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शेखावाटी वीरता, त्याग, तपस्या और उद्यमशीलता की धरती—राज्यपाल

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शेखावाटी वीरता, त्याग, तपस्या और उद्यमशीलता की धरती—राज्यपाल


शेखावाटी वीरता, त्याग, तपस्या और उद्यमशीलता की धरती—राज्यपाल


सीकर, 09 अक्टूबर (हि.स.)। राज्यपाल हरिभाऊ बागडे ने शुक्रवार को सीकर में आयोजित शेखावाटी साहित्य संगम में सहभागिता की तथा साहित्य, भारतीय ज्ञान परंपरा, शिक्षा और राष्ट्र निर्माण के विभिन्न पहलुओं पर अपने विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि इस प्रकार के साहित्यिक आयोजनों से विचारों का परिष्कार होता है, नवीन विचारों का संचार होता है तथा ज्ञान में वृद्धि होती है।

राज्यपाल ने कहा कि शेखावाटी शूरवीरों की धरती है। यह क्षेत्र त्याग, तपस्या, शौर्य और उद्यमशीलता के लिए भी प्रसिद्ध है। देश की अखंडता एवं रक्षा के लिए अपना सर्वस्व न्योछावर करने में शेखावाटी क्षेत्र का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। यहां अनेक परिवारों की तीसरी और चौथी पीढ़ी भी देश की रक्षा में सेवाएं दे रही है। उन्होंने कहा कि साहित्य समाज की धड़कन है। साहित्य सृजन के समय संयम और मर्यादा का ध्यान रखना आवश्यक है। शेखावाटी साहित्य संगम लोक संस्कृति और साहित्य का एक महत्वपूर्ण संगम है।

राज्यपाल ने भारतीय साहित्य एवं ज्ञान परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि विदेशी साहित्यकारों ने भी भारतीय साहित्य की सराहना की है। महाभारत और रामायण जैसे महाकाव्यों का अध्ययन विदेशों में भी किया जाता है। वेदों का जर्मन भाषा में अनुवाद किया गया है। भारतीय उपनिषदों में निहित ज्ञान का महत्व सदियों तक बना रहेगा। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा ने विश्व को ज्ञान और विज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। शून्य की अवधारणा ने गणना की पद्धति को नई दिशा प्रदान की।

उन्होंने राजस्थान की लोक संस्कृति एवं साहित्य का उल्लेख करते हुए कहा कि यहां लोकगीतों और लोक परंपराओं के माध्यम से बच्चों में बाल्यावस्था से ही मातृभूमि की रक्षा, वीरता और त्याग के संस्कार विकसित किए जाते हैं। 'इला न देणी आपणी, हालरियो हुलराय, पूत सिखावै पालणै, मरण बड़ाई मांय' जैसी लोकपंक्तियां राजस्थान की वीर परंपरा और मातृभूमि के प्रति समर्पण की भावना को अभिव्यक्त करती हैं।

राज्यपाल ने गीताप्रेस, गोरखपुर की स्थापना में हनुमान प्रसाद पोद्दार के योगदान का उल्लेख करते हुए शिक्षा व्यवस्था में सुधार की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के समय से ही भारतीय परिस्थितियों और सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप शिक्षा व्यवस्था विकसित करने पर विशेष ध्यान दिए जाने की आवश्यकता थी। आज भी स्कूली शिक्षा में सुधार की आवश्यकता है। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए, जो विद्यार्थियों की बौद्धिक क्षमता बढ़ाने के साथ उनमें नैतिकता, विवेक, समझदारी और संस्कारों का विकास करे।

राज्यपाल ने कहा कि भारत को वर्ष 2047 तक विकसित राष्ट्र बनाने के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए सभी नागरिकों को अपने-अपने क्षेत्र में सक्रिय योगदान देना चाहिए। उन्होंने राष्ट्र के विकास में शिक्षा, साहित्य, संस्कृति और सामाजिक मूल्यों की महत्वपूर्ण भूमिका पर प्रकाश डाला।

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हिन्दुस्थान समाचार / Chandrashekhar kuntal