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गुप्त वृंदावन धाम : जेन-जेड और जेन-अल्फा ने कृष्ण भक्ति में सजाया संस्कृति का रंग

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गुप्त वृंदावन धाम : जेन-जेड और जेन-अल्फा ने कृष्ण भक्ति में सजाया संस्कृति का रंग


जयपुर, 31 अगस्त (हि.स.)। जगतपुरा स्थित गुप्त वृंदावन धाम में आयोजित तीन दिवसीय श्रीकृष्ण जन्माष्टमी कार्निवल का सोमवार को भक्ति, संगीत, नृत्य और भारतीय संस्कृति के रंगों के साथ भव्य समापन हुआ। अंतिम दिन जयपुर के विभिन्न विद्यालयों से सैकड़ों बच्चों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया। बच्चे भगवान श्रीकृष्ण और राधारानी के स्वरूप में सजकर मंदिर पहुंचे, जबकि उनके माता-पिता नंद बाबा और यशोदा मैया के स्वरूप में सहभागी बने।

मंदिर अध्यक्ष अमितासन दास प्रभु ने बताया कि गुप्त वृंदावन धाम केवल धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक केंद्र के रूप में भी कार्य कर रहा है। यहां बच्चों, युवाओं और परिवारों को भारतीय संस्कृति, संस्कार और भक्ति से जोड़ने के लिए लगातार कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। उन्होंने कहा कि जेन-जेड और जेन-अल्फा को अपनी संस्कृति और भक्ति परंपरा से जोड़ना आज की महत्वपूर्ण आवश्यकता है।

कार्निवल के समापन अवसर पर बच्चों ने भरतनाट्यम, कथक, सोलो और ग्रुप डांस, मंत्रोच्चारण, भगवान श्रीकृष्ण के भजनों तथा भजन जामिंग की प्रस्तुतियां दीं। जयपुर के नालंदा कला केंद्र के बच्चों ने भरतनाट्यम की शानदार प्रस्तुति देकर दर्शकों की सराहना बटोरी। वहीं आईसीवीके के विद्यार्थियों ने भी भक्तिमय प्रस्तुति दी।

भजन जामिंग में आराध्या चंदा, आराध्या शर्मा, साक्षी चंदा, प्रिंजल गुप्ता, अद्रिशा पारीक यादव, हूर्वी शर्मा, एकांगिका शर्मा, अग्रिमा पारीक, अनिका बरनवाल, तोषिका जोशी, मानवी सिंह, दिशिका यादव, गीतिका सिंह, मोक्ष लोहारिया, निधिश्री और आरोही जैन ने गायन किया। वाद्य यंत्रों पर अगस्त्य सांखला, माधव शर्मा, यथार्थ जैन, भाव्या जैन, आरव खत्री और आयुष सैनी ने संगत दी।

कार्यक्रम में परमेष्ठी वर्मा ने भरतनाट्यम और प्रियंका सिंह ने कथक की मनमोहक प्रस्तुति दी। प्रस्तुतियों के दौरान पूरा परिसर कृष्ण भक्ति से सराबोर नजर आया। तीन दिवसीय आयोजन में बच्चों, युवाओं और परिवारों की सक्रिय सहभागिता रही।

आयोजकों ने कहा कि कार्निवल का उद्देश्य नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति, संगीत, नृत्य और कृष्ण भक्ति से जोड़ना है। आयोजन ने यह संदेश दिया कि नई पीढ़ी जब अपनी सांस्कृतिक और आध्यात्मिक परंपराओं से जुड़ती है तो संस्कारों की विरासत आने वाली पीढ़ियों तक और मजबूत तरीके से पहुंचती है।

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हिन्दुस्थान समाचार / दिनेश