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बिना ओपन हार्ट सर्जरी के हृदय वाल्व का उपचार, टीएवीआई तकनीक से मरीजों को मिल रही नई जिंदगी

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बिना ओपन हार्ट सर्जरी के हृदय वाल्व का उपचार, टीएवीआई तकनीक से मरीजों को मिल रही नई जिंदगी


जयपुर, 16 जून (हि.स.)। भारत में हृदय रोगों के बढ़ते मामलों के बीच एओर्टिक वाल्व की बीमारी एक गंभीर लेकिन अक्सर अनदेखी की जाने वाली समस्या बनकर उभर रही है। विशेष रूप से बुजुर्गों में यह बीमारी न केवल जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित करती है, बल्कि समय पर उपचार नहीं मिलने पर जानलेवा भी साबित हो सकती है। चिकित्सा विज्ञान में हुई प्रगति के चलते अब ऐसे मरीजों का उपचार बिना छाती खोले और बिना ओपन हार्ट सर्जरी के भी संभव हो गया है। ट्रांस-कैथेटर एओर्टिक वाल्व इम्प्लांटेशन (टीएवीआई) तकनीक हृदय वाल्व रोगों के उपचार में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में सामने आई है।

हाल ही में कोटा निवासी 76 वर्षीय रमेश कुमार (परिवर्तित नाम) को पिछले कुछ महीनों से लगातार सांस फूलने, थकान महसूस होने और सामान्य दैनिक कार्य करने में परेशानी का सामना करना पड़ रहा था। चिकित्सकीय जांच में उन्हें गंभीर एओर्टिक स्टेनोसिस की समस्या का पता चला। डॉक्टरों ने हृदय वाल्व बदलने के लिए ओपन हार्ट सर्जरी की सलाह दी, लेकिन अधिक उम्र और सर्जरी के बाद लंबी रिकवरी की आशंका को देखते हुए परिवार वैकल्पिक उपचार की तलाश में था। ऐसे में टीएवीआई तकनीक उनके लिए सुरक्षित और प्रभावी विकल्प साबित हुई।

मणिपाल हॉस्पिटल जयपुर के स्ट्रक्चरल हार्ट इंटरवेंशन विशेषज्ञ अमित गुप्ता ने बताया कि हृदय का एओर्टिक वाल्व शरीर के विभिन्न अंगों तक ऑक्सीजन युक्त रक्त पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। बढ़ती उम्र के साथ कई लोगों में यह वाल्व कठोर और संकरा हो जाता है, जिसे चिकित्सकीय भाषा में एओर्टिक स्टेनोसिस कहा जाता है। जब वाल्व पर्याप्त रूप से नहीं खुलता तो हृदय को रक्त पंप करने के लिए अधिक मेहनत करनी पड़ती है। इसके कारण मरीजों में सांस फूलना, सीने में दर्द, चक्कर आना, अत्यधिक थकान और कई बार बेहोशी जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं। उन्होंने बताया कि पहले इस बीमारी का मुख्य उपचार ओपन हार्ट सर्जरी था, जिसमें छाती खोलकर खराब वाल्व को बदलना पड़ता था। हालांकि बुजुर्ग मरीजों, मधुमेह, किडनी रोग, फेफड़ों की बीमारी या अन्य जटिल स्वास्थ्य समस्याओं से ग्रस्त रोगियों के लिए यह प्रक्रिया जोखिमपूर्ण हो सकती है। ऐसे मरीजों के लिए टीएवीआई तकनीक ने उपचार की नई राह खोली है।

डॉ. गुप्ता के अनुसार टीएवीआई प्रक्रिया में जांघ की मुख्य रक्त वाहिका के माध्यम से एक पतली कैथेटर हृदय तक पहुंचाई जाती है। इस कैथेटर की सहायता से नया कृत्रिम वाल्व प्रभावित एओर्टिक वाल्व के स्थान पर स्थापित कर दिया जाता है। पूरी प्रक्रिया अत्याधुनिक इमेजिंग तकनीकों की निगरानी में की जाती है और इसमें सामान्यतः छाती खोलने या बड़े चीरे की आवश्यकता नहीं होती। उन्होंने बताया कि इस तकनीक के कई महत्वपूर्ण लाभ हैं। मरीज को कम दर्द और कम रक्तस्राव होता है, संक्रमण का जोखिम अपेक्षाकृत कम रहता है तथा अस्पताल में भर्ती रहने की अवधि भी कम हो जाती है। आंकड़ों के अनुसार 95 प्रतिशत से अधिक मरीज दो से तीन दिनों के भीतर अस्पताल से छुट्टी प्राप्त कर लेते हैं और अधिकांश रोगी एक से दो दिन में ही सामान्य गतिविधियां शुरू करने में सक्षम हो जाते हैं। इसके अलावा बुजुर्ग और हाई-रिस्क मरीजों के लिए यह तकनीक विशेष रूप से लाभकारी साबित हो रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि आधुनिक कृत्रिम वाल्व तकनीक, उन्नत कैथेटर आधारित उपचार और इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी के विकास ने हृदय रोगों के उपचार को नई दिशा दी है। अब कई जटिल हार्ट वाल्व रोगों का उपचार बिना ओपन हार्ट सर्जरी के सफलतापूर्वक किया जा रहा है। इससे मरीजों की रिकवरी तेज होने के साथ-साथ उपचार का मानसिक और शारीरिक बोझ भी कम हो रहा है।

डॉ. अमित गुप्ता ने कहा कि समय पर पहचान और उचित उपचार से एओर्टिक स्टेनोसिस जैसी गंभीर बीमारी पर प्रभावी नियंत्रण पाया जा सकता है। यदि किसी बुजुर्ग व्यक्ति को लगातार सांस फूलने, सीने में दर्द, चक्कर आने या अत्यधिक थकान जैसी समस्याएं हों तो उसे हृदय रोग विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लेना चाहिए। आधुनिक चिकित्सा तकनीकों के माध्यम से अब ऐसे मरीजों को बेहतर और गुणवत्तापूर्ण जीवन प्रदान करना संभव हो गया है। उन्होंने बताया कि उनकी टीम की देखरेख में मणिपाल हॉस्पिटल जयपुर में हार्ट वाल्व रिपेयर और रिप्लेसमेंट जैसी जटिल प्रक्रियाएं परक्यूटेनियस कैथेटर तकनीक के माध्यम से सफलतापूर्वक की जा रही हैं। इससे मरीजों को सुरक्षित, प्रभावी और कम दर्द वाला उपचार उपलब्ध हो रहा है तथा वे अपेक्षाकृत कम समय में सामान्य जीवन में लौट पा रहे हैं।

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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश