए विश्वामित्र उन्हें अपने साथ वन में ले गए थे। उस समय राक्षस संतों को शांतिपूर्वक जीवन नहीं जीने देते थे और उनके यज्ञ कर्म में बाधा उत्पन्न करते थे। श्रीराम ने वन में उपलब्ध संसाधनों और सहयोग के माध्यम से आतताइयों पर विजय प्राप्त की।

उन्होंने कहा कि इसी प्रकार महाराणा प्रताप ने भी विपरीत परिस्थितियों में वनवासी समाज और आदिवासी समुदाय के सहयोग को अपनी शक्ति बनाया और संघर्ष को निरंतर आगे बढ़ाया। प्रताप के संघर्ष में समाज के प्रत्येक वर्ग की सहभागिता दिखाई देती है। भामाशाह के योगदान का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि उनकी आर्थिक सहायता ने महाराणा प्रताप को संघर्ष के दौरान बड़ा संबल प्रदान किया। उस समय एक भामाशाह था, लेकिन आज ‘भामाशाह’ शब्द प्रत्येक दानवीर के लिए प्रेरणा और पर्याय बन गया है।

दिवेर के ऐतिहासिक संघर्ष का उल्लेख करते हुए निम्बाराम ने कहा कि दिवेर सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण और सुरक्षित क्षेत्र था। मुगलों ने भी यहां हाथी, घोड़े और पर्याप्त सैन्य बल तैनात कर रखा था। ऐसे कठिन सैन्य परिदृश्य में महाराणा प्रताप ने छापामार युद्ध नीति को प्रभावी रूप से अपनाया और दिवेर के आसपास स्थापित मुगल ठिकानों पर निर्णायक प्रहार किए। उन्होंने कहा कि दिवेर क्षेत्र के आसपास के 36 मुगल थानों पर विजय प्राप्त करना प्रताप के अदम्य साहस और युद्ध कौशल का परिचायक है।

निम्बाराम ने महाराणा प्रताप के चरित्र की मर्यादा और युद्धनीति का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रताप के लिए संघर्ष केवल विजय प्राप्त करने का माध्यम नहीं था, बल्कि उसके पीछे उच्च आदर्श और जीवन-मूल्य भी थे। उन्होंने उस प्रसंग का उल्लेख किया, जब महाराणा प्रताप के पुत्र अमरसिंह मुगलों पर धावा बोलते हुए उनके परिवार की कुछ महिलाओं को बंदी बनाकर ले आए थे। प्रताप ने अमरसिंह को आदेश दिया कि यह हमारी परंपरा नहीं है और उन मातृशक्ति को सम्मानपूर्वक वापस मुगल खेमे तक पहुंचाया जाए। उन्होंने कहा कि यही महाराणा प्रताप के चरित्र की महानता थी, जहां रणभूमि में शौर्य के साथ मानवीय मर्यादा भी सर्वोच्च रही।

उन्होंने कहा कि महाराणा प्रताप के देवलोकगमन का समाचार सुनकर अकबर भी उदास हुआ था। निम्बाराम ने कहा कि प्रताप के व्यक्तित्व और वीरता का प्रभाव ऐसा था कि उनके विरोधी भी उनके शौर्य और चरित्र का गुणगान करते थे। उन्होंने अकबर से जुड़ी उस प्रसिद्ध पंक्ति का उल्लेख किया, जिसमें प्रताप के लिए कहा गया कि ‘हे वीर, तेरी ही विजय हुई है।’ उन्होंने कहा कि जब प्रताप के शौर्य का गुणगान उनके विरोधी पक्ष के शासक तक ने किया, तो उनके गौरव और पराक्रम की महत्ता स्वतः स्पष्ट हो जाती है।

निम्बाराम ने कहा कि आज आवश्यकता है कि नई पीढ़ी अपने राष्ट्रीय तीर्थों, आध्यात्मिक केन्द्रों और गौरवशाली ऐतिहासिक स्थलों तक पहुंचे तथा भारत के इतिहास, संस्कृति और वीर परंपरा को जाने। उन्होंने कहा कि सरकार भी ऐसे कार्यक्रमों के माध्यम से युवाओं को राष्ट्रीय तीर्थों और आध्यात्मिक केन्द्रों तक पहुंचाने के प्रयास कर रही है, ताकि युवा अपनी गौरवशाली विरासत से परिचित हो सकें।

उन्होंने सभी से आह्वान किया कि दस दिन तक चलने वाले इस आयोजन में अधिक से अधिक सहभागी बनें और समाज में, विशेषकर हिन्दू समाज में, गौरव, एकता और राष्ट्रभाव की चेतना को मजबूत करने का कार्य करें। उन्होंने कहा कि महाराणा प्रताप का जीवन केवल इतिहास का एक अध्याय नहीं, बल्कि स्वाभिमान, संघर्ष, त्याग, शौर्य और राष्ट्रनिष्ठा की जीवंत प्रेरणा है।

वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप समिति के अंतर्गत संचालित प्रताप गौरव केन्द्र के निदेशक अनुराग सक्सेना ने बताया कि मुख्य अतिथि राज्य के जनजाति मंत्री बाबूलाल खराड़ी थे। अध्यक्षता वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप समिति उदयपुर के अध्यक्ष प्रोफेसर भगवती प्रकाश शर्मा ने की।

महोत्सव के संयोजक रमन सूद ने अतिथियों के स्वागत के साथ दस दिनों में होने वाले आयोजनों की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि 19 से 26 सितम्बर तक प्रताप गौरव केन्द्र परिसर में विभिन्न कार्यशालाओं का आयोजन होगा। इनमें राष्ट्रीय स्तर की चित्रकला कार्यशाला, पुरालेख कार्यशाला भी शामिल होंगी।

सहसंयोजक देवेन्द्र श्रीमाली ने बताया कि इस बार दिवेर विजय पर विशेष नुक्कड़ नाटक 'दिवेर का रणघोष' तैयार किया गया है। अमित व्यास व अमित श्रीमाली के लेखन एवं निर्देशन में तैयार इस नाटक का उद्घाटन समारोह में परिचय प्रस्तुत किया गया। विभिन्न स्थानों पर 26 सितम्बर तक इसका मंचन किया जाएगा। सहसंयोजक हरीश राजानी ने बताया कि वंदेमातरम के गायन से शुरू हुए उद्घाटन कार्यक्रम में रवि बोहरा ने देशभक्ति गीत 'ओ विजय के पर्व पौरुष का प्रखर सूरज उगा दे' की प्रस्तुति दी। अंत में धन्यवाद वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप समिति के महामंत्री दीपक शुक्ल ने व्यक्त किया।

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हिन्दुस्थान समाचार / सुनीता