home page

सागवाड़ा में विधायक की बेटी और पूर्व सांसद की बहू को भाजपा का टिकट

 | 
सागवाड़ा में विधायक की बेटी और पूर्व सांसद की बहू को भाजपा का टिकट


सागवाड़ा में विधायक की बेटी और पूर्व सांसद की बहू को भाजपा का टिकट


डूंगरपुर, 13 अक्टूबर (हि.स.)। जिले के सागवाड़ा पंचायत समिति चुनाव में भाजपा के टिकट वितरण ने परिवारवाद और राजनीतिक विरासत को लेकर बहस छेड़ दी है। विधायक शंकरलाल डेचा की पुत्री शांति डेंडोर और पूर्व सांसद कनकमल कटारा की बहू वर्षा कटारा को प्रत्याशी बनाए जाने पर सवाल उठ रहे हैं। वहीं, पूर्व प्रधान ईश्वर सरपोटा की पत्नी पुष्पा सरपोटा को पार्टी का टिकट नहीं मिलने से स्थानीय सियासत गरमा गई है।

सागवाड़ा पंचायत समिति का प्रधान पद अनुसूचित जनजाति (एसटी) महिला के लिए आरक्षित है। ऐसे में महिला प्रत्याशियों की उम्मीदवारी को सदस्य पद के चुनाव के साथ भावी प्रधान पद के समीकरणों से भी जोड़कर देखा जा रहा है। हालांकि, अंतिम तस्वीर चुनाव परिणाम और पंचायत समिति में बनने वाले बहुमत पर निर्भर करेगी।

भाजपा ने विधायक शंकरलाल डेचा की बेटी शांति डेंडोर को वार्ड 14 घोटाद और पूर्व सांसद कनकमल कटारा की बहू वर्षा कटारा को वार्ड 17 फलातेड़ से प्रत्याशी बनाया है। नामांकन के दौरान विधायक डेचा और पूर्व सांसद कटारा की मौजूदगी ने दोनों वार्डों में चुनावी हलचल बढ़ा दी। दोनों उम्मीदवारों की राजनीतिक पारिवारिक पृष्ठभूमि को भाजपा की चुनावी रणनीति के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, उनकी पहचान का चुनावी लाभ कितना मिलेगा, यह स्थानीय जनाधार और मतदाताओं के रुख से तय होगा।

पूर्व प्रधान ईश्वर सरपोटा की पत्नी पुष्पा सरपोटा ने वार्ड 27 पादरड़ी बड़ी से नामांकन दाखिल किया है। उन्हें भाजपा का टिकट नहीं मिलने की चर्चा के बीच उनकी उम्मीदवारी ने स्थानीय राजनीतिक समीकरणों को दिलचस्प बना दिया है। एक ओर विधायक और पूर्व सांसद के परिवारों से जुड़ी महिलाओं को टिकट मिला, दूसरी ओर पूर्व प्रधान की पत्नी को पार्टी का प्रत्याशी नहीं बनाया गया। इससे टिकट चयन में राजनीतिक प्रभाव, संगठनात्मक योगदान और स्थानीय जनाधार को दिए गए महत्व पर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि, टिकट नहीं मिलने के कारणों पर कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।

भाजपा विपक्षी दलों पर परिवारवाद को लेकर निशाना साधती रही है। ऐसे में सागवाड़ा में प्रमुख नेताओं के परिजनों को टिकट मिलने से पार्टी की राजनीतिक बयानबाजी और स्थानीय फैसलों के बीच तुलना होने लगी है। पार्टी के सामने चुनौती है कि वह टिकट चयन को लेकर उठ रहे सवालों के बीच संगठनात्मक एकजुटता बनाए रखे। लंबे समय से सक्रिय कार्यकर्ताओं की दावेदारी, स्थानीय स्वीकार्यता और जीत की संभावना जैसे पहलुओं पर भी चर्चा हो रही है। हालांकि, राजनीतिक परिवार से जुड़ाव अपने आप में किसी प्रत्याशी की योग्यता या अयोग्यता तय नहीं करता। चुनाव में व्यक्तिगत क्षमता, जनसेवा और क्षेत्र में सक्रियता भी अहम होंगी।

प्रधान पद एसटी महिला के लिए आरक्षित होने से पंचायत समिति सदस्य पदों के चुनाव का महत्व बढ़ गया है। सदस्य चुनाव में जीत के साथ पंचायत समिति में बहुमत और दल के भीतर समर्थन भी प्रधान के चयन में निर्णायक होंगे। ऐसे में महिला प्रत्याशियों की उम्मीदवारी को भविष्य के नेतृत्व से जोड़कर देखा जा रहा है, लेकिन किसी एक प्रत्याशी की प्रधान पद पर दावेदारी अभी तय नहीं मानी जा सकती।

अब सागवाड़ा में मुकाबला केवल सीटें जीतने तक सीमित नहीं है। भाजपा को जहां अपने प्रत्याशियों की जीत सुनिश्चित करनी होगी, वहीं टिकट वितरण से उपजे सवालों और कार्यकर्ताओं की अपेक्षाओं का भी सामना करना होगा। अंततः मतदाताओं का फैसला तय करेगा कि राजनीतिक विरासत चुनावी बढ़त बनती है या स्थानीय जनाधार और व्यक्तिगत स्वीकार्यता निर्णायक साबित होती है।

---------------

हिन्दुस्थान समाचार / संतोष