सर्वपितृ अमावस्या पर होगा श्राद्ध पक्ष का समापन
पूर्वजों के निमित्त तर्पण, हवन-पूजन और दान का है विशेष महत्व
जोधपुर, 07 अक्टूबर (हि.स.)। सनातन धर्म में पितृ पक्ष को पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने का विशेष अवसर माना गया है। इन दिनों परिवार के दिवंगत सदस्यों की आत्मिक शांति और पितृ तृप्ति के लिए उनकी मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध किया जाता है। श्राद्ध कर्म के दौरान तर्पण, हवन-पूजन, ब्राह्मण भोजन तथा दान-पुण्य की परंपरा भी रही है। इस वर्ष श्राद्ध पक्ष का समापन 10 अक्टूबर को सर्वपितृ अमावस्या के साथ होगा।
हिंदू पंचांग के अनुसार पूर्णिमा से अमावस्या तक की अवधि को पितृ पक्ष या श्राद्ध पक्ष माना जाता है। इस दौरान प्रत्येक तिथि का अपना अलग महत्व होता है। जिन परिवारों में पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात होती है, वहां उसी तिथि के अनुसार श्राद्ध कर्म किया जाता है। जिन पूर्वजों की मृत्यु तिथि की जानकारी नहीं है, उनके लिए सर्वपितृ अमावस्या को विशेष अवसर माना गया है। पंडितों के अनुसार, श्राद्ध पक्ष में पूर्वजों की मृत्यु तिथि के अनुसार श्राद्ध करने की परंपरा है। किसी व्यक्ति को अपने पूर्वज की मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है अथवा किसी कारण से निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं किया जा सका, तो सर्वपितृ अमावस्या के दिन श्राद्ध किया जा सकता है।
अमावस्या तिथि को जिन पूर्वजों का निधन हुआ हो, उनका श्राद्ध भी इसी दिन किया जाता है। सर्वपितृ अमावस्या का महत्व इसलिए भी अधिक है, क्योंकि यह श्राद्ध पक्ष की अंतिम तिथि होती है। इस दिन ज्ञात और अज्ञात सभी पूर्वजों के निमित्त श्रद्धापूर्वक तर्पण और श्राद्ध कर्म करने की परंपरा है। परिवार के ऐसे पूर्वज जिनकी मृत्यु तिथि का स्मरण नहीं रह गया है, उनके निमित्त भी इस दिन धार्मिक कर्म किए जाते हैं।
हिन्दुस्थान समाचार / सतीश

