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दिवेर विजय महोत्सव: रील मेकिंग से लेकर पुरालिपि कार्यशालाओं का आरंभ

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दिवेर विजय महोत्सव: रील मेकिंग से लेकर पुरालिपि कार्यशालाओं का आरंभ


उदयपुर, 19 सितंबर (हि.स.)। वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप समिति के अंतर्गत संचालित प्रताप गौरव केंद्र 'राष्ट्रीय तीर्थ' के तत्वावधान में आयोजित 'दिवेर विजय महोत्सव—2026' के तहत शनिवार को विविध सांस्कृतिक और शैक्षणिक गतिविधियों का शुभारंभ हुआ। जहाँ एक ओर सुबह युवाओं के लिए रील मेकिंग प्रतियोगिता के लिए वॉक आयोजित की गई, वहीं दोपहर में पुरालिपि, पुरालेख और चित्रकला कार्यशालाओं का आगाज हुआ। शाम के समय दूधतलाई पर आयोजित नुक्कड़ नाटक के ओजस्वी मंचन ने महाराणा प्रताप की दिवेर विजय के ऐतिहासिक जयघोष को फिर से जीवंत कर दिया।

चित्रकला कार्यशाला संयोजक प्रो. राम सिंह भाटी और प्रताप गौरव केंद्र के निदेशक अनुराग सक्सेना ने बताया कि कार्यशाला के माध्यम से 'मेवाड़ के सांस्कृतिक एवं ऐतिहासिक परिदृश्य' को कैनवास पर उकेरा जा रहा है। ये कलाकृतियां प्रताप गौरव केंद्र के संग्रहालय में स्थायी रूप से प्रदर्शित रहेंगी। कार्यशाला में देश के 20 ख्यातिप्राप्त चित्रकार भाग ले रहे हैं। इनमें उत्तर प्रदेश से डॉ. सुनील कुमार विश्वकर्मा, डॉ. सुनील कुमार सिंह कुशवाहा व डॉ. दुर्जन सिंह राणा; महाराष्ट्र से मनोजकुमार सकळे, कुदालैय्या हिरेमढ, अभिषेक सुरेश आचार्य, विवेक दहिवले, ओंकार अशोक पवार, अद्वैत किशोर नादवडेकर व विजय चंद्रकांत जाधव; हिमाचल से घनश्याम कश्यप; दिल्ली से डॉ. मनोज बालियान; पश्चिम बंगाल से दीपांकर रे; चंडीगढ़ से ऋषि राज तोमर; जम्मू-कश्मीर से अंकुश कुमार; गुजरात से डॉ. मुकेश सालवी तथा राजस्थान से डॉ. पुष्कर लोहार, नवल सिंह व डॉ. सुरेंद्र सिंह चुण्डावत शामिल हैं।

पुरालिपि कार्यशाला संयोजक धर्मपाल सिंह यादव और साहित्य संस्थान (राजस्थान विद्यापीठ) के निदेशक डॉ. कुलशेखर व्यास ने बताया कि मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय और राजस्थान विद्यापीठ के सहयोग से आयोजित इस कार्यशाला में अशोककालीन ब्राह्मी से लेकर कुषाण, गुप्त, सिद्धमातृका, शारदा तथा राजस्थानी मोड़ी/मुड़िया लिपियों का गहन प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

प्रथम सत्र में डॉ. विवेक भटनागर ने भाषा के इतिहास और विकास पर प्रकाश डाला। द्वितीय सत्र में एएसआई (ASI) के पूर्व निदेशक (बेंगलुरु) डॉ. टी.एस. रविशंकर ने ब्राह्मी लिपि का परिचय दिया। तृतीय सत्र में बीकानेर के डॉ. राजेन्द्र कुमार ने राजस्थानी मोड़ी और महाजनी लिपि की बारीकियां समझाईं। चतुर्थ सत्र में डॉ. धर्मवीर शर्मा और प्रो. जीवन सिंह खरकवाल ने टोंक (केकड़ी) व अजमेर के लल्लई गांव से प्राप्त मृदभांड अवशेषों के विश्लेषण के साथ सिंधु लिपि का प्राथमिक परिचय कराया।

कार्यक्रम के सह संयोजक डॉ. देवेन्द्र श्रीमाली के अनुसार इस बार भारतीय इतिहास में फारसी अभिलेखों के महत्व को देखते हुए फारसी भाषा का विशेष सत्र शामिल किया गया है, जिसमें डॉ. चन्द्रशेखर, डॉ. शम्सुल हुदा शेरवाली और डॉ. सोलत अली प्रशिक्षण दे रहे हैं। प्रतिभागियों को वास्तविक अभिलेखों के दस्तावेजीकरण और फील्ड विजिट का व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया जाएगा।

महोत्सव संयोजक रमन सूद के अनुसार शनिवार सुबह 10 से 12 बजे तक रील्स वॉक आयोजित की गई। रील शूटिंग के लिए 20 सितंबर (रविवार) को सुबह 10 से 12 बजे तथा शाम 5 से 7 बजे तक का समय तय किया गया है। निदेशक अनुराग सक्सेना ने बताया कि रविवार शाम 5 से 6 बजे के बीच फतहसागर की पाल (झरने वाले छोर) पर दिवेर विजय पर आधारित नुक्कड़ नाटक का मंचन किया जाएगा।

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हिन्दुस्थान समाचार / सुनीता