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पापांकुशा एकादशी पर आत्मशुद्धि और मोक्ष की कामना के साथ रखा जाएगा व्रत

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पापांकुशा एकादशी पर आत्मशुद्धि और मोक्ष की कामना के साथ रखा जाएगा व्रत


जयपुर, 21 अक्टूबर (हि.स.)। सनातन धर्म में एकादशी तिथि का विशेष महत्व है। इसी क्रम में गुरुवार को आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी ‘पापांकुशा एकादशी’ के रूप में श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाई जाएगी। इस दिन श्रद्धालु आत्मशुद्धि, संयम, भक्ति और मोक्ष प्राप्ति की कामना के साथ व्रत रखकर जगत के पालनहार भगवान विष्णु की विशेष आराधना करेंगे।

पंडित बनवारी लाल शर्मा के अनुसार एकादशी तिथि 21 अक्टूबर को दोपहर में शुरू हो चुकी है, जो 22 अक्टूबर ,गुरुवार दोपहर तक समाप्त होगी। उदया तिथि के अनुसार व्रत 22 अक्टूबर को रखा जाएगा, जबकि व्रत का पारण 23 अक्टूबर को किया जाएगा।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, 'पापांकुशा' नाम पापरूपी हाथी को पुण्यरूपी अंकुश से नियंत्रित करने के प्रतीकात्मक भाव से जुड़ा है। यानी यह व्रत मनुष्य के विकारों और पापों का शमन कर पुण्य मार्ग पर अग्रसर करता है। पं. पुरुषोत्तम गौड़ का कहना है कि एकादशी केवल एक उपवास मात्र नहीं है, बल्कि यह मन, वाणी और कर्म की शुद्धता का दृढ़ संकल्प है। इस विशेष दिन पर क्रोध, लोभ और अहंकार का त्याग कर जरूरतमंदों की सेवा व सहायता करनी चाहिए।

एकादशी के दिन प्रातःकाल स्नान कर सूर्यदेव को अर्घ्य दें और भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें। भगवान श्रीगणेश, माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु की विधि-विधान से पूजा करें। पूजन के दौरान ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का निरंतर जप करें। इस दिन विष्णु सहस्रनाम, भगवद्गीता अथवा पापांकुशा एकादशी व्रत कथा का पाठ करना अत्यंत फलदायी माना गया है। अंत में भगवान की आरती कर श्रद्धालुओं में प्रसाद वितरित करें।

व्रत रखने वाले श्रद्धालु पूर्ण रूप से सात्त्विक आहार ग्रहण करें तथा अपनी सामर्थ्य और शारीरिक क्षमता के अनुसार ही उपवास रखें।इस पवित्र दिन मादक पदार्थों, कटु वचनों और छल-कपट से पूरी तरह दूर रहना चाहिए। इस व्रत का मुख्य उद्देश्य मन के विकारों को दूर कर धर्म, करुणा और सदाचार अपनाना है। अपनी क्षमता के अनुसार इस दिन अन्न, वस्त्र, फल और अन्य उपयोगी वस्तुओं का दान अवश्य करना चाहिए।

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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश