अलवर नगर निगम चुनाव: महापौर की सीट जनरल महिला होते ही बदला सियासी खेल
अलवर, 25 अगस्त (हि.स.)। अलवर नगर निगम चुनाव में महापौर की सीट जनरल महिला घोषित होने के बाद सियासी समीकरण तेजी से बदल गए हैं। महीनों से महापौर की कुर्सी पर नजर लगाए बैठे कई पुरुष नेताओं के राजनीतिक समीकरण अब बदल गए हैं। ऐसे में अपनी सियासी जमीन और प्रभाव बनाए रखने के लिए कई दिग्गज नेताओं ने अब अपनी पत्नी और परिवार की महिला सदस्यों को चुनावी मैदान में उतारने की तैयारी शुरू कर दी है।
इस बार का निकाय चुनाव सिर्फ राजनीतिज्ञों के लिए ही नहीं, बल्कि रणनीतिज्ञों के लिए भी खास माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि राजनीति की एबीसीडी समझने वाले नेताओं के साथ कुछ पूर्व अफसर भी सियासत की पाठशाला में प्रवेश की तैयारी में जुटे हैं।
महापौर पद की सीट महिला के लिए आरक्षित होने के साथ ही भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों में संभावित महिला दावेदारों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं।
राजनीतिक चर्चाओं के मुताबिक पूर्व सभापति अजय अग्रवाल अपनी पत्नी के लिए भाजपा से टिकट की दावेदारी कर रहे हैं। वहीं निवर्तमान महापौर घनश्याम गुर्जर की पुत्रवधू के नाम को लेकर भी राजनीतिक गलियारों में चर्चाएं हैं।
पूर्व डेयरी चेयरमैन बन्नाराम मीणा की पत्नी का नाम भी संभावित दावेदारों में बताया जा रहा है। नगर विकास न्यास में अधिकारी रहे कुमार संभव अवस्थी की पत्नी सुशीला भी भाजपा से टिकट की दौड़ में बताई जा रही हैं। वहीं वन मंत्री संजय शर्मा के साडू राजीव शर्मा के भी वार्ड 23 से टिकट मांगने की चर्चा है।
कांग्रेस में पूर्व सभापति बीना गुप्ता ने दावेदारी पेश की है। वहीं कांग्रेस के पूर्व जिलाध्यक्ष योगेश मिश्रा की पत्नी के नाम को लेकर भी चर्चा है। वहीं निर्दलीय पार्षद अजय पुनिया अपनी बहन को चुनाव लड़वा रहे है हालांकि अंतिम फैसला दोनों दलों के शीर्ष नेतृत्व द्वारा ही किया जाएगा, लेकिन संभावित दावेदारों की सक्रियता ने अलवर की सियासत को गर्म कर दिया है।
महापौर पद के साथ वार्ड पार्षदों के टिकट को लेकर भी दोनों प्रमुख दलों में खींचतान शुरू हो गई है। वार्ड नंबर 21 इस समय खास चर्चा में है।
इसी वार्ड से नगर परिषद की पूर्व सभापति बीना गुप्ता कांग्रेस से दावेदारी कर रही हैं। वहीं नगर विकास न्यास के पूर्व अधिकारी रहे कुमार संभव अवस्थी की पत्नी सुशीला के भाजपा से चुनाव मैदान में उतरने की चर्चा है।
महिला वार्ड होने के कारण कांग्रेस से लंबे समय से जुड़े अशोक धानका अपनी पत्नी रेणु के लिए टिकट की कोशिश में जुटे हैं। वहीं फोटोग्राफर दिवाकर शर्मा भी अपनी पत्नी एडवोकेट लक्ष्मी को चुनाव मैदान में उतारने के प्रयास में बताए जा रहे हैं।
ऐसे में वार्ड 21 में टिकट की लड़ाई दिलचस्प होती जा रही है। हालांकि टिकट किसे मिलेगा, इसका फैसला पार्टी नेतृत्व के स्तर पर होना बाकी है।
अलवर नगर निगम चुनाव में टिकट वितरण को लेकर भाजपा और कांग्रेस दोनों दलों में अंदरूनी स्तर पर लॉबिंग तेज होने की चर्चा है।
भाजपा में केंद्रीय मंत्री और अलवर सांसद भूपेंद्र यादव तथा वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री संजय शर्मा की भूमिका अहम मानी जा रही है। वहीं कांग्रेस में पूर्व केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह और नेता प्रतिपक्ष टीकाराम जूली के प्रभाव को लेकर राजनीतिक चर्चाएं हैं।
टिकट को लेकर स्थानीय नेताओं से लेकर प्रदेश और केंद्रीय स्तर तक संपर्क साधे जा रहे हैं। ऐसे में अगले कुछ दिनों में तस्वीर काफी हद तक साफ होने की उम्मीद है।
48 घंटे में टिकटों पर तस्वीर साफ होने की उम्मीद
वार्डों के टिकटों को लेकर दोनों प्रमुख दलों में मंथन जारी है। संभावित प्रत्याशियों की राय जानने के लिए पर्यवेक्षकों की सक्रियता भी बढ़ी है।
हालांकि राजनीतिक जानकारों का मानना है कि जमीनी स्तर पर रायशुमारी के साथ-साथ टिकटों को लेकर अंतिम फैसला पार्टी के शीर्ष नेतृत्व और राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखकर ही होगा।
अलवर नगर निगम की राजनीति में निर्दलीय प्रत्याशियों की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है। इस बार भी यदि भाजपा और कांग्रेस के बागी उम्मीदवार बड़ी संख्या में मैदान में उतरते हैं तो बोर्ड गठन के बाद निर्दलीय पार्षद निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।
यही वजह है कि दोनों प्रमुख दल टिकट वितरण में ऐसे चेहरों को साधने की कोशिश में हैं, जिनकी अपने वार्ड में मजबूत पकड़ हो और जो चुनाव के बाद पार्टी के लिए परेशानी का कारण न बनें।
भाजपा जहां विकास कार्यों को मुद्दा बनाकर जनता के बीच जाने की तैयारी में है, वहीं कांग्रेस शहर की सड़क, नाली, जलभराव और मूलभूत सुविधाओं को लेकर भाजपा को घेरने की रणनीति बना रही है।
अलवर में बारिश के दौरान सड़कों पर जलभराव और बदहाल रास्ते पहले ही राजनीतिक मुद्दा बन चुके हैं। ऐसे में चुनावी मौसम में सड़क, नाली और पानी जैसे स्थानीय मुद्दे प्रत्याशियों के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं।
महंगाई भी चुनावी चर्चा का हिस्सा बन सकती है। चीनी समेत रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों को लेकर जनता की नाराजगी का असर चुनावी माहौल पर कितना पड़ता है, यह भी देखने वाली बात होगी।
अब जनता के फैसले पर नजर
फिलहाल अलवर नगर निगम चुनाव में टिकट की दौड़ ने सियासी माहौल गर्म कर दिया है। महापौर की सीट महिला के लिए आरक्षित होने के बाद पुरुष नेताओं के राजनीतिक समीकरण बदल चुके हैं और परिवार की महिलाओं को आगे करने की रणनीति साफ दिखाई दे रही है।
अब बड़ा सवाल यही है कि क्या अलवर की जनता राजनीतिक परिवारों के चेहरों पर भरोसा जताएगी या इस बार किसी नए और अपेक्षाकृत साफ-सुथरे चेहरे को मौका देगी।
फिलहाल टिकट की दौड़ जारी है और असली तस्वीर प्रत्याशियों की सूची सामने आने के बाद ही साफ होगी।
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हिन्दुस्थान समाचार / मनीष कुमार

